संपादकीय…
विकसित देशों में एआई का विरोध बन सकता है राजनीतिक मुद्दा

संजय सक्सेना
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानि एआई का जहां पूरी दुनिया में बहुत तेजी से प्रसार हो रहा है, वहीं इसकी जरूरत से ज्यादा तेज रफ्तार को लेकर तकनीकी विशेषज्ञों की चिंता बढ़ती जा रही है। विशेषज्ञ तो इसे लेकर शुरू से चिंतित रहे हैं, लेकिन अब आम लोग भी इसे लेकर असहज महसूस करने लगे हैं।
पश्चिमी देशों में हालांकि एआई का प्रसार बहुत तेजी से हुआ है, लेकिन अब वहां इसकी लोकप्रियता घटने लगी है और अब यह तेजी से राजनीतिक मुद्दा बनता जा रहा है। दुनिया के दूसरे हिस्सों में भी इसका विरोध बढ़ रहा है। दक्षिण कोरिया में चिप निर्माता कंपनियों के मुनाफे में जबरदस्त बढ़ोतरी के बाद सैमसंग के कर्मचारियों ने विशेष बोनस की मांग करते हुए हड़ताल की चेतावनी दे दी है।
एआई को लेकर अब तक सबसे तीखी बहस अमेरिका में देखने को मिल रही है। वहां एआई के विरोध में डेटा सेंटरों के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों के कारण करीब 10 लाख करोड़ रुपए के प्रोजेक्ट अटक गए हैं। वहीं, करीब 40 प्रतिशत अमेरिकी मतदाता चाहते हैं कि अधिकांश उद्योगों में एआई के उपयोग पर प्रतिबंध ही लगा दिया जाए। एआई के विरोध का एक कारण यह भी है कि एआई कंपनियों के प्रमुख लंबे समय से चेतावनी देते रहे हैं कि एआई करोड़ों नौकरियां खत्म कर सकता है या फिर एआई द्वारा तैयार किया गया कोई सुपर-वायरस मानव सभ्यता के लिए खतरा बन सकता है।
असल में, अमेरिका में एआई निवेश केवल तकनीकी केंद्रों तक सीमित नहीं है। अमेजन, गूगल, मेटा, माइक्रोसॉफ्ट और ओरेकल जैसी कंपनियां मिशिगन, विस्कॉन्सिन, ओहायो, लुइसियाना, मिसीसिपी और टेक्सास समेत कई राज्यों में भविष्य के डेटा सेंटरों पर 70.85 लाख करोड़ रुपए निवेश कर रही हैं। अनुमान है कि 2026 से 2030 के बीच दुनिया में एआई डेटा सेंटरों पर 283 लाख करोड़ रुपए खर्च होंगे। इसके चलते एआई की कंप्यूटिंग क्षमता कई गुना बढ़ जाएगी।
जहां तक बिजली की खपत का मामला है, तो अमेरिका में डेटा सेंटरों की बिजली खपत मौजूदा 12 गीगावॉट से बढक़र दशक के अंत तक लगभग पांच गुना यानी करीब 60 गीगावॉट तक हो सकती है। इसी बढ़ती ऊर्जा जरूरत और पर्यावरणीय असर को लेकर विरोध तेज हो रहा है। स्थानीय लोग डेटा सेंटरों के जनरेटर और कूलिंग सिस्टम से होने वाले शोर, नए ट्रांसमिशन टावरों, पानी के संभावित प्रदूषण और बढ़ते बिजली दबाव पर सवाल उठा रहे हैं। कई सर्वेक्षण बताते हैं कि भविष्य में कई अमेरिकी इलाकों में परमाणु संयंत्रों की तुलना में डेटा सेंटर अधिक दिखाई देंगे। यही वजह है कि नवंबर में होने वाले चुनावों में मतदाता गवर्नर पद के उम्मीदवारों से इस मुद्दे पर उनका रुख पूछ रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह विरोध अभी शुरुआती दौर में है।
अमेरिका में एआई फिलहाल प्रमुख चुनावी मुद्दों में नीचे है, लेकिन डेटा सेंटरों को लेकर बहस बढ़ती जा रही है और यह बताती है कि आने वाले वर्षों में यह बड़ा राजनीतिक और सामाजिक मुद्दा बन सकता है।
एआई की परियोजनाओं पर जनविरोध का असर पड़ा है। 2026 के पहले तीन महीनों में 3.5 गीगावाट बिजली का संभावित उपयोग करने वाले 3.96 लाख करोड़ रुपए के बीस डेटा सेंटर प्रोजेक्ट रद्द कर दिए गए हैं। पिछले तीन वर्षों में अमेजन, मेटा के प्रस्तावित छोटे सेंटरों सहित 8 लाख करोड़ रुपए से अधिक के प्रोजेक्ट रद्द किए जा चुके हैं। सेडार रैपिड्स, आयोवा के निवासी वहां गूगल के प्रोजेक्ट का विरोध कर रहे हैं। मिशिगन में कई शहरों ने डेटा सेंटरों का विरोध किया है।
जहां तक भारत का सवाल है, तो यहां एआई से रोजगार पर असर पडऩे की चिंता भले ही बढ़ रही है, लेकिन परियोजनाओं पर कोई असर नहीं पड़ रहा है। उलटे, विदेशी कंपनियां भारत में अपने डेटा सेंटर स्थापित करने में जुट गई हैं। चूंकि अमेरिका में विरोध बढ़ रहा है, इसलिए इसमें हाल के समय में इसमें काफी तेजी आई है। यह बात और है कि डेटा सेंटर बढऩे से बड़े शहरों के पर्यावरण पर तो विपरीत असर पडऩा शुरू हो ही गया है, बिजली की खपत में भी अचानक वृद्धि हो गई है। बिजली को लेकर अधिकांश शहरों में वैसे भी प्रबंधन बहुत अच्छा नहीं है, इसलिए आम लोगों के लिए यह समस्या बनती जा रही है।
अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिका में अगले चुनाव में पश्चिम एशिया का युद्ध भले ही बड़ा मुद्दा बने, लेकिन एआई की परियोजनाएं भी प्रमुख मुद्दों में शामिल होंगी। वहां के लोगों ने जब अभी से इसका विरोध शुरू कर दिया है, तो चुनाव के समय इसका विरोध और बढऩे की आशंका है।
एआई का विस्तार भले ही काम आसान करने के उद्देश्य से शुरू हुआ है, लेकिन अब यह इंसान को विस्थापित करता दिखने लगा है। भारत में अभी इसका असर दिखना शुरू इसलिए नहीं हुआ, क्योंकि यहां इसका विस्तार ही अभी बहुत कम है, लेकिन
अमेरिका, चीन और अन्य विकसित देशों में यह बड़ी संख्या में लोगों के रोजगार छीनने लगा है। इसे लेकर जो भविष्यवाणियां की जा रही हैं, वो और खतरनाक हैं। यह सही है कि उपयोग के बजाय जब किसी का दुरुपयोग अधिक होने लगता है, तो वह संकट का कारण बन जाता है। यही बात एआई पर भी लागू होती है। हमें विकसित देशों का टूल बनने के बजाय अपने देश की परिस्थितियों के आधार पर ही निर्णय लेना चाहिए। केवल विकास या निवेश दिखाने के लिए बहुराष्ट्रीय कंपनियों को अपने यहां शरण देने का अंधी दौड़ नुकसानदेह भी साबित हो सकती है।

Sanjay Saxena

BSc. बायोलॉजी और समाजशास्त्र से एमए, 1985 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय , मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के दैनिक अखबारों में रिपोर्टर और संपादक के रूप में कार्य कर रहे हैं। आरटीआई, पर्यावरण, आर्थिक सामाजिक, स्वास्थ्य, योग, जैसे विषयों पर लेखन। राजनीतिक समाचार और राजनीतिक विश्लेषण , समीक्षा, चुनाव विश्लेषण, पॉलिटिकल कंसल्टेंसी में विशेषज्ञता। समाज सेवा में रुचि। लोकहित की महत्वपूर्ण जानकारी जुटाना और उस जानकारी को समाचार के रूप प्रस्तुत करना। वर्तमान में डिजिटल और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े। राजनीतिक सूचनाओं में रुचि और संदर्भ रखने के सतत प्रयास।

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