Politics : भारतीय राजनीति में बगावत का दिलचस्प रिकॉर्ड

नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र की सियासत में इन दिनों सियासी गर्माहट सातवें आसमान पर है। एक तरफ बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर सुलगती अंदरूनी कलह ने राज्य के राजनीतिक पारे को चरम पर पहुंचा दिया है। दूसरी ओर उद्धव शिवसेना की बगावत के सुर भी दिल्ली पहुँच गये हैँ।
राजनीतिक गलियारों में ये कैसी सुगबुगाहट?
वर्तमान परिस्थितियां तो गवाही इस बात का भी दे रही हैं कि इस सत्ता संघर्ष में बल, बुद्धि और बगावत, इन तीनों का एक अभूतपूर्व संगम देखने को मिल रहा है। ऐसे में राजनीतिक गलियारों में इस बात को लेकर सुगबुगाहट तेज है कि क्या टीएमसी और शिवसेना भी उसी राह पर बढ़ रही है, जहां देश की कई बड़ी पार्टियों का वजूद आंतरिक बगावत के कारण दो हिस्सों में बंट गया?
भारतीय राजनीति में पार्टी टूटने का इतिहास कैसा?
इस बात को ऐसे समझा जा सकता है कि भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में पार्टी का टूटना या वैचारिक मतभेदों के कारण ‘विभाजन’ होना कोई नई बात नहीं है। पिछले पांच दशकों में कई ऐसे बड़े राजनीतिक घटनाक्रम हुए हैं, जिन्होंने न सिर्फ पार्टियों को बदला, बल्कि देश की राजनीति की दिशा और दशा दोनों को हमेशा के लिए बदल दिया। आइए विस्तार से इन्हीं कुछ विभाजन की घटनाओं पर एक नजर डालते हैं।
1969 का दौर और कांग्रेस का ऐतिहासिक विभाजन
भारतीय राजनीति का सबसे पहला और ऐतिहासिक रूप से सबसे प्रभावशाली विभाजन साल 1969 में हुआ था। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और कांग्रेस के पुराने व अनुभवी नेताओं के गुट (जिसे ‘सिंडिकेट’ कहा जाता था) के बीच मतभेद गहरा गए थे। यह विवाद राष्ट्रपति जाकिर हुसैन के निधन के बाद नए राष्ट्रपति के चुनाव को लेकर शुरू हुआ।
जब दो धड़ों में बंट गई थी क्रांग्रेस
कारण था कि इंदिरा गांधी ने निर्दलीय उम्मीदवार वीवी गिरी का समर्थन किया, जबकि कांग्रेस संगठन ने नीलम संजीवा रेड्डी को मैदान में उतारा था। ऐसे में इस टकराव के कारण कांग्रेस दो धड़ों में बंट गई- कांग्रेस (ऑर्गनाइजेशन) और कांग्रेस (रिक्विजिनिस्ट)। अंततः इंदिरा गांधी का गुट असली कांग्रेस के रूप में उभरा और 1971 के लोकसभा चुनावों में भारी जीत दर्ज की। दूसरी तरफ, पुराना सिंडिकेट गुट धीरे-धीरे कमजोर होता गया और 1977 में जनता पार्टी में विलीन हो गया।
जनता पार्टी का बिखराव
1975 की आपातकाल के बाद इंदिरा गांधी के विरोध में कई विपक्षी दलों ने मिलकर 1977 में ‘जनता पार्टी’ का गठन किया था। लेकिन वैचारिक मतभेद और नेतृत्व की महत्वाकांक्षा के कारण यह गठबंधन ज्यादा दिन नहीं चल सका।
ऐसे में साल 1979 में, पूर्व जनसंघ के सदस्यों की राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) में ‘दोहरी सदस्यता’ को लेकर पार्टी के भीतर भीषण विवाद छिड़ गया। इसके परिणामस्वरूप जनता पार्टी कई टुकड़ों में टूट गई और मोरारजी देसाई की सरकार गिर गई। इसी बिखराव की कोख से आगे चलकर 1980 में ‘भारतीय जनता पार्टी’ (BJP) का जन्म हुआ।
1980-1990 का दशक- एक साथ कई टूकड़ों में बंटा जनता दल
जब केंद्र में एक पार्टी का दबदबा कम होने लगा, तो राज्यों में मजबूत क्षेत्रीय पार्टियों का जन्म हुआ। ऐसे में आंध्र प्रदेश में तेलुगु देशम पार्टी (1982) सामने आई। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी (1992) और बहुजन समाज पार्टी (BSP) ने अपनी ताकत बढ़ाई। इसी दौर में जनता दल भी कई बार टूटा। इससे राष्ट्रीय जनता दल (RJD), जनता दल यूनाइटेड (JDU), बीजू जनता दल (BJD) और लोक जनशक्ति पार्टी (LJP) जैसी नई पार्टियां बनीं।
1999- राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) का गठन
सदी के अंत में कांग्रेस को एक और बड़ा झटका लगा, जब विदेशी मूल के मुद्दे पर पार्टी के बड़े नेता अलग हो गए। इसका कारण था कि शरद पवार, पीए. संगमा और तारिक अनवर जैसे वरिष्ठ नेताओं ने सोनिया गांधी के विदेशी मूल का होने का मुद्दा उठाया और कांग्रेस छोड़ दी। इन नेताओं ने मिलकर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) नाम से एक नया राजनीतिक दल बनाया।
AIADMK में उत्तराधिकार युद्ध, अलग हो गए थे विचार
अब बात तमिलनाडु की राजनीति में ऐसे विखराव की करते हैं। समय था दिसंबर 2016 का… तमिलनाडु की कद्दावर नेता जे जयललिता के निधन के बाद एआईएडीएमके (AIADMK) के भीतर विरासत की जंग शुरू हो गई। एक गुट की कमान वीके शशिकला और उनके भतीजे टीटीवी दिनाकरण के हाथों में थी, जबकि दूसरे गुट का नेतृत्व ओ पनीरसेल्वम कर रहे थे। बाद में इडाप्पडी के पलानीस्वामी भी इस सत्ता संघर्ष के केंद्र में आ गए।
यह विवाद चुनाव आयोग तक पहुंचा, जिसने 2017 में पार्टी के मशहूर ‘दो पत्ती’ चुनाव चिन्ह को फ्रीज (जब्त) कर दिया था। लंबी कानूनी और राजनीतिक लड़ाई के बाद ईपीएस-ओपीएस गुट को पार्टी का नाम और चुनाव चिन्ह वापस मिला, जबकि दिनाकरण ने अलग होकर अपनी नई पार्टी बना ली।
समाजवादी पार्टी का पारिवारिक दंगल
2017 उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से ठीक पहले समाजवादी पार्टी में मुलायम सिंह यादव और उनके बेटे अखिलेश यादव के बीच संगठन पर नियंत्रण को लेकर एक नाटकीय पारिवारिक और राजनीतिक युद्ध छिड़ गया था। टिकट बंटवारे और वर्चस्व की इस लड़ाई में पार्टी दो फाड़ होने की कगार पर थी।
इसके बाद जनवरी 2017 में, चुनाव आयोग ने एक बड़ा फैसला सुनाते हुए अखिलेश यादव के गुट को ही ‘असली समाजवादी पार्टी’ माना और पार्टी का मुख्य चुनाव चिन्ह ‘साइकिल’ उन्हें सौंप दिया। बाद में मुलायम सिंह यादव ने भी बेटे के नेतृत्व को स्वीकार कर लिया। ये परिवारिक युद्ध राष्ट्रीय स्तर पर खूब चर्चा में रहा था।
लोक जनशक्ति पार्टी में चाचा-भतीजे की जंग
साल 2020 में रामविलास पासवान के निधन के बाद लोक जनशक्ति पार्टी के भीतर नेतृत्व को लेकर परिवार में ही दरार पड़ गई। 2021 में एलजेपी के 6 में से 5 सांसदों ने चिराग पासवान के खिलाफ बगावत कर दी और उनके चाचा पशुपति कुमार पारस का समर्थन किया।
इसके बाद चुनाव आयोग ने पार्टी के चुनाव चिन्ह को फ्रीज कर दिया और दोनों गुटों को अलग-अलग मान्यता दी। ऐसे में लंबी लड़ाई के बाद चिराग पासवान को ‘लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास)’ के रूप में नई पहचान मिली, जबकि पारस एक अलग धड़े के नेता बने रहे।
शिवसेना का अप्रत्याशित तख्तापलट
महाराष्ट्र की राजनीति में शिवसेना का विभाजन हाल के वर्षों की सबसे बड़ी राजनीतिक उथल-पुथल माना जाता है। जून 2022 में वरिष्ठ नेता एकनाथ शिंदे ने पार्टी प्रमुख उद्धव ठाकरे के खिलाफ एक बड़ा विद्रोह कर दिया। शिवसेना के अधिकांश विधायक और सांसद शिंदे के साथ चले गए, जिससे महाविकास अघाड़ी (MVA) की सरकार गिर गई।
इसके बाद फरवरी 2023 में चुनाव आयोग ने बहुमत के आधार पर एकनाथ शिंदे के गुट को ही ‘असली शिवसेना’ माना और उन्हें मूल नाम के साथ ‘तीर-कमान’ का चुनाव चिन्ह आवंटित कर दिया। उद्धव ठाकरे के गुट को ‘शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे)’ नाम और नया चुनाव चिन्ह मिला।
एनसीपी का विभाजन
शिवसेना के बाद महाराष्ट्र में दूसरा बड़ा झटका राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) को लगा। जुलाई 2023 में अजीत पवार ने अपने चाचा और पार्टी के संस्थापक शरद पवार के खिलाफ बगावत का बिगुल फूंक दिया। अजीत पवार कई विधायकों के साथ भाजपा-शिवसेना सरकार में शामिल हो गए।
फरवरी 2024 में चुनाव आयोग ने अजीत पवार के धड़े को ही ‘असली एनसीपी’ के रूप में मान्यता दी और पार्टी का ‘घड़ी’ चुनाव चिन्ह उन्हें सौंप दिया। इसके बाद शरद पवार के समूह को ‘राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार)’ नाम से नया दल बनाना पड़ा।
आखिर क्यों टूटती हैं राजनीतिक पार्टियां?
भारत में राजनीतिक दलों के बिखरने के पीछे कई मुख्य वजह रही हैं। इतिहास गवाह है कि इसमें नेतृत्व को लेकर आपसी होड़ और उत्तराधिकार (वारिस) का विवाद। पार्टी के भीतर नेताओं के बीच वैचारिक मतभेद। क्षेत्रीय मांगें और स्थानीय लोगों की आकांक्षाएं। व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा और कुर्सी की लड़ाई। दिल्ली में बैठे केंद्रीय नेतृत्व के मनमाने फैसलों का विरोध रहा है और चुनाव जीतने की रणनीतियां और गठबंधन की मजबूरी रही हैं।
अब समझिए टीएमसी के सामने क्या है चुनौती?
वर्तमान परिस्थितियों को देखें तो तृणमूल कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने राजनीतिक वजूद और आंतरिक अनुशासन को बचाए रखने की है। ऐसे में यदि पार्टी के भीतर चल रही यह बगावत और बड़ी होती है, और विरोधी गुट खुद को ‘असली टीएमसी’ होने का दावा करने लगते हैं, तो यह राजनीतिक लड़ाई संसद या विधानसभा से निकलकर सीधे चुनाव आयोग के दफ्तर पहुंचेगी। हालांकि इतिहास गवाह है कि भारत के सबसे बड़े और नाटकीय राजनीतिक तलाक के फैसले आखिरकार चुनाव आयोग की चौखट पर ही तय हुए हैं।
भारत का इतिहास, क्यों समय-समय पर बदला सियासी नक्शा?
गौरतलब है कि लभारत की आजादी के बाद का राजनीतिक सफर सिर्फ मजबूत पार्टियों के उभरने का ही नहीं, बल्कि उनके टूटने, आपस में मिलने और नए गठबंधन बनने का भी गवाह रहा है। देश की राजनीति में वैचारिक मतभेद, नेतृत्व की लड़ाई, क्षेत्रीय आकांक्षाएं और सत्ता का संघर्ष ऐसे कारण रहे हैं, जिन्होंने समय-समय पर पूरे देश का सियासी नक्शा बदल दिया। इन विभाजनों ने न केवल राष्ट्रीय राजनीति की दिशा बदली, बल्कि केंद्र और राज्यों की सरकारों को भी गहराई से प्रभावित किया।
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