संपादकीय….
एआई का खौफ नौकरियों पर!

संजय सक्सेना
देश में आईटी, कानून, कॉमर्स, ट्रांसलेशन, डिजाइन और लाइब्रेरी साइंस जैसे क्षेत्रों में बड़ा उलटफेर शुरू हो चुका है। एआई के टूल्स ने उन कामों को या तो खत्म कर दिया है या बेहद सिकोड़ दिया है, जिनके लिए लाखों छात्र हर साल डिग्रियां लेते हैं।
एचआर कंपनी टीमलीज का कहना है कि 40 प्रतिशत कंपनियां ‘हाइब्रिड स्किल’ यानी डिग्री के साथ एआई टूल्स की जानकारी को अनिवार्य मानती हैं। नैस्कॉम की 2024 की रिपोर्ट कहती है कि देश में 82 प्रतिशत बीसीए और एमसीए ग्रेजुएट्स के पास एआई टूल्स की औपचारिक ट्रेनिंग नहीं है। और हमारे देश में तो एआई क्या, करोड़ों लोगों को कंप्यूटर की जानकारी ही नहीं है।
विश्व इकोनॉमिक फोरम की रिपोर्ट के अनुसार, नौकरियां उन लोगों के पास रहेंगी, जो एआई टूल का इस्तेमाल करके उत्पादकता यानी प्रोडक्टिविटी 40 प्रतिशत तक बढ़ा सकते हैं। आईबीएम इंस्टीट्यूट फॉर बिजनेस वैल्यू की रिपोर्ट कहती है कि एआई लोगों की जगह नहीं लेगा, लेकिन जो लोग एआई का उपयोग करते हैं, वे उनकी जगह ले लेंगे, जो इस्तेमाल नहीं करते। ‘फ्यूचर ऑफ जॉब्स रिपोर्ट 2025’ के अनुसार, 2030 तक 22 प्रतिशत नौकरियां प्रभावित हो सकती हैं। इधर, चीन ने 2021 और 2025 के बीच अपने विश्वविद्यालयों ने 12,200 से अधिक अंडरग्रेजुएट कार्यक्रमों को रद्द या निलंबित कर दिया, जबकि लगभग 10,200 नए कार्यक्रम शुरू किए।
ऐसे में सवाल उठता है कि पारंपरिक डिग्री वालों का क्या होगा? हालांकि पारंपरिक डिग्रियां पूरी तरह बेकार नहीं होंगी, लेकिन उनका स्वरूप बदल रहा है। पढ़ाई का तरीका और कंटेंट नहीं बदला, तो उन डिग्रियों की कोई वैल्यू नहीं बचेगी। बाजार में केवल थ्योरी या रट्टा वाले औसत छात्रों की जरूरत खत्म हो रही है। उन्हें अपग्रेड करना होगा।
जो डिग्री ले रहे हैं, वे क्या कर सकते हैं? जो छात्र अभी सेकेंड या थर्ड ईयर में हैं, वे लाइव प्रोजेक्ट पर काम शुरू करें। एआई टूल्स का प्रोफेशनल लाइसेंस लें, उस पर 6 महीने रात-दिन काम करें और सॉफ्टवेयर या वेबसाइट्स बनाएं।
डिग्री पूरी कर चुके युवाओं के लिए सबसे बेहतरीन रास्ता है, इंटर्नशिप और प्रैक्टिकल प्रोजेक्ट। यदि आपको किसी बड़ी कंपनी में मौका नहीं मिल रहा है, तो छोटे स्टार्टअप, एनजीओ या अपने स्थानीय क्षेत्र की किसी फैक्ट्री या दुकान के पास जाएं। उनकी समस्याओं को समझें और एआई के माध्यम से उन्हें सुलझाएं। विशेषज्ञों की बात करें तो उनके अनुसार ‘ग्रेजुएशन’ की वैल्यू फिलहाल केवल इतनी रहेगी कि भारत में नौकरी के आवेदन शॉर्टलिस्ट करने के लिए यह फिलहाल बेसिक अनिवार्यता है। यह स्थिति अगले 3 से 5 साल तक बनी रहेगी, ऐसा माना जा रहा है। लेकिन इसके बाद नई शिक्षा नीति का ‘5.5 क्रेडिट स्कोर’ इसे रिप्लेस कर देगा, जहां प्रैक्टिकल काम और प्रोफेशनल कोर्सेज के जरिए अंक मिलेंगे। आने वाले समय में लोग डिग्री के बजाय ‘5.5 स्केलर’ पूछेंगे। टेक वल्र्ड में पहली नौकरी के बाद कोई आपकी डिग्री नहीं पूछेगा।
ऐसे में जॉब पाने का सबसे अच्छा तरीका है कि आप ‘10& इंजीनियर’ या ‘10& प्रोफेशनल’ बनें यानी जो अकेले 10 सामान्य लोगों का काम संभाल सके। अगर आप एआई की मदद से किसी कंपनी का समय और लागत बचा सकते हैं, तो जहां पहले 5 लाख रु. का शुरुआती पैकेज मिलता था, वहां आज कंपनियां 25 लाख रु. की शुरुआती तनख्वाह देने को तैयार हैं। कंपनियों को अब ‘औसत’ लोग नहीं, बल्कि काम के लोग चाहिए।
खास बात यह है कि जैसे की एआई का दौर आया, लोगों ने हर जगह दुकान खोल कर एआई के नाम पर कोर्स शुरू कर दिए। लेकिन किसी भी संस्थान से एआई का सर्टिफिकेट ले लेने से नौकरी की कोई गारंटी नहीं होगी। नौकरी तभी मिलेगी जब बुनियादी योग्यता होगी, एआई का व्यावहारिक ज्ञान होगा और असेसमेंट टेस्ट क्लियर करेंगे।
एंट्री लेवल यानी फ्रेशर्स की जॉब्स को लेकर फिलहाल दबाव बना हुआ है, लेकिन जो बुनियादी काम पहले 10 लोग मिलकर करते थे, वह अब दो लोग एआई की मदद से निपटा रहे हैं। इंफोसिस, विप्रो और टीसीएस जैसी ट्रेडिशनल कंपनियों ने शुरुआत में फ्रेशर्स की हायरिंग टाल दी है। लेकिन माना जा रहा है कि नौकरियों की बढ़ोतरी होने की उम्मीद है।
हमारे देश में फिलहाल ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स यानी जीसीसी की बाढ़ आई हुई है। देश में 4000 से ज्यादा जीसीसी हैं और हर हफ्ते दो नए सेंटर खुल रहे हैं। अधिकांश सेंटर्स एआई स्किल्स वाले युवाओं को बड़े पैकेज पर ले रहे हैं, लेकिन जो भारतीय ऐसी ग्लोबल कंपनियां बनाकर देश में उनके कार्यालय खोल रहे हैं, वहां बहुत कम पैकेज दे रहे हैं।
असल में वैश्विक संगठनों को समझ आने लगा है कि एआई की कॉस्ट यानि टोकन और जीपीयू प्रोसेसिंग लागत, इंसानी लागत से कम नहीं है। कई स्टार्टअप्स का एआई बिल इतना ज्यादा आ रहा है कि वे एआई टूल्स के बजाय दो इंसानों को हायर करना बेहतर समझ रहे हैं।
एआई के दौर में चार मानवीय खूबियां सबसे कीमती हो गई हैं। इनमें एग्रीगेशन एबिलिटी यानि चीजों को आपस में जोडऩे की समझ, डिसीजन मेकिंग यानि निर्णय क्षमता, हाई इमोशनल कोशेंट और अपनी बात को प्रभावी ढंग से बयांन करने का हुनर शामिल हैं। हॉस्पिटैलिटी, डेटा साइंसेज, सेल्स और एआई-असिस्टेड स्पेशलिस्ट्स की भूमिकाएं सुरक्षित और मजबूत रह सकेंगी। मध्यप्रदेश से लेकर कई राज्यों में इंजीनियरिंग के कई कोर्स की सीटें लगातार कम हो रही हैं। कई कालेज ही बंद होने की कगार पर पहुंच चुके हैं। एआई की मांग बढ़ रही है।
भविष्य में क्या होगा, ये तो कोई नहीं जानता, लेकिन फिलहाल तो नौकरियां कम होती दिखाई दे रही हैं। हर सेक्टर में छंटनी का माहौल बन रहा है। भारत जैसे देश में एआई की बात तो बहुत हो रही है, लेकिन जब यहां सामान्य तकनीकी कौशल के नाम पर कंप्यूटर तक जानने वाले लोग मुट्ठी भर हैं, तो एआई प्रोफेशनल की स्थिति क्या होगी?

