संपादकीय…
दस दिन में चौथी बार

संजय सक्सेना
जैसी कि आशंका व्यक्त की जा रही थी, देशभर में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में एक बार फिर बढ़ोतरी कर दी गई है। आज सोमवार को तेल कंपनियों ने पेट्रोल के दाम में 2.61 रुपये प्रति लीटर और डीजल में 2.71 रुपये प्रति लीटर की और वृद्धि कर दी। पिछले 10 दिनों में यह चौथी बार है, जब ईंधन की कीमतें बढ़ाई गई हैं। अभी और दाम बढ़ाए जाने की पूरी संभावना है, क्योंकि संकट टला नहीं है और तेल की आपूर्ति तमाम दावों के बावजूद सामान्य नहीं हो पा रही है।
तेल से लेकर ईंधन गैस में लगातार बढ़ते दामों ने आम लोगों की चिंता बढ़ा दी है, क्योंकि इनकी मूल्य वृद्धि बाजार को सीधे प्रभावित कर रही है और इससे चारों तरफ महंगाई का ग्राफ बढ़ता जा रहा है। देश की राजधानी दिल्ली में पेट्रोल 102.12 रुपये और डीजल 95.20 रुपये प्रति लीटर पहुंच गया है, जबकि मध्यप्रदेश में पेट्रोल की नई कीमत 111 रुपए पर पहुंच गई है।
कहा जा रहा है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी, कमजोर होता रुपया और आयात लागत बढऩे की वजह से तेल कंपनियों पर दबाव बढ़ा है। इसके अलावा रिफाइनिंग मार्जिन में बदलाव का असर भी ईंधन की कीमतों पर पड़ रहा है। लंबे समय तक कीमतें स्थिर रखने के बाद अब सरकारी तेल कंपनियां धीरे-धीरे बढ़ी हुई लागत का बोझ उपभोक्ताओं पर डाल रही हैं। यही वजह है कि 10 दिनों के भीतर पेट्रोल और डीजल करीब 5 रुपये प्रति लीटर तक महंगे हो चुके हैं।
माना जा रहा है कि पेट्रोल-डीजल महंगा होने का असर सिर्फ वाहन चालकों तक सीमित नहीं रहता। माल ढुलाई महंगी होने से फल, सब्जी, दूध और रोजमर्रा की दूसरी चीजों की कीमतें भी बढ़ सकती हैं। डीजल महंगा होने से खेती और ट्रांसपोर्ट सेक्टर पर अतिरिक्त बोझ पडऩा भी तय है। ऐसे में आने वाले दिनों में महंगाई अधिक बढऩे की आशंका और बलवती हो गई है।
इधर, महंगे कच्चे तेल, कमजोर रुपये और सरकारी ईंधन बचत अभियान के कारण भारत में पेट्रोल-डीजल की मांग घटने की आशंका जताई गई है। ऊर्जा विश्लेषण कंपनी केप्लर ने 2026 के लिए ईंधन मांग वृद्धि के अनुमान में 39 फीसदी कटौती की है। ईरान युद्ध के कारण डिलीवरी लागत भी 19 फीसदी बढ़ गई है। ऊर्जा विश्लेषण कंपनी केप्लर ने भारत की 2026 के लिए रिफाइंड उत्पादों की मांग वृद्धि के अनुमान में बड़ी कटौती की है।
कंपनी ने मांग वृद्धि का अनुमान 39 फीसदी घटाकर करीब 78 हजार बैरल प्रतिदिन कर दिया है। पहले यह अनुमान 1.28 लाख बैरल प्रतिदिन था। रिपोर्ट के अनुसार पेट्रोल की मांग वृद्धि का अनुमान भी 63 हजार बैरल प्रतिदिन से घटाकर 38 हजार बैरल प्रतिदिन कर दिया गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि लगातार महंगे होते ईंधन और आर्थिक दबाव के कारण लोग गैर-जरूरी यात्राएं कम कर सकते हैं।
रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्क फ्रॉम होम बढऩे, गैर-जरूरी यात्राओं में कमी और सरकार के ईंधन बचत अभियान का सीधा असर डीजल और पेट्रोल की मांग पर पड़ेगा। डीजल की सालाना मांग में करीब 20 हजार बैरल प्रतिदिन की गिरावट आने की संभावना जताई गई है। इसके अलावा विमान ईंधन यानी एटीएफ की मांग में भी करीब 50 प्रतिशत तक गिरावट का अनुमान लगाया गया है। विशेषज्ञों के मुताबिक अंतरराष्ट्रीय हालात और महंगे तेल की वजह से लोग यात्रा खर्च कम करने की कोशिश कर रहे हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल लगातार महंगा बना हुआ है। सरकार ने हाल के दिनों में तीन बार पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ाई हैं, लेकिन इसके बावजूद मौजूदा कीमतें तेल कंपनियों की अनुमानित लागत से कम बताई जा रही हैं। देश में पेट्रोल की औसत कीमत करीब 103 रुपये प्रति लीटर है, जबकि लागत संतुलन के लिए इसे करीब 125 रुपये प्रति लीटर होना चाहिए। इसी तरह डीजल की मौजूदा औसत कीमत करीब 94 रुपये प्रति लीटर है, जबकि संतुलन स्तर 115 से 120 रुपये प्रति लीटर बताया जा रहा है।
ईरान युद्ध का असर अब एशिया-प्रशांत क्षेत्र की डिलीवरी और लॉजिस्टिक्स लागत पर भी दिखाई देने लगा है। एक सर्वे के अनुसार मार्च से मई के बीच भारत सहित एशिया क्षेत्र में डिलीवरी लागत में 19 प्रतिशत तक की वृद्धि दर्ज की गई है। ईंधन महंगा होने, ड्राइवरों के वेतन बढऩे और शहरी भीड़भाड़ को इसकी बड़ी वजह बताया गया है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर यही स्थिति बनी रही तो आने वाले समय में रोजमर्रा के सामान की कीमतों पर भी असर पड़ सकता है।
मूल्य वृद्धि का असर केवल आम आदमी पर पड़ेगा, यह नहीं माना जा सकता। क्योंकि असर तो हर वर्ग पर पडऩा है। यह बात और है कि जिनके पास आय सीमित है, उसकी कमर टूट जाएगी। निम्न वर्ग तो वोट के बदले कैश योजनाओं का लाभ उठा लेता है और उसे अपने स्तर को लेकर भी खास चिंता नहीं रहती, निम्न मध्यम वर्ग सबसे ज्यादा प्रताडि़त होता है। वह कर्ज में ही पैदा हो रहा है और कर्ज में ही मर जाता है। दावा किया जा रहा है कि हालात और भयानक हो सकते हैं। ऐसे में आत्महत्याओं का दौर भी तेज हो जाए, तो कोई आश्चर्य नहीं होगा। एक वर्ग के पास इसके अलावा कोई चारा नहीं होता। सरकार के पास भी उसके लिए शायद कोई मरहम नहीं है, दावा कुछ भी किया जाए।

