संपादकीय…लगातार गिरता भूजल स्तर, जल संवर्धन पर सवाल…!

संजय सक्सेना
सेंट्रल ग्राउंड वाटर बोर्ड यानि केंद्रीय भूजल बोर्ड की ताजा रिपोर्ट ने प्रदेश के भूजल स्तर के हालातों को लेकर चिंता खड़ी कर दी है। मालवा क्षेत्र में उपजाऊ मिट्टी के नीचे का पानी लगभग खत्म होने की कगार पर है और बुंदेलखंड पहले से इस समस्या से जूझ रहा है। मध्यभारत भी चपेट में आ गया है। जन जीवन मिशन और भूजल संवर्धन अभियान के अपेक्षानुरूप परिणाम फिलहाल सामने नहीं आए हैं।
भूजल बोर्ड ने प्रदेश के दो प्रमुख जिलों भोपाल और उज्जैन को सबसे गंभीर हालत में बताया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि इन दोनों जिलों में अब एक भी ब्लॉक सुरक्षित श्रेणी में नहीं बचा है। राजधानी भोपाल में ग्राउंड वाटर का दोहन 80 प्रतिशत के पार निकल गया है, वहीं उज्जैन की स्थिति और भी भयावह है। यहां के तीन ब्लॉकों में रिचार्ज से कहीं ज्यादा 144 प्रतिशत तक धरती से पानी निकाला जा रहा है और सभी 6 ब्लॉक में रेड अलर्ट में हैं। यानि खतरे की घंटी बज चुकी है, अब हमें समझना होगा।
बुंदेलखंड का हाल तो पहले से खराब रहा है। रिपोर्ट में टीकमगढ़ का उदाहरण दिया गया है, जहां के सभी ब्लॉक रेड जोन की ओर बढ़ रहे हैं। रिपोर्ट बताती है कि अगर पानी खींचने की यही रफ्तार रही तो आने वाले सालों में इन इलाकों में बोरवेल सिर्फ धूल उगलेंगे। राहत की बात सिर्फ सागर जिले से है, जहां सभी 11 ब्लॉक फिलहाल सुरक्षित श्रेणी में बने हुए हैं क्योंकि इन ब्लॉक में 70 प्रतिशत से कम भूजल का इस्तेमाल हो रहा है।
टीकमगढ़ और छतरपुर के आधे हिस्से में पानी का अंधाधुंध दोहन भविष्य के लिए बड़ा संकट खड़ा कर रहा है। भू-जल के अधिकारियों का कहना है कि 70 प्रतिशत से अधिक भू-जल का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए। इससे कम उपयोग में ब्लॉक सुरक्षित कैटेगिरी में रहता है। टीकमगढ़ जिले के माडूमार गांव में 400 फीट गहराई तक बोर में पानी नहीं मिल रहा। पानी न होने के कारण सिर्फ खरीफ की फसल ही लेते हैं, रबी में बुवाई नहीं करते और यदि किसी साल रबी में बुवाई कर दो तो फिर सिंचाई के लिए पानी खरीदना पड़ता है।
मालवा क्षेत्र में उपजाऊ मिट्टी के नीचे का पानी लगभग खत्म होने की कगार पर पहुंच गया है। उज्जैन की खाचरोद तहसील के पथलासी गांव में भू-जल स्तर गिरने से 1000-1100 फीट तक पानी नहीं मिल रहा। गांव में 24 निजी बोर हो चुके इनमें से मात्र तीन ही सफल हुए हैं। हजार फीट गहरे तीन सरकारी बोर भी हुए, लेकिन तीनों सूखे हैं, इनमें भी पानी नहीं है।
भोपाल में भूजल की स्थिति चिंताजनक है, जो गंभीर जल संकट की ओर बढ़ रही है। शहर के सभी तीन ब्लॉक सेमी-क्रिटिकल यानि अर्ध-संकटग्रस्त जोन में हैं और 96 प्रतिशत हिस्से में जल स्तर तेजी से गिर रहा है। यह हमें आने वाले संकट को लेकर चेतावनी दे रहा है, बशर्ते हम समझें। भानपुर, रसालखेड़ी और बैरागढ़ जैसे क्षेत्रों में भूजल में फ्लोराइड और उच्च क्षारीयता पाई गई है। कुछ इलाकों में पानी में हानिकारक बैक्टीरिया और आयरन 100 गुना अधिक होने की पुष्टि हुई है। शहर के जल संसाधनों में भूजल पर निर्भरता बहुत अधिक है, और जल आपूर्ति में लगभग 120 मिलियन लीटर प्रतिदिन की कमी है।
जल संसाधन विभाग की मप्र के डायनामिक भूजल संसाधन रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि भोपाल के फंदा ब्लॉक में 80 प्रतिशत से अधिक भूजल निकाला जा रहा है। जिले की कुल भौगोलिक सीमा 2,77,237 हेक्टेयर है। इसमें से 2,64,800 हेक्टेयर यानी 96 प्रतिशत में भूजल रिचार्ज की जरूरत जताई गई है। जबकि शेष 12,437 हेक्टेयर क्षेत्र पहाड़ी है। जिले में वार्षिक निकासी योग्य भूजल संसाधन 37,553 हेक्टेयर मीटर है, जिसमें से 29,776 हेक्टेयर मीटर भूजल पहले से ही उपयोग में लाया जा रहा है। इसका मतलब है कि जिले में भूजल दोहन की औसत दर 79.29 फीसदी पहुंच चुकी है, जो कि खतरे की घंटी है।
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर तत्काल जल संरक्षण और पुनर्भरण के उपाय नहीं अपनाए गए, तो आने वाले वर्षों में स्थिति बिगड़ सकती है। कहने को भोपाल में बड़ी झील और छोटे तालाब सहित तमाम तालाब हैं, कई सूख गये या ये कह सकते हैं कि सुखा कर मिटा दिये गये। बावडिय़ां गायब होती जा रही हैं। जल संरक्षण के नाम पर कागजों में काम हो रहा है। छोटे-छोटे स्टाप डैम भी बनाए जाते हैं, लेकिन उनका जीवन एक-दो साल से ज्यादा नहीं होता। जितना पानी जमीन में पहुंचता है, उससे ज्यादा निकाल लिया जाता है।
कहीं न कहीं प्रदेश में भूजल स्तर बढ़ाने के लिए समेकित कार्ययोजना बनाने की आवश्यकता है। जल संवर्धन का काम नियमित रूप से होना चाहिए। शहरों में वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम अनिवार्य होने की बात लंबे समय से चल रही है, इस पर सही तरीके से क्रियान्वयन नहीं हो पा रहा है।
भोपाल उज्जैन में तो तत्काल प्रभाव से वाटर हार्वेस्टिंग की अनिवार्यता लागू होना चाहिए और जिन आवासों में यह सिस्टम नहीं हो, उन पर पेनाल्टी की व्यवस्था हो। और इसकी जांच भी नियमित हो, तब जाकर शहरों में भूजल के गिरते स्तर को रोका जा सकता है। नहीं तो बढ़ती आबादी और बढ़ते कांक्रीट के जंगल पूरी जमीन को बंजर बना देंगे, लोग पीने के पानी के लिए तरस जाएंगे। जागरूकता की भी बहुत जरूरत है।
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मध्य प्रदेश के जबलपुर के बरगी डैम में जिस 20 साल पुराने क्रूज की वजह से 13 मौतें हुईं, उसे एमपी टूरिज्म कॉरपोरेशन क्लीन चिट दे रहा है। हादसे की मुख्य वजह अचानक आए तूफान को माना जा रहा है।
वहीं लाइफ जैकेट पहनने को लेकर उठ रहे सवालों को लेकर टूरिज्म ने अजीब तर्क देते हुए कहा है कि लाइफ जैकेट पहनना अनिवार्य नहीं है। इसके अलावा वाटर स्पोर्ट्स की गाइडलाइन का भी पालन नहीं किया गया। यह क्रूज साल 2006 का है। इस हिसाब से उसकी उम्र 20 साल हो चुकी है।
निगम के एडवाइजर राजेंद्र निगम ने बताया कि कुछ महीने पहले ही क्रूज के दोनों इंजन बदले थे। इससे उसकी उम्र 10 साल और बढ़ गई थी। क्रूज में कोई तकनीकी समस्या नहीं थी। भविष्य में ऐसा न हो, इसलिए वेदर फोरकास्ट को ठीक करेंगे।
निगम के एडवाइजर ने गोवा और विदेश में संचालित क्रूज का हवाला देते हुए कहा कि वहां भी लाइफ जैकेट क्रूज में उपलब्ध है, लेकिन पर्यटक घूमने के दौरान नहीं पहनते हैं।
सुरक्षा मानकों के आधार पर क्रूज या वोट पर सवार होते ही लाइफ जैकेट को पहनना अनिवार्य होता है। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वाटर स्पोर्टस द्वारा गाइडलाइन में तय किए गए मापदंड स्पष्ट हैं जिसमें लाइफ जैकेट भी एक है।
हालांकि इन सबके बीच ष्टरू डॉ. मोहन यादव के आदेश के बाद जांच कमेटी बना दी गई है। 6 कर्मचारियों पर कार्रवाई हो चुकी है।
इबर रीइन्फोर्स्ड प्लास्टिक (एफआरपी) क्रूज की उम्र 20 से 25 साल होती है। यह अन्य क्रूज में सबसे सुरक्षित माना जाता है। बरगी डैम में डूबे इस क्रूज की दो साल पहले ओवरऑल सर्विसिंग कराई गई थी।
इंटरनेशनल मेनी टाइम आर्गेनेशनल के नॉर्म्स को भी फॉलो कर रहे थे। निगम के अनुसार, क्रूज का थर्ड पार्टी इंश्योरेंस हुआ था। इनमें यात्रियों का इंश्योरेंस भी शामिल हैं।एक्सपर्ट और एनजीटी में याचिका दाखिल करने वाले भोपाल के सुभाष सी. पांडे का कहना है कि एनजीटी ने उन सभाी जलस्रोतों में मोटर बोट चलाने पर प्रतिबंध लगाया है, जिनका पानी पीने के लिए उपयोग किया जा रहा हो। बरगी डैम का पानी पीने के लिए उपयोग होता है। ऐसे में यहां पर गलत तरीके से क्रूज चलाया जा रहा था।
हादसे के बाद मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने निरीक्षण किया था। वहीं, मृतकों के परिवार से भी मुलाकात की थी। सीएम के दौरे के बाद सरकार ने क्रूज मामले में एक्शन लिया था। जिसमें क्रूज पायलट महेश पटेल, क्रूज हेल्पर छोटेलाल गोंड एवं टिकट काउंटर प्रभारी (स्नह्र्र) बृजेंद्र की सेवाएं तत्काल प्रभाव से समाप्त की गई थी।
वहीं, होटल मैकल रिसॉर्ट और बोट क्लब बरगी के मैनेजर सुनील मरावी को कार्य में लापरवाही बरतने के कारण निलंबित किया गया था। रीजनल मैनेजर संजय मल्होत्रा को मुख्यालय अटैच कर विभागीय जांच शुरू की गई है। दूसरी ओर, एक कमेटी भी बनाई गई है, जो हादसे की मुख्य वजह की जांच कर रही है।

Sanjay Saxena

BSc. बायोलॉजी और समाजशास्त्र से एमए, 1985 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय , मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के दैनिक अखबारों में रिपोर्टर और संपादक के रूप में कार्य कर रहे हैं। आरटीआई, पर्यावरण, आर्थिक सामाजिक, स्वास्थ्य, योग, जैसे विषयों पर लेखन। राजनीतिक समाचार और राजनीतिक विश्लेषण , समीक्षा, चुनाव विश्लेषण, पॉलिटिकल कंसल्टेंसी में विशेषज्ञता। समाज सेवा में रुचि। लोकहित की महत्वपूर्ण जानकारी जुटाना और उस जानकारी को समाचार के रूप प्रस्तुत करना। वर्तमान में डिजिटल और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े। राजनीतिक सूचनाओं में रुचि और संदर्भ रखने के सतत प्रयास।

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