उद्धव ठाकरे के 6 बागी सांसदों की नई शर्त से बढ़ी हलचल…एकनाथ शिंदे की शिवसेना नहीं, भाजपा बनी पहली पसंद
मुंबई। महाराष्ट्र की राजनीति में शिवसेना (यूबीटी) के भीतर उभरे संकट ने नया मोड़ ले लिया है। उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली पार्टी के 9 में से 6 सांसदों की नाराजगी अब खुली बगावत में बदलती दिखाई दे रही है। पहले अटकलें लगाई जा रही थीं कि ये सांसद उपमुख्यमंत्री Eknath Shinde के नेतृत्व वाली शिवसेना में शामिल हो सकते हैं, लेकिन अब सूत्रों के हवाले से सामने आ रही जानकारी ने राजनीतिक समीकरणों को और जटिल बना दिया है।
बताया जा रहा है कि बागी सांसदों की पहली पसंद शिंदे गुट नहीं बल्कि Bharatiya Janata Party है। सूत्रों के अनुसार, ये सांसद यदि शिंदे की शिवसेना के साथ जाते भी हैं तो वे अगले लोकसभा चुनाव में भाजपा की ओर से टिकट मिलने का स्पष्ट आश्वासन चाहते हैं। इस मांग ने महायुति के भीतर संभावित राजनीतिक पुनर्संतुलन की चर्चाओं को तेज कर दिया है।
कौन हैं बगावत करने वाले सांसद?
उद्धव ठाकरे गुट के जिन छह सांसदों के नाम चर्चा में हैं, उनमें संजय दीना पाटिल, संजय देशमुख, संजय जाधव, भाऊसाहेब वाकचौरे, नागेश पाटिल अस्तिकर, ओमप्रकाश राजे निम्बालकर के नाम शामिल बताए जा रहे हैं।
इन सांसदों ने गुरुवार को आयोजित शिवसेना (यूबीटी) संसदीय दल की बैठक में हिस्सा नहीं लिया और पार्टी व्हिप की भी अनदेखी की। इसके बाद से यह माना जा रहा है कि उनका पार्टी नेतृत्व से गंभीर मतभेद चल रहा है।
संजय राउत का बड़ा आरोप
इस बीच शिवसेना (यूबीटी) सांसद Sanjay Raut ने बागी सांसदों पर तीखा हमला बोला है। राउत का दावा है कि बागी खेमे में केंद्रीय मंत्री पद को लेकर अंदरूनी संघर्ष चल रहा है।
उन्होंने आरोप लगाया कि छह सांसदों में से केवल एक को मंत्री बनाया जा सकता है, इसलिए बाकी नेताओं को कथित तौर पर 25 करोड़ रुपये देने का समझौता किया गया है। इससे पहले भी राउत बागी सांसदों को 10 करोड़ रुपये का ऑफर मिलने का दावा कर चुके हैं। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और संबंधित पक्षों की ओर से इस पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
स्थापना दिवस पर पोस्टरों से जवाब
उधर, अविभाजित शिवसेना के 60वें स्थापना दिवस के अवसर पर उद्धव ठाकरे गुट ने मुंबई में बड़े पैमाने पर पोस्टर अभियान शुरू किया है। इसे कथित ‘ऑपरेशन टाइगर’ के जवाब के रूप में देखा जा रहा है।
पोस्टरों पर लिखा गया है:
“गद्दार बदले, चेहरे बदले… पर विचार नहीं!”
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह अभियान 2022 में हुए शिवसेना विभाजन और हालिया सांसदों की नाराजगी के बीच पार्टी कार्यकर्ताओं का मनोबल बनाए रखने की कोशिश है। उद्धव गुट यह संदेश देने का प्रयास कर रहा है कि नेताओं के आने-जाने के बावजूद पार्टी की मूल विचारधारा, मराठी अस्मिता और हिंदुत्व की राजनीतिक लाइन बरकरार है।
क्या हैं राजनीतिक मायने?
यदि उद्धव ठाकरे गुट के छह सांसद वास्तव में भाजपा के करीब जाने की कोशिश कर रहे हैं, तो यह केवल शिवसेना (यूबीटी) के लिए ही नहीं बल्कि महाराष्ट्र की विपक्षी राजनीति के लिए भी बड़ा झटका हो सकता है। दूसरी ओर, भाजपा और शिंदे गुट के लिए भी सीट बंटवारे और भविष्य के टिकट वितरण को लेकर नई चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं।
फिलहाल बागी सांसदों ने सार्वजनिक रूप से अपने अगले कदम का ऐलान नहीं किया है, लेकिन उनकी नाराजगी ने महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर सत्ता और संगठन के समीकरणों को चर्चा के केंद्र में ला दिया है।