संपादकीय…
विस्फोट-दर-विस्फोट,
सिस्टम में है खोट…

संजय सक्सेना
पटाखा फैक्ट्री में विस्फोट की कोई पहली घटना नहीं है। हरदा ब्लास्ट से सबक नहीं लिया, तो अब देवास में विस्फोट हो गया। घटना की खबरें छप जाती हैं। नेतृत्व राहत और मुआवजे की मरहम लगा देता है, कुछ बयान आ जाते हैं, थोड़ी हलचल भी प्रशासन में हो जाती है, लेकिन कुछ दिन बाद सब कुछ सामान्य। अंधी-बहरी व्यवस्था फिर कुछ लोगों की जान लेने की तैयारी करने लगती है। कार्रवाई के नाम पर केवल और केवल औपचारिकता होती है, क्योंकि उनकी व्यक्तिगत क्षति नहीं होती। यही हमारे सिस्टम की सबसे बड़ी खूबी है।
देवास जिले के टोंककला के पास पटाखा फैक्ट्री में ब्लास्ट मामले में प्रशासन की बड़ी लापरवाही सामने आई है। फैक्ट्री का निर्माण अभी पूरा भी नहीं हुआ और अंदर पटाखा बनाने का काम तेजी से चल रहा था। यानि साफ है कि हमने हरदा विस्फोट से कोई सबक नहीं लिया। पहले बात घटना की करते हैं। हादसे के समय यहां 600 से ज्यादा मजदूर काम कर रहे थे। फैक्ट्री संचालक अनिल मालवीय के पास 15 किलो विस्फोटक रखने का लाइसेंस था, लेकिन मौके पर कई टन विस्फोटक से पटाखे बनाने का काम किया जा रहा था। यह अंधे और भ्रष्ट सिस्टम का बड़ा सबूत है।
इस हादसे में धीरज, सनी, सुमित, अमर और गुड्डू नाम के मजदूरों की मौत हो गई जबकि 25 से ज्यादा घायल हुए हैं। इनमें से 13 की हालत गंभीर बताई जा रही है। घायल शशिकुमार का कहना है कि उनके दो साथी- बाबुल और राजू लापता हैं। वे फिलिंग रूम में काम कर रहे थे। दोनों ही बिहार में अररिया जिले के रहने वाले हैं। जो घायल हैं, उनमें से जो बच गए, वो भी ताउम्र कराहते ही रहेंगे।
टोंककला के पास जिस फैक्ट्री में हादसा हुआ, वह मात्र छह माह पहले ही शुरू हुई थी। बताया जा रहा है कि संचालक को पटाखों का बड़ा ऑर्डर मिला था, जिसे बारिश से पहले हर हाल में पूरा करना था। इसी वजह से बड़ी संख्या में मजदूर बुलाए गए थे। फैक्ट्री में उत्तर प्रदेश, बिहार और देवास के मजदूर काम कर रहे थे। इसके अलावा ठेकेदारों के जरिए और मजदूर बुलाने की तैयारी भी चल रही थी। बड़े पैमाने पर विस्फोटक रखकर पटाखे बनाए जा रहे थे।
प्रदेश में विस्फोटक रखने को लेकर सख्त नियम तो हैं, लेकिन स्थानीय स्तर पर इनका पालन नहीं किया गया। और पालन कराने वाले या तो दबाव में चुप थे या पैसा लेकर घर पर सो रहे थे। फैक्ट्री संचालक अनिल मालवीय ने 15 किलो विस्फोटक रखने का लाइसेंस ले रखा था। नियमों के तहत इतनी मात्रा से अधिकतम 600 किलो पटाखे बनाए और रखे जा सकते थे, लेकिन मौके पर टनों में विस्फोटक और तैयार पटाखे मिले। साफ है कि जिम्मेदार अफसरों ने कभी जांच तक नहीं की। क्यों करते, उनकी जेबें जो भरी जा रही थीं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि फैक्ट्री का निर्माण पूरा हुए बिना लाइसेंस कैसे जारी कर दिया गया? क्या किसी अधिकारी ने यहां आकर सुरक्षा इंतजामों की जांच की थी? जिस फैक्ट्री में हादसा हुआ, वह पूरी तरह तैयार भी नहीं थी। बाहर सिर्फ फेंसिंग की गई थी, जबकि अंदर के ब्लॉक अधूरे थे। नई मशीनें लगाई गई थीं और 50 से अधिक जगहों पर हाथों से पटाखे बनाए जा रहे थे। हालात यह थे कि सुरक्षा के नाम पर कोई व्यवस्था नहीं थी। न इमरजेंसी इलाज और न ही आग बुझाने के लिए पर्याप्त पानी की व्यवस्था। और तो और फस्र्ट एड की व्यवस्था भी नहीं थी, जो कि घरों तक में होती है।
आगरा-मुंबई नेशनल हाईवे पर टोंककला के पास स्थित यह फैक्ट्री करीब तीन बीघा क्षेत्र में फैली है। फैक्ट्री का निर्माण अभी पूरा नहीं हुआ था, इसके बावजूद यहां उत्पादन शुरू कर दिया गया। जिस ब्लॉक में धमाका हुआ वह करीब 50 फीसदी उड़ गया। वहीं अन्य छह ब्लॉकों में भी विस्फोटक से पटाखे बनाने का काम चल रहा था।
फैक्ट्री किसके नाम पर थी, लाइसेंस में कितना विस्फोटक रखने की पात्रता थी? मीडिया के इन सवालों पर संभाग आयुक्त ने सिर्फ इतना कहा कि पहले घायलों का इलाज करवा रहे हैं। वह बाद का विषय है। कई मजदूरों की उम्र 18 वर्ष से कम बताई जा रही है। ऐसे में श्रम विभाग की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। सवाल तो उठेंगे कि तहसीलदार, पटवारी और एसडीएम जैसे जिम्मेदार अधिकारी आखिर क्या कर रहे थे। विस्फोटकों के बीच मजदूर बिना किसी सुरक्षा व्यवस्था के काम कर रहे थे, लेकिन किसी ने ध्यान नहीं दिया।
पूर्व में हरदा में हुए विस्फोट ने भी कई जानें ली थीं, और तमाम सवाल भी खड़े किए थे। घटना के कुछ दिन तक प्रशासन में हलचल होती रही। ऐसा लग रहा था, मानो व्यवस्था पूरी तरह से दुरुस्त हो जाएगी। लेकिन कुछ ही दिनों में सब कुछ सामान्य हो गया। अफसरशाही अपनी औपचारिकताओं में जुट गई। उस घटना को भी फाइलों में कैद करके भुला दिया गया, अब देवास घटना की बारी है। जांच के आदेश हो गए हैं। सबको पता है कि हमारे यहां जांच कैसी होती है, कहीं कोई असल जिम्मेदार जांच के दायरे में आता ही नहीं है। कुछ छोटे कर्मचारियों पर जिम्मेदारी डाल कर कार्रवाई की औपचारिकता, और फुर्सत। जिम्मेदार फिर दूसरी घटना का इंतजार करते हैं।
सबसे बड़ी बात यह है कि ऐसी घटनाओं में सिस्टम में बैठे लोगों की जान-माल का नुकसान नहीं होता, न उन्हें कोई फर्क पड़ता है। उनके बच्चे मजदूर नहीं होते, न ही उनके परिवार मजबूर। यही कारण है कि भ्रष्ट व्यवस्था फिर अपने ऐशो-आराम की मुद्रा में पहुंच जाती है और लोग दो वक्त की रोटी के लिए जान जोखिम में डालते रहते हैं।



