Editorial
उद्धव का करिश्मा…!

लोकसभा चुनाव में जहां उत्तर प्रदेश ने राजनीति को नया मोड़ दे दिया है, वहीं महाराष्ट्र में भी उठापटक और दलबदल का नुकसान सत्तापक्ष को हुआ है। इस लोकसभा चुनाव में उद्धव ठाकरे की पार्टी ने महाराष्ट्र में एक तरह से करिश्मा कर दिया है। शिवसेना (यूबीटी) ने महा विकास अघाड़ी गठबंधन के साथ मिलकर लोकसभा की 9 सीटें जीतीं। हालांकि उद्धव ठाकरे के लिए नतीजे भले ही मिले-जुले रहे हैं, लेकिन उन्होंने यह कामयाबी तब हासिल की जब उनके हाथ से सबकुछ चला गया था। इसलिए यह उनकी धमाकेदार वापसी को ही इंगित करता है।
एमवीए की सरकार गिरने के बाद उद्धव ने अपनी पार्टी का आधिकारिक नाम और चुनाव चिन्ह प्रतिद्वंद्वी एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली पार्टी के हाथों खो दिया। शिंदे ने दो साल पहले जब से शिवसेना के अधिकांश सांसदों और विधायकों को बीजेपी के साथ गठबंधन के लिए तैयार किया था। तब से उद्धव ठाकरे ने ‘मशाल’ या जलती हुई मशाल (उनका चुनाव चिन्ह) के इर्द-गिर्द विश्वासघात की कहानी गढ़ी थी। शिवसेना (यूबीटी) ने शिंदे के नेतृत्व वाली पार्टी से दो सीटें ज़्यादा और 13 में से सात सीटें जीती हैं, जहां उसका मुकाबला बीजेपी से था।
मुंबई में जहां पार्टी की स्थापना हुई थी, शिवसेना (यूबीटी) ने चार में से तीन सीटें जीतीं। लेकिन कोंकण में उसे हार का सामना करना पड़ा, जो उसका एक और गढ़ था। उद्धव ठाकरे ने कहा कि मुझे उम्मीद थी कि हम ज़्यादा सीटें जीतेंगे। मुंबई उत्तर पश्चिम को लेकर हमें कुछ संदेह है। हम रवींद्र वायकर के चुनाव को चुनौती देंगे। हम कोंकण में सीट हार गए हैं। यह आश्चर्य की बात है लेकिन हम देखेंगे कि ऐसा क्यों हुआ। यह परिणाम ठाकरे के लिए मुक्ति का संकेत हैं। इन्होंने कांग्रेस और एनसीपी के साथ साझा कारण बनाने के लिए कट्टर हिंदुत्व के आदर्शों पर आधारित पार्टी का पुनर्गठन किया।
चुनाव परिणामों के विश्लेषण से माना जा रहा है कि शिवसेना के मूल मराठी मतदाता ठाकरे के साथ बने हुए हैं और वह मुस्लिम और दलित मतदाताओं को जोडऩे में कामयाब रहे हैं। यह उन्हें विधानसभा चुनावों के लिए सबसे स्वीकार्य चेहरा बनाता है। लोकसभा के परिणाम यह भी दिखाते हैं कि एमवीए सहयोगियों के बीच वोट हस्तांतरित हो सकता है। कृषि संकट और नौकरियों और मूल्य वृद्धि की चिंता के बीच राज्य में मजबूत सत्ता विरोधी लहर के चलते ठाकरे विधानसभा चुनावों के लिए मिशन मोड में होंगे। महाराष्ट्र में गुजराती बनाम मराठा की जंग तेज होती दिख रही है।
शिवसेना (यूबीटी) के पदाधिकारियों को भी उम्मीद है कि शिंदे गुट के कई कार्यकर्ता और मध्यम स्तर के पदाधिकारी वापस आएंगे। हालांकि ठाकरे ने कहा है कि दलबदलू विधायकों और सांसदों के लिए उनके दरवाजे बंद हैं, लेकिन वे मध्यम स्तर के पदाधिकारियों और जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं को वापस ले सकते हैं। अगर विधायकों और सांसदों को वापस नहीं लिया जाता है, तो भी उद्धव पूर्व पार्षदों और शाखा स्तर के कार्यकर्ताओं को लुभाने के लिए बहुत अधिक प्रयास कर सकते हैं। अक्टूबर में सेना (यूबीटी) एमवीए के भीतर विधानसभा सीटों के एक बड़े हिस्से पर भी नजर रखेगी।
उत्साहित उद्धव ठाकरे ने चुनाव जीतने वाले अपनी पार्टी के उम्मीदवारों से मुलाकात करने पर कहा कि लोकसभा चुनाव के नतीजों ने दिखा दिया है कि भारतीय जनता पार्टी को हराया जा सकता है। यह भ्रम कि उसे हराया नहीं जा सकता है, टूट गया है। इससे संकेत मिलते हैं कि आने वाले विधानसभा चुनाव में शिवसेना उद्धव को और अधिक सफलता मिल सकती है।
अगर महाराष्ट्र में कांग्रेस की बात करें तो 2024 लोकसभा चुनावों पहले कांग्रेस पार्टी को महाराष्ट्र में एक के बाद एक तीन बड़े झटके लगे थे। भारत जोड़ो न्याय यात्रा की शुरुआत वाले दिनों पार्टी नेता मिलिंद देवड़ा ने इस्तीफा दे दिया था। देवड़ा ने सीधा हमला राहुल गांधी पर बोला था और फिर वह शिवसेना में शामिल हो गए थे। इसके बाद पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण और फिर मुंबई कांग्रेस को अध्यक्ष रह चुके संजय निरुपम ने पार्टी छोड़ दी थी। ऐसे में माना गया था कि कांग्रेस को इन नेताओं के जाने से बड़ा नुकसान होगा, लेकिन इसके उलट राज्य में कांग्रेस पार्टी सबसे बड़ी गेनर के तौर उभरी है। यानि कांग्रेस को यहां सबसे ज्यादा फायदा मिला है। महायुति में अगर एकनाथ शिंदे का स्ट्राइक रेट अच्छा है तो महाविकास आघाडी कांग्रेस न सिर्फ बड़ी पार्टी है बल्कि राज्य में वह सबसे बड़ी पार्टी बन गई। कांग्रेस को 2014 में दो, 2019 में एक और अब 13 सीटें मिली हैं।
ऐसे में चर्चा हो रही है कि कांग्रेस के इन बड़े चेहरों के जाने से पार्टी को कितना नुकसान हुआ? ऐसे में देखा जाए तो पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण के बीजेपी में जाने कांग्रेस को नुकसान नहीं हुआ है। पार्टी उनके जाने के बाद भी उनकी सीट भी जीतने में सफल रही। पार्टी के कैंडिडेट वसंत राव चव्हाण यहां से 54 हजार वोटों से जीते। उन्होंने बीजेपी के कैंडिडेट प्रताप चिखलीकर को हराया। नांदेड की सीट पर न सिर्फ कांग्रेस वापसी करने में सफल रही बल्कि अपने वोट प्रतिशत को बढ़ाने में सफल रही। कांग्रेस को इस 7.34 फीसदी अधिक वोट मिले। 2019 के लोकसभा चुनाव में खुद अशोक चव्हाण यहां से चुनाव लड़े थे। उन्हें हार कार सामना करना पड़ा था।
इसी तरह शरद पवार का पावर भी बढ़ गया है, लेकिन दूसरी तरफ भाजपा नीत गठबंधन की हालत राज्य में खराब होती दिख रही है। उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने तो इस्तीफे की पेशकश ही कर दी है। महाराष्ट्र के दो दिग्गज नेता रहे गोपीनाथ मुंडे और प्रमोद महाजन की विरासत भी अब राजनीतिक परिदृश्य से गायब होती दिख रही है। देखना होगा कि आने वाले समय में महाराष्ट्र में और क्या परिवर्तन होता है, राजनीतिक उलटफेर का दौर एक बार फिर तेज हो सकता है।
– संजय सक्सेना

Sanjay Saxena

BSc. बायोलॉजी और समाजशास्त्र से एमए, 1985 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय , मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के दैनिक अखबारों में रिपोर्टर और संपादक के रूप में कार्य कर रहे हैं। आरटीआई, पर्यावरण, आर्थिक सामाजिक, स्वास्थ्य, योग, जैसे विषयों पर लेखन। राजनीतिक समाचार और राजनीतिक विश्लेषण , समीक्षा, चुनाव विश्लेषण, पॉलिटिकल कंसल्टेंसी में विशेषज्ञता। समाज सेवा में रुचि। लोकहित की महत्वपूर्ण जानकारी जुटाना और उस जानकारी को समाचार के रूप प्रस्तुत करना। वर्तमान में डिजिटल और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े। राजनीतिक सूचनाओं में रुचि और संदर्भ रखने के सतत प्रयास।

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