Editorial
एक पेड़ काफी नहीं, कुछ और भी करना होगा….

संजय सक्सेना
इस बार गर्मी के तेवर बहुत ज्यादा तीखे हो रहे हैं। मौसम की मार केवल मनुष्य पर ही नहीं, पूरी प्रकृति पर पड़ रही है। लेकिन इसके लिए जिम्मेदार भी तो हम ही हैं। इससे बचने की बातें बहुत होती हैं, लेकिन कोई ठोस हल नहीं निकल पा रहा है। हल निकलना मुश्किल इसलिए भी है, क्योंकि मनुष्य विकास के नाम पर प्रकृति का संतुलन बिगाड़ता जा रहा है। जलवायु परिवर्तन के साथ ही भूगर्भीय हलचलें तेज हो गई हैं, इनका मुकाबला असंभव ही है।
भारत की बात करें तो, जहां राजस्थान तापमान का रिकार्ड बनाता था, इस बार महाराष्ट्र ने भी रिकार्ड बना लिया। मध्यप्रदेश जैसा हरियाली वाला राज्य भी जमकर तप रहा है। जब सामान्य गर्मी पड़ती रही है, उस समय लू चलने लगी है। अप्रैल के महीने ने मई-जून की गर्मी को मात दे दी है। हिमालय क्षेत्र में बर्फबारी का क्रम भी बिगड़ रहा है। नदियां समय से पहले ही सूखने लगी हैं और भूगर्भीय जल स्तर लगातार कम हो रहा है।
कुल मिलाकर हालात बहुत गंभीर हो रहे हैं। यहां जब ग्लोबल वार्मिंग से मुकाबले की बात आती है, एक रटा-रटाया वाक्य चल जाता है- पेड़ लगाइए, हरियाली बढ़ाइए। हालांकि यह गलत नहीं है, पेड़ हमारी रक्षा करते हैं, लेकिन क्या केवल पेड़ लगाने से ही हम इस बढ़ते तापमान और जलवायु परिवर्तन का मुकाबला कर पाएंगे? यह सवाल इससे ज्यादा गंभीर है।
्रआज जो भीषण और असहनीय गर्मी हम महसूस कर रहे हैं, उसका मुख्य कारण पेड़ों की कटाई से अधिक वो ग्रीनहाउस गैसें हैं, जिन्हें हम लगातार अपने वातावरण में छोड़ रहे हैं। ये गैसें एक कम्बल की तरह पृथ्वी को ढक लेती हैं और सूर्य की गर्मी को बाहर जाने नहीं देतीं। एक अध्ययन के अनुसार आज वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा सामान्य स्तर से लगभग 53 प्रतिशत अधिक है। इसका मतलब यह है धरती की हीट को ट्रैप करने की क्षमता 53 प्रतिशत बढ़ गई है।
इस अतिरिक्त तापमान के कारण गर्मी के तेवर भी लगातार तीखे हो रहे हैं। वर्तमान में इस अतिरिक्त गर्मी का सबसे बड़ा कारण है हमारी ऊर्जा खपत, जिसमें पेट्रोल, डीजल, गैस, बिजली और रोजमर्रा के उत्पादों का उपयोग शामिल है। आज की तारीख में कुल कार्बन उत्सर्जन का लगभग 75 प्रतिशत हिस्सा इसी से आता है। भूमि उपयोग में बदलाव, खेती और वनों की कटाई के कारण भी कार्बन उत्सर्जन होता है, परंतु यह सब मिलाकर लगभग 25 प्रतिशत होता है। इस 25 प्रतिशत में भी पेड़ों की कटाई के कारण होने वाला कार्बन उत्सर्जन लगभग 10 प्रतिशत ही है।
यानि साफ है कि समस्या की जड़ हमारी जीवनशैली में ही है। हम व्यक्तिगत, सामाजिक और राजनीतिक रूप से गलती कर देते हैं। समस्या के छोटे हिस्से पर जोर देते हैं और समाधान भी उसी के आसपास ढूंढ़ते रहते हैं। पेड़ लगाना निश्चित रूप से आवश्यक है, लेकिन यह जलवायु परिवर्तन का मूल और स्थाई समाधान तो नहीं है।
किसी भी बीमारी के लिए कहा जाता है कि रोकथाम इलाज से बेहतर है। जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में भी यह बात सटीक बैठती है। पेड़ लगाना, सोलर पेनल लगाना या इलेक्ट्रिक वाहन अपनाना- ये सभी इलाज के सराहनीय प्रयास हैं। लेकिन यदि रोकथाम करना है, तो अनावश्यक खपत को कम करना होगा।
और सबसे दिलचस्प बात यह है कि यह रोकथाम किसी बड़ी तकनीक, भारी निवेश या सरकारी नीति पर निर्भर नहीं है। यह पूरी तरह हमारे अपने निर्णयों पर, हमारी जीवन शैली पर निर्भर है।
पर्यावरण विशेषज्ञ कहते हैं कि जलवायु सुधार के लिए सबसे बड़ा कदम इन-एक्टिविटी है, यानी कुछ न करना। इसका मतलब यह नहीं है कि हम सुस्त हो जाएं, कुछ न करें, अपितु हम अनावश्यक चीजें न खरीदना, और उनका इस्तेमाल बंद करना शुरू कर दें। इसका प्रभाव बहुत बड़ा होगा। एक से सौ और सौ से हजार- लाख करोड़ तक संख्या पहुंच सकती है।
सबसे बड़ी बात है कि हर व्यक्ति को इस समस्या को लेकर सजग होना आवश्यक हो गया है। एक गलती पूरे परिवार को और कई बार पूरे मोहल्ले को बर्बाद कर सकती है, इसे ध्यान में रखना होगा। पर्यावरण की बातें बहुत होती हैं। अखबारों से लेकर तमाम मीडिया और अब सोशल मीडिया चिंताओं से भरा है। कार्यशालाओं के आयोजन से लेकर तमाम कार्यक्रम भी होते हैं, लेकिन ठोस काम इस दिशा में बहुत ही कम हो रहा है। पर्यावरण के नाम पर लोग दुकानें भी चला रहे हैं। चलाएं, लेकिन थोड़ा काम भी करें। कोरी बातें न करें। हर आदमी यदि अपनी जीवन शैली में थोड़ा बदलाव लाए, कुछ संयम रखे और पर्यावरण बचाने के प्रयासों में हिस्सेदारी करे, तो कुछ हो सकता है। जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग से जंग में हर व्यक्ति थोड़ी-थोड़ी आहुति दे, यही बड़ा योगदान होगा, अपने और अपनों के जीवन को बचाने के लिए।
