Editorial
चुनाव आयोग: जिम्मेदारी बनाम औपचारिकता

चुनाव आयोग को लेकर आज जितने सवाल उठाए जा रहे हैं, उतने शायद ही पहले कभी उठाए गए हों। इस बार बड़ा सवाल उठा, उसके द्वारा करीब एक सप्ताह बाद बढ़ाए गए मतदान के आंकड़ों पर। सवाल लाजिमी है। इतने सालों से चुनाव ईवीएम से ही होता आ रहा है, लेकिन चौबीस घंटे से ज्यादा मतदान के आंकड़ों को एकत्र करके घोषित करने में नहीं लगे। इस मामले को सुप्रीम कोर्ट में भी उठाया गया है।
चुनाव आयोग की भूमिका क्या सही में संदिग्ध हो गई है? मतदान के आंकड़ों को लेकर जो चर्चा अब चल रही है, उसका सार तो यही है। ऐसा कभी नहीं हुआ कि दूसरे दिन सुबह तक जो आंकड़े मतदान के आए हों, कुछ दिन बाद उसमें एक करोड़ वोट बढ़ जाएं। यानि सीधे-सीधे बड़े पैमाने पर गड़बड़ी की गई है। आशंका पहले से ही थी, लेकिन अब साफ-साफ समझ में आ रहा है कि चुनाव आयोग के ये आंकड़े प्रायोजित हैं।
विपक्षी नेताओं के बयान तो स्वाभाविक रूप से आएंगे ही, आ रहे हैं, लेकिन आज उनकी सुनता कौन है। यहां लोकतंत्र जैसा कुछ बचा ही नहीं दिख रहा है। ले-देकर थोड़ी बहुत उम्मीद सुप्रीम कोर्ट से ही है। मीडिया की दुंदुभि तो सबको पता है। नब्बे प्रतिशत मीडिया विश्वास खो चुका है। आम जनता भले ही कुछ बोल नहीं रही, लेकिन समझ तो सब रही है। देखना होगा कि वोट बढऩे के मामले में सर्वोच्च न्यायालय का क्या नजरिया रहता है।
बात चुनाव आयोग की ही है, तो उसकी निगाह विपक्ष पर ही अधिक रहती है। स्वाभाविक है, लेकिन उसने चौंकाते हुए देश की दो सबसे बड़ी पार्टियों के अध्यक्षों को आचार संहिता के बाहर जाने के लिए चेताया है। आदेश पर और चाहे जो भी कहा जाए, उसके औचित्य पर सवाल नहीं किया जा सकता। चिंता की बात तो यह है कि सत्तारूढ़ दल और सबसे बड़े विपक्षी दल के नेतृत्व को यह समझाने की जरूरत पड़ रही है कि सांप्रदायिक भाषणों और संविधान की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाले बयान नहीं दिए जाने चाहिए।
यह कोई नया मामला नहीं है। चुनाव आयोग ने एक महीने पहले ही शिकायत मिलने पर भाजपा और कांग्रेस के अध्यक्षों को नोटिस देकर आगाह किया था कि वे अपने स्टार प्रचारकों से भाषण के दौरान सावधानी बरतने को कहें। हालांकि तब आयोग के रेस्पॉन्स को कमजोर इस मायने में कहा गया था कि शिकायत तो पीएम नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी के खिलाफ थी, लेकिन नोटिस सीधे इन दोनों नेताओं के बजाय पार्टी अध्यक्षों को भेजा गया।
चुनाव आयोग के अब तक के चलन को देखते हुए यह तरीका नया था। भाषण किसी और का, शिकायत किसी और की हो रही है और आयोग किसी और को नोटिस या समझाइश दे रहा है। लेकिन इसका हल तो कोई निकला ही नहीं। सवाल-जवाब के क्रम में समय बीतता रहा और अब जब चुनाव आयोग का आदेश आया है तो पांच चरणों की वोटिंग हो चुकी है और छठे चरण का प्रचार भी समाप्त हो चुका है। कुल मिलाकर सातवें और आखिरी चरण का प्रचार ही बचा है।
फिर भी, चुनाव आयोग ने शिकायतों पर जो स्टैंड लिया, उसमें गड़बड़ी नहीं थी। जिस तरह के तीखे सांप्रदायिक मुद्दे इस बार चुनाव प्रचार में छाए रहे, वे उचित नहीं कहे जा सकते। संविधान बदले जाने का जो आरोप विपक्ष ने जोर-शोर से उठाया उसके औचित्य पर भी सवाल उठने लाजिमी हैं। खासकर इसलिए कि संविधान में संशोधन शुरू से होते रहे हैं, लेकिन संविधान के बुनियादी ढांचे में कोई बदलाव नहीं हो सकता है, ऐसा सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार साबित किया है।
आयोग को इस अनुभव की रोशनी में भविष्य की अपनी कार्यशैली पर पुनर्विचार करना चाहिए।
और यही कारण है कि चुनाव आयोग सवालों के घेरे में बना हुआ है। का वर्षा जब कृषी सुखाने। यानि जब चुनाव पूरे होने को हैं, तब हम सावधान कर रहे हैं। इस बार नेताओं के बयान लगातार बदले हैं। सत्तापक्ष की तरफ से तो भाषा के स्तर को ध्यान में रखा ही नहीं गया, ऐसा लगता है। और चुनाव आयोग भी तभी जागता है, जब उसके पास शिकायतें पहुंचती हैं। फिर आपने जो पर्यवेक्षक और प्रभारी तैनात किए हैं, वो किस लिए हैं? यही नहीं, आयोग को अक्सर सत्तापक्ष की शिकायतों को गंभीरता से लेते देखा गया है। विपक्ष की शिकायतें दमदार होने के बावजूद उन पर कोई खास एक्शन लिया नहीं गया।
शायद यही कारण है कि आयोग ने दोनों प्रमुख पार्टियों को नोटिस देकर अपनी जिम्मेदारी की इतिश्री कर ली है। जो जिम्मेदारी आयोग की होना चाहिए, वो उन पार्टियों के अध्यक्षों से अपेक्षा कर रहे हैं। देखने वाली बात यह है कि पार्टियों के तमाम स्टार प्रचारक नेताओं का कद अध्यक्षों से कहीं बड़ा है। ऐसे में वो उन कद में बड़े नेताओं को क्या समझाइश दे पाएंगे, यह समझा जा सकता है। ऐसा लगता है, मानो चुनाव आयोग ने यहां भी खानापूर्ति कर दी, कि हमने तो बड़ी पार्टियों को फटकार लगाई, असर पड़े या न पड़े। तब तक चुनाव खत्म। जय राम जी की।
– संजय सक्सेना

Sanjay Saxena

BSc. बायोलॉजी और समाजशास्त्र से एमए, 1985 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय , मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के दैनिक अखबारों में रिपोर्टर और संपादक के रूप में कार्य कर रहे हैं। आरटीआई, पर्यावरण, आर्थिक सामाजिक, स्वास्थ्य, योग, जैसे विषयों पर लेखन। राजनीतिक समाचार और राजनीतिक विश्लेषण , समीक्षा, चुनाव विश्लेषण, पॉलिटिकल कंसल्टेंसी में विशेषज्ञता। समाज सेवा में रुचि। लोकहित की महत्वपूर्ण जानकारी जुटाना और उस जानकारी को समाचार के रूप प्रस्तुत करना। वर्तमान में डिजिटल और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े। राजनीतिक सूचनाओं में रुचि और संदर्भ रखने के सतत प्रयास।

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