संपादकीय….
विचारधारा बनाम आयाराम गयाराम
संजय सक्सेना
तो क्या अब लोकतंत्र में विचारधारा की राजनीति अस्ताचल की ओर जा रही है? क्या विचारधारा का अर्थ केवल और केवल सत्ता तक पहुंचने का माध्यम रह गया है? क्या
दलबदल चुनावी जनादेश से विश्वासघात नहीं है? और, क्या तोडफ़ोड़ की राजनीति भारतीय लोकतंत्र के स्वरूप को समाप्त करके रहेगी?
ऐसे अनेकानेक प्रश्न उठ रहे हैं। और, उठ कर खत्म भी हो रहे हैं। क्योंकि वर्तमान में राजनीति का अर्थ सत्ता पाने और सत्ता सुख भोगने तक ही सिमट कर रह गया है। सबसे दुखद पहलू यह है कि देश की अधिसंख्य जनता भी इसे मौन स्वीकृति देकर इसकी रफ्तार बढ़ाने में सहायक सिद्ध हो रही है। ऐसा लग रहा है कि दलबदल अब सामान्यीकृत हो चुका है और सत्ता हासिल करने की कोशिश में एक साधन के रूप में स्वीकार लिया गया है।
यूं तो दलबदल का इतिहास भारतीय लोकतंत्र जितना ही पुराना है। पहले भी विपक्षी सरकारों को बर्खास्त किया गया, विधायकों ने पद हासिल करने, गुटीय विवाद सुलझाने या उस समय की प्रभावशाली पार्टी के साथ जुडऩे के लिए पाला बदला। लेकिन भारत के राजनीतिक इतिहास में दल-बदल यानि विधायकों/सांसदों द्वारा व्यक्तिगत लाभ के लिए अपनी पार्टी छोडऩे का चलन 1967 के आम चुनावों के बाद तेजी से बढ़ा। इसके कारण कई राज्य सरकारें गिर गईं। दलबदल को आया राम गया राम से भी जाना जाता है। इस मुहावरे की उत्पत्ति 1967 में हुई, जब हरियाणा के विधायक गया लाल ने एक ही दिन में तीन बार अपनी पार्टी बदली। इसके बाद भारतीय राजनीति में आया राम गया राम का मुहावरा बहुत लोकप्रिय हो गया।
जब दलबदल एक समस्या लगने लगा तो इसका अध्ययन करने के लिए तत्कालीन गृह मंत्री यशवंतराव चव्हाण की अध्यक्षता में एक समिति बनी। उस समिति ने सिफारिश की थी कि पद या धन के लालच में दल बदलने वालों को अयोग्य घोषित किया जाना चाहिए। राजनीतिक अस्थिरता को रोकने के लिए, राजीव गांधी सरकार ने 52वां संविधान संशोधन अधिनियम, 1985 पारित किया। इस कानून के माध्यम से भारतीय संविधान में 10वीं अनुसूची जोड़ी गई, जो सांसदों और विधायकों को दल-बदल करने पर अयोग्य ठहराती है।
लेकिन आज दलबदल तमाम कानून और प्रावधानों से ऊपर चला गया लगता है।
हालांकि दो तिहाई का फार्मूला आज भी लागू है, लेकिन उसके लिए कोई आधार की जरूरत नहीं रह गई है।
राजनीतिक अवसरवाद कोई नई बात नहीं है। इसका नाम राजनीति रखा ही इसलिए गया था कि वह नीति अपनाओ, जिससे राज यानि सत्ता मिल सके। फिर भी, पहले के और आज के दलबदल में कुछ फर्क दिख रहा है। तो क्या अब दलबदल का चरित्र बदल गया है? कहा जाने लगा है कि कांग्रेस युग में दलबदल एक प्रभुत्वशाली पार्टी व्यवस्था का लक्षण था। जबकि आज यह एक प्रभुत्वशाली पार्टी व्यवस्था बनाने और बनाए रखने की रणनीति बन चुका है।
देखा जाए तो यह अंतर काफी महत्वपूर्ण है। पिछले एक दशक में भाजपा स्वतंत्र भारत में देखी गई सबसे प्रभावशाली चुनावी मशीनों में से एक बनकर उभरी है। इसकी संगठनात्मक शक्ति, वित्तीय संसाधन, संचार तंत्र और नेतृत्व संरचना अभूतपूर्व है। इसकी चुनावी सफलता को स्वीकार किया जाना चाहिए। लेकिन इसने एक नई राजनीतिक सोच को भी जन्म दिया है। चुनाव जीतना अब केवल सत्ता पाने और उसे चलाने का माध्यम नहीं रह गया है। क्षेत्र विस्तार का उद्देश्य बन गया है। इस दृष्टिकोण से दलबदल अब अपवाद नहीं, अधिग्रहण बन चुके हैं।
मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र में सरकारों का गिरना या गिराया जाना इसी रूप में देखा जा सकता है। इस सबका लक्ष्य प्रतिद्वंद्वी दलों को संरचनात्मक रूप से कमजोर करना और सत्तारूढ़ दल की राजनीतिक पहुंच को लगातार बढ़ाना रहा है। जो भाजपा कभी वैचारिक प्रतिबद्धता और अपने कैडर की निष्ठा पर गर्व करती थी, उसमें अब विरोधी खेमों से आयातित नेताओं की भीड़ बढ़ती जा रही है। जिनकी विचारधारा मिलती-जुलती तो दूर, एकदम विरोधी रही है। जो कल तक पार्टी और इसके नेताओं को जमकर गालियां देते रहे, वो आज इसका हिस्सा बन गए हैं। वो आज भाजपा की विचारधारा की बात कर रहे हैं और लोग सुन भी रहे हैं।
दलबदल विरोधी कानून को भी लगातार दरकिनार किया जा रहा है। बंगाल में एक अल्पज्ञात राजनीतिक दल नेशनलिस्ट सिटीजनशिप पार्टी ऑफ इंडिया का उपयोग कानून के दायरे से बचते हुए दलबदल को आसान बनाने के लिए किया गया। दलों में विभाजन और अपात्रता से जुड़े मामले अदालत में महीनों और कभी-कभी वर्षों तक लंबित रहते हैं। जब तक फैसला आता है, तब तक सरकारें अपना कार्यकाल चला चुकी होती हैं और मंत्री पद का लाभ उठा चुके होते हैं।
कुल मिलाकर यह नया दौर है। इसमें सत्ता और दल का विस्तार प्रमुख उद्देश्य बन गया है। विचारधारा गौण हो गई है। संविधान और कानून को अपने हिसाब से परिभाषित किया जाने लगा है। संवैधानिक संस्थाएं भी सत्ता के अनुरूप चलने का प्रयास करने लगी हैं।
और हां, एक बात जो सबसे चिंताजनक है, वो है मूल मुद्दों का विलुप्तीकरण और संघर्ष के स्वरूप का परिवर्तन। ये वो मुद्दे हैं, जो कभी सत्ता के लिए आवश्यक माने जाते थे और जिनके लिए संघर्ष किया जाता था। हालांकि पिछले कई दशकों से देश में सत्ता परिवर्तन जनता से जुड़े मुद्दों पर हुआ ही नहीं है। और इस सबके लिए देश का मूकदर्शक अधिसंख्य वर्ग ही दोषी माना जाएगा। सत्ता में बैठे लोगों के बजाय सत्तालोलुप और विचारधाराओं से पलायन करने वाले अधिक दोषी कहे जाएंगे। और, हम ऐसे ही इन तमाम राजनीतिक प्रहसनों को देखते रहेंगे, ताली बजाकर उनका उत्साहवर्धन करेंगे और चादर तानकर सो जाएंगे। जय हिंद जय भारत।