संपादकीय
बिल लागू, आरक्षण फिलहाल नहीं हो पायेगा..?

संजय सक्सेना
संसद में शुक्रवार को 131वां संविधान संशोधन विधेयक भले ही दो-तिहाई बहुमत न मिलने के कारण गिर गया हो, लेकिन इससे महिला आरक्षण की मूल योजना खत्म नहीं हुई है। 2023 में पारित मूल कानून यानि नारी शक्ति वंदन अधिनियम अभी भी प्रभावी है और 2029 में इसके लागू होने की संभावनाएं बनी हुई हैं। हालंकि विशेषज्ञ कह रहे हैं कि मूल विधेयक 2034 में ही लागू हो पाएगा।
सरकार ने 131वां संशोधन विधेयक मुख्य रूप से आरक्षण को आसान बनाने के लिए पेश किया था। इसका उद्देश्य 2011 की जनगणना के आधार पर संसद की 543 सीटें बढ़ाकर 850 करने का प्रावधान था। लोकसभा में बिल पर 21 घंटे की चर्चा के बाद वोटिंग हुई। उपस्थित 528 सांसदों ने वोट डाले। पक्ष में 298, विपक्ष में 230 वोट पड़े। बिल पास कराने के लिए दो तिहाई बहुमत की जरूरत थी। 528 का दो तिहाई 352 होता है। इस तरह बिल 54 वोट से गिर गया। इसके विफल होने का मतलब केवल यह है कि फिलहाल सीटों की संख्या बढ़ाने का सरकारी फॉर्मूला रुक गया है, लेकिन महिला कोटा का मुख्य जनादेश अभी भी सुरक्षित है।
असल में, सरकार ने लोकसभा में तीन बिल पेश किए थे। इसमें संविधान (131वां) संशोधन बिल, परिसीमन संशोधन संविधान बिल 2026 और केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) बिल 2026 शामिल थे। महिला आरक्षण बिल (नारी शक्ति वंदन अधिनियम) के तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में 33 प्रतिशत सीटें महिलाओं के लिए रिजर्व होंगी। दावा किया जा रहा है कि यह अब 2034 तक ही लागू हो पाएगा।
इसके लिए परिसीमन की जरूरत है। परिसीमन का मतलब है कि देश की आबादी के आधार पर लोकसभा और विधानसभा की सीटों की सीमाएं और संख्या तय करना। यह काम परिसीमन आयोग करता है। पहले तय होगा कि किस राज्य में कितनी सीटें होंगी। किन इलाकों की सीमाएं क्या होंगी। उसके बाद ही आरक्षण तय हो पाएगा।
संसद में बहस के बीच आधी रात को मूल कानून लागू करने का नोटिफिकेशन जारी किया गया। यानि महिला आरक्षण के जिस कानून में संशोधन की बात की जा रही है, वह लागू ही नहीं हुआ। कानून में बदलाव तभी हो सकता है जब वह लागू हो चुका हो। अचानक सरकारी नोटिफिकेशन की यही वजह मानी जा रही है। लेकिन कानून लागू होने के बावजूद संसद और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण तुरंत नहीं मिलेगा। 2023 के कानून के अनुसार यह 2027 की जनगणना और उसके आधार पर होने वाले परिसीमन के बाद ही लागू किया जा सकेगा।

दरअसल, विपक्ष ने शुक्रवार को संसद में सवाल उठाया कि जब 2023 का कानून लागू ही नहीं था, तो उसमें संशोधन का बिल कैसे लाया गया। नोटिफिकेशन रात करीब 10 बजे जारी हुआ, जबकि उससे पहले ही संशोधन बिल पेश कर उस पर चर्चा शुरू हो चुकी थी। या तो यह तकनीकी भूल थी, या जानबूझकर ऐसा किया गया?
सरकार 2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन कर महिला आरक्षण को 2029 के चुनाव से लागू करना चाहती है। इसके लिए सरकार ने संसद में तीन नए बिल पेश किए थे- संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026 परिसीमन विधेयक, 2026 और केंद्र शासित प्रदेश कानून संशोधन विधेयक, 2026। सरकार का कहना है कि सभी राज्यों की लोकसभा सीटें 50 प्रतिशत बढ़ जातीं। बढ़ी सीटों के हिसाब से महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण मिलता। जैसे यूपी में अभी 80 लोकसभा सीटें हैं। बिल पास होने के बाद यह 120 हो जातीं, जिनमें से 40 महिलाओं के लिए आरक्षित होतीं।

हालांकि विपक्ष ने महिला आरक्षण संशोधन बिल का विरोध नहीं किया लेकिन इससे जुड़े दोनों बिल के खिलाफ ही। विपक्ष ने परिसीमन बिल के विरोध के दो कारण बताए। पहला इससे दक्षिणी राज्यों की संसद में ताकत कम हो जाएगी। दूसरा यह ओबीसी और अनुसूचित जाति और जनजाति वर्ग के खिलाफ है। सरकार जानती थी कि उसके पक्ष में लोकसभा में नंबर नहीं है, इसीलिए सरकार बार-बार सभी सांसदों से समर्थन की मांग कर रही थी।
इसमें कुछ मुद्दे ऐसे हैं, जिन पर गौर किया जाना चाहिए। एक तो महिला आरक्षण को लोकसभा सीटों में वृद्धि से जोड़ा जा रहा है। विपक्ष कहता है कि जनगणना शुरू हो चुकी है, इसके बाद पहले परिसीमन हो, फिर सीटों में बढ़ोत्तरी की जाए। दूसरे, सीटों में वृद्धि से दक्षिण के राज्यों का नुकसान नहीं होना चाहिए। भाजपा को लगता है कि उत्तर और मध्य के राज्यों में उसका प्रभाव अधिक है, इसलिए वहां सीटें बढ़ाकर वह अपना विस्तार इतना कर लेगी कि उसे केंद्र में सरकार बनाने के लिए दक्षिण के राज्यों या दूसरी पार्टियों का सहारा नहीं लेना पड़ेगा। और यही कारण है कि विपक्षी पार्टियां इसके खिलाफ हैं।
महिला आरक्षण तो लागू होगा, 2029 से या 2034 से, लेकिन राह इतनी आसान नहीं है। जनसंख्या के आधार पर सीटों का पुनर्गठन राजनीतिक रूप से संवेदनशील मुद्दा है। उत्तर और दक्षिण भारत के राज्यों के बीच प्रतिनिधित्व को लेकर जो विवाद शुरू हुआ है, वो बढ़ सकता है। यदि सरकार सीटों की संख्या बढ़ाए बिना केवल निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं दोबारा तय करती है तो विपक्षी दलों के साथ आम सहमति बनने की उम्मीद ज्यादा है। फिलहाल बंगाल के चुनाव और होने हैं, फिर तमिलनाडु, केरलम, पुडुचेरी और बंगाल के नतीजे आएंगे और आगे की रणनीति तय करने में इन नतीजों की भी भूमिका होग

Sanjay Saxena

BSc. बायोलॉजी और समाजशास्त्र से एमए, 1985 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय , मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के दैनिक अखबारों में रिपोर्टर और संपादक के रूप में कार्य कर रहे हैं। आरटीआई, पर्यावरण, आर्थिक सामाजिक, स्वास्थ्य, योग, जैसे विषयों पर लेखन। राजनीतिक समाचार और राजनीतिक विश्लेषण , समीक्षा, चुनाव विश्लेषण, पॉलिटिकल कंसल्टेंसी में विशेषज्ञता। समाज सेवा में रुचि। लोकहित की महत्वपूर्ण जानकारी जुटाना और उस जानकारी को समाचार के रूप प्रस्तुत करना। वर्तमान में डिजिटल और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े। राजनीतिक सूचनाओं में रुचि और संदर्भ रखने के सतत प्रयास।

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