Editorial…
सडक़ों पर मौत का तांडव
हम हेलमेट तक सिमटे

संजय सक्सेना
मध्यप्रदेश की सडक़ों पर मौत का तांडव लगातार बढ़ता जा रहा है। लोगों में अमानवीयता इतनी बढ़ गई है कि हिट एंड रन यानी टक्कर मारकर भागने के मामलों में यह प्रदेश देश में दूसरे नंबर पर पहुंच गया है। पीड़ादायक बात यह है कि इन दुर्घटनाओं में एक साल में 10 हजार से ज्यादा लोगों की मौत हुई है।  इसके बावजूद न तो सरकारी सिस्टम का ध्यान सडक़ सुरक्षा पर गया है और न ही चार पहिया वाहनों की निगरानी पर। बस, दो पहिया वाहन इनके निशाने पर होते हैं, वो भी हेलमेट की वसूली के लिए। और विडम्बना यह है कि अदालत ने भी केवल हेलमेट पर ही ध्यान दिया है। फिर, ये हिट एंड रन के दस हजार मौतों की जिम्मेदारी किसकी?
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो यानि एनसीआरबी की 2024 रिपोर्ट में जो आंकड़े सामने आए हैं, वो काफी चौंकाने वाले हैं और सावधान करने वाले भी। रिपोर्ट के मुताबिक, प्रदेश में 2024 के दौरान हिट एंड रन के 9,260 केस दर्ज किए गए और इनमें 10,130 लोगों ने जान गंवाई। इस सूची में केवल उत्तर प्रदेश ही मप्र से आगे है, जहां 18,536 मामले दर्ज हुए, जिनमें 19,641 मौतें हुईं। मप्र के बाद महाराष्ट्र और राजस्थान जैसे बड़े राज्य काफी पीछे हैं।
19,658 मामले लापरवाही से वाहन चलाने के एनसीआरबी की हालिया रिपोर्ट कहती है कि मप्र में रैश ड्राइविंग यानि तेज और लापरवाही से वाहन चलाने के 19,658 मामले दर्ज हुए। इन मामलों में 20,653 लोग किसी न किसी तरह हादसों का शिकार हुए। देशभर में दर्ज कुल 1.93 लाख मामलों में से करीब हर 10वां मामला मप्र से सामने आया है।
हालांकि दूसरी दुर्घटनाएं भी प्रदेश में कम नहीं हुई हैं। हिट एंड रन के अलावा अन्य सडक़ हादसों में भी राज्य की स्थिति गंभीर बनी हुई है। रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश में अन्य सडक़ दुर्घटनाओं की श्रेणी में 4,682 केस दर्ज किए गए, जिनमें 5,310 लोगों की मौत हुई। ये आंकड़ा भी कोई कम नहीं है। रिपोर्ट में बताया गया है कि दूसरों की जान जोखिम में डालकर घायल करने के भी 20,307 मामले दर्ज हुए हैं। इनमें 22 हजार से ज्यादा लोग जख्मी या प्रभावित हुए। घायलों के आंकड़ों में तो हमारा राज्य देश के सबसे प्रभावित राज्यों में शामिल है।
रिपोर्ट के मुताबिक केवल हिट एंड रन मामलों में मप्र में 2024 के दौरान 10,130 लोगों की मौत हुई। इसका मतलब है कि प्रदेश में रोजाना औसतन करीब 27 लोगों ने सडक़ पर दम तोड़ा। इसका समयवार औसत निकालें तो हर घंटे एक से ज्यादा व्यक्ति की जान सडक़ हादसों में जाने के आंकड़े सामने आते हैं। विश्लेषण करें तो ये आंकड़े भयावह हैं। ये एक साल पुराने आंकड़े हैं, और यह माना जा रहा है कि पिछले साल यानि 2025 में दुर्घटनाओं की रफ्तार वाहनों की रफ्तार की तरह बढ़ी ही है, कम नहीं हुई । और लापरवाही के साथ ही सडक़ सुरक्षा की सही नीति बनाने और लागू करने की कोई गंभीर कोशिश नहीं की गई।
ट्रैफिक विशेषज्ञों का मानना है कि हाईवे पर ओवरस्पीडिंग, शहरों में नियमों की अनदेखी, सीट बेल्ट को लेकर ढील और कमजोर मॉनिटरिंग इसकी मुख्य वजह है। सडक़ सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इन कारणों के साथ ही ड्राइविंग लाइसेंस प्रक्रिया में खामियां और ट्रैफिक नियमों के पालन में ढिलाई बरती जा रही है। केवल चालान काटने से हालात नहीं सुधरने की बात अब खत्म सी ही हो गई है। रोड इंजीनियरिंग, इमरजेंसी रिस्पॉन्स और ड्राइवर बिहेवियर सुधार पर एक साथ काम करना होगा।
पहले शहरों की बात करते हैं। सडक़ सुरक्षा के नाम पर केवल दोपहिया वाहनों  को प्रताडि़त करने वाला प्रशासन न तो सडक़ों के किनारे वाले अतिक्रमण हटाता है। हेलमेट जरूरी है, और इसे लगाना ही चाहिए, लेकिन और भी मुद्दे हैं, जिन पर ध्यान दिया जाना आवश्यक है। पार्किंग की बात तो केवल कागजों पर होती है, कभी अभियान के नाम पर थोड़ी हलचल होती है, फिर ढाक के तीन पात। एक उदाहरण देखिए, राजधानी भोपाल में कोलार में एक सिक्स लेन बनाई गई है, लेकिन इसमें केवल दो लेन ही चलने के लिए मिलती हैं। जहां बाजार हैं, वहां तो दोनों तरफ एक-एक चारपहिया वाहन चलने की जगह बचती है। क्या यहां हेलमेट चैकिंग से काम चलेगा?
शहरों में हर दूसरा वाहन वीआईपी बना हुआ है। लाल बत्ती गई तो हूटर का फैशन चल गया। सबसे लापरवाही से चलने वाले वाहनों में हूटर वालेू वाहन ही होते हैं। थार जैसी गाड़ी तो दुर्घटना वाली ही कही जाने लगी है। हाइवे पर दस प्रतिशत भी डिपर का प्रयोग नहीं होता। अंधाधुंध रफ्तार वाली गाडिय़ां सडक़ पर चकाचौंध करते हुए चलती हैं। आधा किलोमीटर तक कुछ नहीं दिखता। यह कौन देखेगा? क्या हाइवे पुलिसिंग भी केवल वसूली के लिए होती है? दुर्घटना के दौरान भी समय पर पुलिस और एम्बुलेंस की पहुंच नहीं है। फिर हम क्या सडक़ सुरक्षा दे रहे हैं नागरिकों को?
गलती नागरिकों की भी है, हम खुद यातायात नियमों को जेब में रखकर चलने के आदी हो गए हैं। केवल पुलिस ही नहीं, परिवहन विभाग और सडक़ बनाने वाले लोक निर्माण विभाग से लेकर सडक़ निर्माण की सभी एजेंसियों को मिलकर सडक़ सुरक्षा अभियान चलाना होगा। साल में पंद्रह दिन नहीं, हर रोज। ओवरस्पीडिंग और डिपर के प्रयोग पर भी नियंत्रण कर लिया गया, तब भी आंकड़ों में कमी आ जाएगी। ये वाक्य कह कर इतिश्री नहीं की जा सकती कि – जिसकी मौत जैसे और जहां आनी है, वहीं आएगी। शासन से लेकर तमाम संगठनों को भी बढ़ती दुर्घटनाओं के प्रति गंभीर होना पड़ेगा।

Sanjay Saxena

BSc. बायोलॉजी और समाजशास्त्र से एमए, 1985 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय , मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के दैनिक अखबारों में रिपोर्टर और संपादक के रूप में कार्य कर रहे हैं। आरटीआई, पर्यावरण, आर्थिक सामाजिक, स्वास्थ्य, योग, जैसे विषयों पर लेखन। राजनीतिक समाचार और राजनीतिक विश्लेषण , समीक्षा, चुनाव विश्लेषण, पॉलिटिकल कंसल्टेंसी में विशेषज्ञता। समाज सेवा में रुचि। लोकहित की महत्वपूर्ण जानकारी जुटाना और उस जानकारी को समाचार के रूप प्रस्तुत करना। वर्तमान में डिजिटल और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े। राजनीतिक सूचनाओं में रुचि और संदर्भ रखने के सतत प्रयास।

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