संपादकीय…
इस व्यवस्था को ही सिस्टम कहते हैँ …?

संजय सक्सेना
क्या अपनी प्रशासनिक व्यवस्था को सिस्टम कहना उचित होगा? ये सवाल इसलिए उठ रहा है, क्योंकि सिस्टम का अर्थ ही व्यवस्था होता है, जहां सब कुछ नियमों से तो चले, लेकिन ये नियम किसी के लिए घातक नहीं होने चाहिए। व्यवस्था वो होती है, जहां जीवन आसान हो। लेकिन, हमारे देश में दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हो पा रहा है। आम आदमी का जीवन सिस्टम की भूलभुलैयां में उलझ कर रह गया है।
आज ही खबर पढऩे को मिली कि मध्यप्रदेश में एमडी-एमएस डॉक्टर्स भी बेरोजगार हैं। और ये उस प्रदेश की हालत है, जहां अस्पतालों को सामान्य डाक्टर नहीं मिल रहे हैं, विशेषज्ञों की बात तो दूर है। खबर में बताया गया है कि 86 डॉक्टर्स की एमबीबीएस की डिग्री ही बंधक बनाकर रख ली गई है।
एक डाक्टर का कहना है कि दिसंबर 2025 में हमारी एमएस-एमडी यानी पोस्टग्रेजुएशन पूरी हो चुकी है, लेकिन 10वीं, 12वीं और एमबीबीएस सहित हमारी तमाम डिग्रियां सरकार के पास बंधक हैं। एमबीबीएस और एमडी करने के बाद भी हम पिछले 6 महीने से बेरोजगार हैं। हालत यह है कि हममें से ज्यादातर डॉक्टर अपने एजुकेशन और पर्सनल लोन की किस्तें तक नहीं भर पा रहे हैं।
यहां खास बात यह है कि हमारे मध्य प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों के आधे से ज्यादा पद खाली हैं। तस्वीर इसलिए भी परेशान करने वाली है, क्योंकि नीट और री-नीट जैसी कठिन परीक्षाओं के बाद चुनिंदा छात्रों को मेडिकल कॉलेजों में दाखिला मिलता है, लेकिन पढ़ाई पूरी होने के बाद उन्हें भी सरकारी सिस्टम के आगे संघर्ष करना पड़ रहा है।
भोपाल के मेजर डॉ. यश श्रीवास्तव बताते हैं कि एमबीबीएस के बाद उन्हें एसएससी के जरिए सेना में कमीशन मिला था। पांच साल सेना में सेवा देने के बाद पारिवारिक कारणों से वे भोपाल लौट आए और जनरल सर्जरी में पीजी में दाखिला लिया। उन्होंने कहा, दिसंबर 2025 में एमएस जनरल सर्जरी पूरी की। एडमिशन के समय हमसे ग्रामीण सेवा के लिए बॉन्ड साइन कराया गया था। नियम के मुताबिक पासआउट होने के बाद सरकार को ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्र में पोस्टिंग देनी चाहिए, लेकिन सात महीने बाद भी पोस्टिंग नहीं मिली है। हमारी 10वीं, 12वीं की मार्कशीट और एमबीबीएस की डिग्री बंधक रखी गई हैं। इसके कारण मैं न मध्यप्रदेश में और न ही किसी दूसरे राज्य में काम कर सकता हूं, क्योंकि संचालनालय से एनओसी जरूरी होती है।
यह केवल यश की नहीं, उसके कई साथियों की परेशानी है। किसी की शादी अटकी हुई है तो दूसरे राज्यों से आए छात्र अपने गृह राज्य तक नहीं जा पा रहे हैं। ये लोग बंधक जैसे हो गए हैं। हमने सरकार को हाईकोर्ट का आदेश भी दिया है, जिसमें कहा गया है कि यदि तीन महीने तक बॉन्ड पोस्टिंग नहीं मिलती तो बॉन्ड स्वत: समाप्त माना जाएगा। आर्थोपेडिक्स में पीजी कर चुके डॉ. अमित कुमार हरियाणा के रहने वाले हैं। वे कहते हैं कि पीजी पूरी होने के बाद भी मैं अपने गृह राज्य नहीं जा पा रहा हूं। वहां काम करने के लिए यहां से एनओसी जरूरी है। पल्मोनरी मेडिसिन में एमडी कर चुके डॉ. शरद सिंगोर कहते हैं कि पीजी की फीस काफी ज्यादा होती है। हमारा परिवार इतनी फीस नहीं भर सकता था। एजुकेशन लोन मिलने में दिक्कत आई तो पर्सनल लोन लेना पड़ा। पर्सनल लोन पर ब्याज भी ज्यादा होता है। अब हालत यह है कि लोन की किस्तें भरना मुश्किल हो रहा है। पीजी कंप्लीट हुए सात महीने हो चुके हैं, लेकिन न हमें डिग्री मिल रही है और न ही नौकरी। हम तो बॉन्ड की शर्तों के मुताबिक गांवों में सेवा देने के लिए तैयार हैं, लेकिन सरकार ने अब तक पोस्टिंग ही नहीं दी।
ये उस देश के हालात हैं, जहां शिक्षा और स्वास्थ्य की हालत बदतर होने के बाद भी हम इन मुद्दों को गौण बनाए हुए हैं। हम मंदिर-मस्जिद और ऐसे तमाम सांप्रदायिक, सामाजिक और जातिगत मुद्दों में ही उलझे रहते हैं और हमारे युवा या तो फांसी लगाकर आत्महत्या कर लेते हैं या फिर अपराधी बन जाते हैं, या थोड़ा साहस होता है तो दस-पांच हजार की नौकरी करके अपनी प्रतिभा को दम तोडऩे को मजबूर कर रहे होते हैं।
यहां एक खास बात और सामने आई। वो प्रधानमंत्री कार्यालय को की गई शिकायत की है। पता चला है कि पीएमओ में भी शिकायत की गई। लेकिन आज तक कुछ नहीं हुआ। ये मुद्दा इसलिए जरूरी है कि हमें पता तो चले कि हमारे सिस्टम में ऊपर से नीचे तक कितने लूप होल हैं। पीएमओ से दर्जनों नहीं, सैकड़ों चिट्ठियों पर आवश्यक कार्यवाही के लिए लिख कर भेजा जाता है। और राज्य सरकारों की आवश्यक कार्यवाही होती है, इन पत्रों को रद्दी की टोकरी के हवाले कर देना।
बच्चों का भविष्य बनाने के लिए मध्यम वर्ग सबसे ज्यादा परेशान रहता है और वही उनके लिए तरह-तरह के कर्ज लेता है। और यह भी खास बात है कि उसे सब कुछ नियमानुसार होने के बाद भी आसानी से बैंक भी कर्ज नहीं देते। आज के बैंक भी इस सड़े सिस्टम में शामिल हो चुके हैं। और फिर कर्ज चुकाते-चुकाने कमर टूट जाती है। जो बच्चे कुछ अच्छी नौकरी में चले जाते हैं या उनका काम अच्छा चलने लगता है, वो ही आगे बढ़ पाते हैं। लेकिन इनका प्रतिशत दस भी नहीं पहुंच पाता है।
और, सिस्टम में बैठे लोग नियम-कानूनों का हवाला देकर अपनी दुकान तो जमा लेते हैं, लेकिन खुद वो और उनके परिजन इन्हीं नियम कानूनों का मखौल बनाकर खेलते रहते हैं। आम आदमी बस चक्कर लगाता रह जाता है। गलती से उसका कोई काम हो जाए, तो वह अपने आप को सौभाग्यशाली समझ लेता है। काम भी यदि बिना भेंट चढ़ाए हो जाए, तो समझो आपको भगवान मिल गए। आपको मोक्ष मिल गया। इन बच्चों की तो डिग्रियां बंधक बनी हुई हैं, हमारी तो पूरी पीढ़ी ही इस सिस्टम का गुलाम बन कर सिसकियां ले रही है।

Sanjay Saxena

BSc. बायोलॉजी और समाजशास्त्र से एमए, 1985 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय , मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के दैनिक अखबारों में रिपोर्टर और संपादक के रूप में कार्य कर रहे हैं। आरटीआई, पर्यावरण, आर्थिक सामाजिक, स्वास्थ्य, योग, जैसे विषयों पर लेखन। राजनीतिक समाचार और राजनीतिक विश्लेषण , समीक्षा, चुनाव विश्लेषण, पॉलिटिकल कंसल्टेंसी में विशेषज्ञता। समाज सेवा में रुचि। लोकहित की महत्वपूर्ण जानकारी जुटाना और उस जानकारी को समाचार के रूप प्रस्तुत करना। वर्तमान में डिजिटल और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े। राजनीतिक सूचनाओं में रुचि और संदर्भ रखने के सतत प्रयास।

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