चंबल के बाद अब नारायणी नदी बनी घड़ियालों की नई शरणस्थली, संख्या 1,000 पार होने का अनुमान
कुशीनगर। भारत-नेपाल सीमा से होकर बहने वाली गंडक (नारायणी) नदी अब संकटग्रस्त घड़ियालों के संरक्षण का एक प्रमुख केंद्र बनकर उभर रही है। स्वच्छ जलधारा, गहरे जलकुंड, विस्तृत रेतीले तट और अपेक्षाकृत सुरक्षित पारिस्थितिकी तंत्र के कारण यह नदी घड़ियालों के लिए आदर्श प्राकृतिक आवास साबित हो रही है। यही वजह है कि चंबल नदी के बाद देश में घड़ियालों की सबसे महत्वपूर्ण आबादी अब गंडक में देखने को मिल रही है।
वर्ष 2025 की आधिकारिक गणना के अनुसार वाल्मीकिनगर बैराज से सोनपुर तक लगभग 326 किलोमीटर लंबे नदी क्षेत्र में 372 घड़ियाल दर्ज किए गए हैं। संरक्षण एजेंसियों और वन विभाग का अनुमान है कि वर्ष 2026 में नवजात शिशुओं को शामिल करने पर इनकी संख्या एक हजार से अधिक पहुंच सकती है। हाल ही में जन्मे 31 नवजात घड़ियालों को भी नदी में छोड़ा गया है, जिससे यहां की आबादी में और वृद्धि होने की उम्मीद है।
विशेषज्ञों के अनुसार गंडक नदी का प्राकृतिक स्वरूप घड़ियालों के प्रजनन और विकास के लिए बेहद अनुकूल है। वर्ष 2016 में पहली बार यहां प्राकृतिक प्रजनन के प्रमाण मिले थे। इसके बाद घड़ियालों की संख्या लगातार बढ़ती गई। वर्ष 2023 में नदी किनारे नौ घोंसले मिले थे, जिनमें से एक उत्तर प्रदेश के कुशीनगर जिले के तमकुही रेंज में पाया गया था।
वाल्मीकि टाइगर रिजर्व के निदेशक गौरव ओझा के अनुसार, वाइल्डलाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया ने भी माना है कि गंडक नदी में घड़ियाल पूरी तरह से अनुकूलित हो चुके हैं और प्राकृतिक रूप से अंडे दे रहे हैं। यह जैव-विविधता संरक्षण के क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि है।
घड़ियालों की बढ़ती संख्या को देखते हुए सरकार इस क्षेत्र को इको-टूरिज्म से जोड़ने की तैयारी कर रही है। गंडक नदी के चुनिंदा हिस्सों में घड़ियाल सफारी और बर्ड वॉचिंग प्वाइंट विकसित किए जाने की योजना है। इसके तहत नदी किनारे वॉच टावर बनाए जाएंगे और प्रशिक्षित गाइडों की व्यवस्था की जाएगी, ताकि पर्यटक सुरक्षित तरीके से घड़ियालों और अन्य वन्यजीवों को करीब से देख सकें। अधिकारियों का मानना है कि इससे पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा मिलने के साथ-साथ स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर भी सृजित होंगे।