पिताओं की बदलती भूमिका: भारतीय संदर्भ में एक आकलन
भारत में पिता की कहानी सिर्फ “पुराना vs नया” नहीं है। ये “कर्तव्य vs जुड़ाव” की कहानी है। और ये कहानी शहर-गांव, अमीर-गरीब, हर घर में अलग-अलग चल रही है।
पारंपरिक भारत में पिता बरगद थे। जड़ें जमीन में, छाया घर पर। उनकी भूमिका थी कमाना, इज्जत बचाना, फैसला लेना। प्यार दिखाना “कमजोरी” मानी जाती थी।
बेटा-बेटी पिता से डरते थे, पर टूटने पर उसी कंधे पर सिर रखते थे।
“पिता भगवान होते हैं” – ये वाक्य डर और श्रद्धा दोनों से बना था।
पिता मैदान में नहीं दिखते थे। वो पीछे खड़े थे, जैसे मंदिर की दीवार। दिखती नहीं, पर छत संभालती है।
आज का शहरी पिता”किस्तों में बंटा सुपरमैन”है।शहरों बदलाव भी सबसे तेज है। प्ले-स्कूल, Zomato, YouTube वाले पिता यहीं हैं। यहां भूमिका है कमाना + खिलाना + होमवर्क कराना + PTM अटेंड करना + रील बनाना।
वो अकाउंटेंट भी है, डिलीवरी बॉय भी, हेल्पलाइन भी। पिता अब “इनवॉल्व्ड” हैं। बाप-बेटी डांस वीडियो, बाप-बेटा क्रिकेट जैसा माहौल 20 साल पहले अकल्पनीय था।
समाज अब पिता से “नया पिता” बनने की मांग करता है। ऑफिस में 8 घंटे, घर आकर 4 घंटे “एक्टिव पिता”। वो थक रहा है। सुरंग में लेटा पिता इसी थकान का प्रतीक है। गांव और कस्बे इस लिहाज से मुश्किल जगहें है। यहां बदलाव हो रहा है, पर रफ्तार धीमी है। वहां भूमिका है -खेत-खलिहान संभालते हुए बेटे को NEET की कोचिंग का फॉर्म भरना। बेटी को कॉलेज भेजते हुए मोहल्ले की बातें सुनना।
वो पुराने पिता जैसा कठोर नहीं बन पाता, नए पिता जैसा “दोस्त” भी नहीं बन पाता।
बेटी बोले “पापा पिज्जा खाना है”, वो बोले “रोटी खा ले” – पर पैसे दे देता है। डांटता भी है, प्यार भी करता है।
ये “संक्रमण काल का पिता” है। पुरानी इज्जत बचानी है, नई आजादी भी देनी है।
पहले दादा-दादी, चाचा-ताऊ थे। पिता पर अकेले बोझ नहीं था। अब न्यूक्लियर परिवार में पिता ही “पिता+मां+दोस्त+टीचर” सब है। इसलिए वो “किस्तों में बंटा” दिखता है।
पश्चिम में पिता “फेल” हो जाए तो “कोशिश कर रहा है” कहा जाता है। भारत में पिता के फेल होने का मतलब “खानदान की नाक कट गई”। इसलिए भारतीय पिता जोखिम कम लेता है। बेटे को दोस्त बनाता है, पर मर्यादा की लकीर खींच देता है।
पुरानी पीढ़ी के पिता प्यार करते थे, जताते नहीं थे। नई पीढ़ी के पिता जताना सीख रहे हैं। पर जुबान लड़खड़ाती है। “I love you beta” बोलते समय उन्हें अपना बाप याद आ जाता है जिसने कभी गले नहीं लगाया।
पश्चिम जैसा “परफेक्ट डैड” भारत में नहीं बनेगा। यहां पिता “जुगाड़ू पिता” बन रहा है।
वो ऑफिस से लेट आया, पर बेटे के लिए समोसा ले आया। वो मैथ नहीं समझा पाया, पर बेटी के टूटे दिल को चाय पिलाकर संभाल लिया।
इसतरह स्थिति सुधर रही है। पिता घर के अंदर आ रहा है। रसोई तक, बाथरूम तक, बेटी के कमरे तक।
पर वो अभी सीख रहा है। कभी गलती करेगा, कभी डांट देगा, कभी फोन में खो जाएगा। माफ कर दो उसे।
क्योंकि जो पिता कल सिर्फ “पैसा” था, आज वो “समय” देने की कोशिश कर रहा है। और भारत में समय देना, पैसा देने से ज्यादा मुश्किल है।
आपके आसपास कौन सा पिता सबसे ज्यादा दिखता है ?