दतिया उपचुनाव: हंगामा-बगावत के बीच सिंधिया को चुनाव का प्रभार
पिता के पुराने वफादार बनाम वर्तमान पार्टी का दायित्व…

संजय सक्सेना
भोपाल। मध्य प्रदेश की दतिया विधानसभा सीट पर होने जा रहा उपचुनाव इस बार त्रिकोणीय समीकरणों में उलझ गया है। भाजपा के आशुतोष तिवारी का कांग्रेस के घनश्याम सिंह से सीधा मुकाबला होने के आसार हैं, हालांकि आजाद समाज पार्टी के प्रत्याशी दामोदर यादव को मैदान में उतारकर इसे त्रिकोणीय करने का प्रयास किया है। सपा ने कांग्रेस को समर्थन दे दिया है। लेकिन सबसे दिलचस्प बात इसमें यह है मानी जा रही है कि जहां अब दतिया सीट मुख्यमंत्री के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गई है, वहीं भाजपा ने केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया को मुख्य चुनाव प्रभारी बनाकर नया दांव खेल दिया है। सिंधिया के सामने असमंजस की स्थिति बन सकती है। कांग्रेस के प्रत्याशी कुंवर घनश्याम सिंह उनके पिता के वफादार माने जाते रहे हैं और वे स्वयं भी राजघराने से संबंध रखते हैं। हालांकि उन्होंने साफ कर दिया है कि  वे पार्टी प्रत्याशी को जिताएंगे, लेकिन उन्हें घनश्याम सिंह से पुराने संबंधों के साथ ही नरोत्तम के समर्थकों के बगावती तेवरों का भी सामना तो करना ही पड़ेगा।
पूर्व मंत्री डा. नरोत्तम मिश्रा का टिकट कटने के बाद दतिया में जिस तरह से हंगामा हुआ, उसने बगावत का रूप ले लिया था। हालांकि नरोत्तम मिश्रा ने भोपाल पहुंचकर साफ कर दिया है कि वे पार्टी के लिए काम करेंगे और उन्होंने अपने समर्थकों से भी विरोध न करने की अपील कर दी है। लेकिन पार्टी में भितरघात नहीं होगा, इसकी गारंटी तो कोई नहीं ले सकता। कारण साफ है। यदि भाजपा से आशुतोष तिवारी चुनाव जीतते हैं, तो न केवल नरोत्तम मिश्रा का भविष्य खतरे में पड़ जाएगा, अपितु उन्होंने अपने बेटे सुकर्ण के लिए जो जमावट की है, वो भी बेकार चली जाएगी। हालांकि उन्होंने डबरा में भी पांव जमाने की कोशिश की है, और उनकी ये कोशिश भी रहेगी कि ये सीट आरक्षित से अनारक्षित हो जाए, लेकिन यह भविष्य की बात है।
माना जा रहा है कि दतिया विधानसभा उपचुनाव को लेकर भारतीय जनता पार्टी ने अपनी चुनावी रणनीति को और धार देते हुए केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया को मुख्य चुनाव प्रभारी नियुक्त किया है। नरोत्तम मिश्रा के समर्थकों के बगावती तेवरों के बाद पार्टी का यह फैसला राजनीतिक दृष्टि से अहम माना जा रहा है। सिंधिया अब दतिया उपचुनाव में भाजपा के चुनाव अभियान की पूरी कमान संभालेंगे। भाजपा के इस फैसले को यह संकेत माना जा रहा है कि पार्टी दतिया विधानसभा उपचुनाव में किसी भी तरह का जोखिम नहीं लेना चाहती। अब सभी की नजरें सिंधिया की चुनावी रणनीति और उसके प्रभाव पर टिकी रहेंगी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उनकी सक्रियता विपक्षी दलों के लिए चुनौती साबित हो सकती है। दतिया उपचुनाव में भाजपा की जीत सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी अब काफी हद तक सिंधिया के कंधों पर होगी और असफलता समस्या भी खड़ी कर सकती है।
दतिया उपचुनाव में फिलहाल तो सबसे बड़ा मुद्दा भाजपा के लिए यही होगा कि नरोत्तम के समर्थकों की बगावत को समर्थन में कैसे बदला जाए? क्या सिंधिया यह कर पाएंगे? हालांकि इसके लिए प्रदेश प्रभारी महेंद्र सिंह को भी लगाया गया है और भाजपा संगठन भी पूरी ताकत वहां लगाएगा। यही नहीं, चूंकि यह टिकट मुख्यमंत्री की पसंद का माना जा रहा है, इसलिए उनके लिए भी यह सीट प्रतिष्ठा का प्रश्न तो बन ही गई है। वह भी यहां जीतने के लिए पूरी ताकत झोंक देंगे।
केंद्रीय मंत्री सिंधिया के सामने बड़ी समस्या कांग्रेस नहीं होगी, अपितु कांग्रेस प्रत्याशी कुंवर घनश्याम सिंह हो सकते हैं। वे उनके पिता स्वर्गीय माधवराव सिंधिया के करीबी रहे हैं। साथ ही वे राजघराने से जुड़े हुए हैं। पिता के स्वर्गवास के बाद उनसे भी घनश्याम सिंह के अच्छे संबंध रहे हैं। लेकिन वह उनके साथ भाजपा में नहीं गए, बस यह एक बात खटक सकती है। फिर भी, घनश्याम सिंह व्यक्तिगत तौर पर भी भारी माने जा रहे हैं। वह पूर्व में विधायक रह भी चुके हैं। दतिया ही नहीं, सेंवढ़ा से भी जीत चुके हैं। उनका प्रभाव तो है ही, जनता के बीच उनकी छवि बेहतर है और व्यवहार भी अच्छा माना जाता है।
सिंधिया को शायद भाजपा ने इसी कारण चुनाव प्रभारी बनाया है, ताकि घनश्याम सिंह की राजघराने की छवि को काउंटर किया जाए। इसके साथ ही उनके प्रभाव का इस्तेमाल किया जाए। पार्टी के लिए काम करने की बात अपनी जगह है, लेकिन पार्टी का संगठन दतिया में कितना सकारात्मक रहता है, यह भी देखना होगा। अभी तो पूरा संगठन सडक़ों पर आ गया था। नरोत्तम वास्तव में पार्टी को जिताने में ताकत लगाएंगे, इसकी गारंटी नहीं। साथ ही उनके समर्थकों से वे अपील तो कर देंगे, लेकिन क्या वास्तव में सारे समर्थक भाजपा के लिए मैदान में उतर कर प्रचार में जुट जाएंगे?
असल में, नरोत्तम मिश्रा का टिकट काटकर आशुतोष तिवारी को प्रत्याशी बनाए जाने के बाद चंबल अंचल के इतिहास में यह पहली बार हुआ, जब बीजेपी कार्यकर्ताओं ने खुलकर विरोध-प्रदर्शन किए। ग्वालियर-झांसी नेशनल हाईवे पर 12 घंटे चक्काजाम हुआ। पथराव में एसपी समेत 8 पुलिसकर्मी घायल हो गए। प्रशासन को पूरे जिले में धारा 163 लागू करनी पड़ी। बिना अनुमति किसी भी सभा, जुलूस, धरना-प्रदर्शन और सार्वजनिक आयोजन पर प्रतिबंध लगा दिया। 5 या उससे ज्यादा लोगों के इकट्ठा होने पर रोक लगा दी गई। 27 बीजेपी नेताओं और कार्यकर्ताओं पर एफआईआर दर्ज कर ली गई। क्या इसके बाद भी कार्यकर्ता और नेता पार्टी का काम करेंगे? ये सवाल तो मौजूं रहेगा ही।

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असल में जिला हो या मंडल स्तर, पार्टी संगठन में बहुतायत नरोत्तम मिश्रा के समर्थकों और करीबियों की ही है। बूथ समितियों में भी उन्हीं की पसंद के कार्यकर्ता हैं। भाजपा डैमेज कंट्रोल में जुट गई है। नाराजगी कम करने के लिए नरोत्तम मिश्रा के प्रति पूरी हमदर्दी दिखाई जा रही है। पूरा संगठन झोंक दिया गया है। नरोत्तम मिश्रा भी आशुतोष का नामांकन दाखिल कराने जा रहे हैं। वे प्रचार की कमान भी संभालेंगे, लेकिन कितनी निष्ठा और ईमानदारी से, यह नहीं कहा जा सकता।
दतिया में जातिगत समीकरण बहुत प्रभावी नहीं कहे जा सकते हैं। लेकिन उत्तर प्रदेश की सीमा से सटा होने का असर यहां है, वहीं ग्वालियर राजघराने का भी प्रभाव है। और इसी कारण सिंधिया को चुनाव का जिम्मा सौंपा गया है। चंबल संभाग के प्रभारी अभय प्रताप सिंह यादव भी दतिया में शनिवार सुबह से लगातार कार्यकर्ताओं की बैठकें करने और पार्टी के सीनियर नेताओं से बातचीत कराकर आक्रोश खत्म कराने में जुटे हुए हैं।
मुख्यमंत्री निवास में दिग्गजों की बैठक

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शनिवार रात को भोपाल स्थित सीएम हाउस में एक बैठक हुई। इसके लिए नरोत्तम मिश्रा रात करीब पौने 8 बजे सीएम हाउस पहुंचे। इसके बाद बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल आए। क्षेत्रीय संगठन महामंत्री अजय जामवाल यहां पहले से मौजूद थे। बैठक के बीच में विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर भी पहुंच गए। बैठक में चर्चा क्या हुई, और किन तेवरों के साथ हुई, यह तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन बैठक के बाद प्रदेश अध्यक्ष खंडेलवाल ने कहा- संगठन ने यह तय किया है कि किसी भी कार्यकर्ता का इस्तीफा स्वीकार नहीं किया जाएगा। दतिया उपचुनाव में पार्टी नरोत्तम मिश्रा के नेतृत्व में पूरी मजबूती से लड़ेगी और जीतेगी।
और अंत में

पुराना वाकया है। स्वर्गीय माधवराव सिंधिया केंद्र में मंत्री थे। वीआईपी गेस्ट हाउस में रुके। पत्रकारों से सामान्य चर्चा हुई। सांध्यप्रकाश के नाम पर वे अलग से साक्षात्कार देने के लिए तैयार हो गए। उन्होंने लंबा साक्षात्कार दिया। इसके पूर्व वहां अन्य नेताओं के साथ ही कुंवर घनश्याम सिंह भी मौजूद थे। चर्चा उनसे भी हुई। राजघराने से होने के बाद भी एकदम सामान्य और सौम्य। लेकिन वे केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य के साथ भाजपा में नहीं गए। संबंधों को लेकर कभी टिप्पणी नहीं की। चुनाव परिणाम क्या होगा, यह तो दावा नहीं किया जा सकता, लेकिन चुनाव बहुत रोचक और रोमांचक अवश्य हो गया है।

Sanjay Saxena

BSc. बायोलॉजी और समाजशास्त्र से एमए, 1985 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय , मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के दैनिक अखबारों में रिपोर्टर और संपादक के रूप में कार्य कर रहे हैं। आरटीआई, पर्यावरण, आर्थिक सामाजिक, स्वास्थ्य, योग, जैसे विषयों पर लेखन। राजनीतिक समाचार और राजनीतिक विश्लेषण , समीक्षा, चुनाव विश्लेषण, पॉलिटिकल कंसल्टेंसी में विशेषज्ञता। समाज सेवा में रुचि। लोकहित की महत्वपूर्ण जानकारी जुटाना और उस जानकारी को समाचार के रूप प्रस्तुत करना। वर्तमान में डिजिटल और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े। राजनीतिक सूचनाओं में रुचि और संदर्भ रखने के सतत प्रयास।

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