संपादकीय….
उधारी की अमीरी

संजय सक्सेना
एक तरफ दावा किया जा रहा है कि पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था लगातार अपनी मजबूती का प्रदर्शन कर रही है। हमारी सरकार कह रही है कि हमारी अर्थव्यवस्था ट्रिलियन में पहुंच रही है। दूसरी ओर आईएमएफ बढ़ते कर्ज को लेकर भारत को चेतावनी भी दे रहा है क्योंकि भारत की उधार की राह और कर्ज में बढ़ोतरी से जुड़ी चिंताजनक खबरें लगातार सामने आ रही हैं।
यदि यह जानकारी सही है कि देश में कर्ज 44 प्रतिशत की रफ्तार से बढ़ा है और 10 साल का रिकॉर्ड टूटा है, तो यह कोई गर्व की बात नहीं, गंभीर चिंता का विषय है। आज हमारे देश की स्थिति यह हो गई है कि बच्चों की पढ़ाई से लेकर घर के फ्रिज, कूलर, टीवी, गाड़ी, मोबाइल तक के लिए कर्ज लिया जा रहा है। शादियों के लिए कर्ज लेना तो हमारे यहां पुरानी परंपरा जैसी है, लेकिन अब उसकी राशि में काफी वृद्धि हो गई है, क्योंकि शादियां बहुत महंगी होती जा रही हैं।
आईएमएफ के मुख्य अर्थशास्त्री कह रहे हैं कि वैश्विक ऊर्जा संकट और अस्थिरता के बावजूद भारत की विकास दर स्थिर बनी हुई है। लेकिन दूसरी ओर वही आईएमएफ भारत सरकार को यह चेतावनी भी दे रहा है कि यदि इसी रफ़्तार से कर्ज लिया जाता रहा, तो देश के लिए आगे मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं। यह स्थिति देश की वित्तीय स्थिरता के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकती है, जिसे संभलकर ही सुधारा जा सकता है।
जमीनी यथार्थ तो यह है कि हम भारतीय कर्ज लेकर घी पीने वाली कहावत को चरितार्थ कर रहे हैं। हमारी आर्थिक आदतें बदल रही हैं जीवनशैली और एसेट्स के लिए पर्सनल लोन और क्रेडिट कार्ड का चलन बढ़ रहा है। दिखावा करने के लिए व्यक्ति किसी भी स्तर पर जाकर कर्ज ले लेता है और फिर कई बार आत्महत्या तक करने की स्थिति बन जाती है। देश में शुद्ध बचत में भी भारी गिरावट दिख रही है, हालांकि इसमें बड़ा कारण नोटबंदी का ही है, जिसे सरकार कतई मानने के लिए तैयार नहीं है।
सच्चाई यह है कि हमारी आदतें तेजी से बदल रही हैं। ईएमआई, क्रेडिट कार्ड और होम लोन अब जीवन का अनिवार्य अंग बन चुके हैं। आंकड़ों की बात करें तो भारतीय परिवारों की वित्तीय देनदारियां बढक़र जीडीपी के 6.2 प्रतिशत पर पहुंच गई हैं, जो बीते एक दशक का उच्चतम स्तर बताया जा रहा है। क्लाइंट एसोसिएट्स के वाइट पेपर द न्यू इंडियन हाउसहोल्ड बैलेंस शीट के अनुसार भारतीयों की उधारी अब उनकी बचत की रफ्तार को पीछे छोड़ रही है। महामारी के बाद के दौर में घरेलू कर्ज में 44.6 प्रतिशत सीएजीआर की बढ़त हुई है।
हालांकि, कुछ आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि कर्ज का बढऩा हमेशा नकारात्मक नहीं होता। यह बढ़ते आत्मविश्वास और भविष्य की बेहतर कमाई की उम्मीद का भी संकेत है। लेकिन वो इस सवाल का जवाब नहीं दे पा रहे हैं कि फिर कर्ज के बोझ के चलते लगातार आत्महत्याओं का आंकड़ा क्यों बढ़ रहा है? क्यों घर में अधिकांश विवाद आर्थिक कारणों और खासकर कर्ज को लेकर हो रहे हैं?
एक और चिंतनीय बात यह सामने आई है कि हमारे देश में बचत लगातार घट रही है। महामारी से पहले शुद्ध वित्तीय बचत जीडीपी का 7.7 प्रतिशत थी। वित वर्ष 2024 में यह घटकर 5.2 प्रतिशत रह गई। यानी हर 100 रुपए में से निवेश के लिए कम पैसे बचते हैं। इसमें बहुत बड़ा योगदान वर्तमान सरकार की नोटबंदी का भी है। पहले लोग घरों में पैसा बचा कर रखते थे। खासकर घरेलू महिलाओं का बचत में सबसे ज्यादा योगदान रहता था। लोगों को मौके पर हजारों रुपए उस बचत में से मिल जाया करते थे, जिसका उन्हें अक्सर अंदाज ही नहीं होता था। कई परिवारों में तो शादियों का बड़ा खर्च इस बचत से ही निपट जाया करता था।
एक आंकड़ा यह भी है कि इक्विटी और म्यूचुअल फंड में निवेश वित्त वर्ष 2020 के 4 प्रतिशत से करीब चार गुना बढक़र वित्त वर्ष 2025 में 15 प्रतिशत हो गया है। कई सर्वे और अध्ययन यह बता रहे हैं कि देश में कर्ज सिर्फ जरूरत के लिए नहीं, बल्कि बेहतर लाइफस्टाइल के लिए भी लिया जा रहा है। यह सेगमेंट 25.2 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है, जो सबसे तेज बताया जा रहा है। लाइफ स्टाइल अपग्रेड और कंजम्पशन के लिए पर्सनल लोन में 20 प्रतिशत से अधिक वृद्धि देखी गई है। कुल घरेलू बचत का 70 प्रतिशत हिस्सा अब रियल एस्टेट जैसे फिजिकल एसेट्स में जा रहा है, जिससे हाथ में नकदी की कमी हो रही है।
कुल मिलाकर लोगों की यह आदत आत्मघाती बनती जा दिख रही है कि कर्ज लेकर हम अपना स्टेटस बढ़ता दिखाएं, उसे मेंटेन करने के लिए लाखों के कर्जदार हो जाएं। इससे इतर, एक सच्चाई यह भी है कि तमाम नकदी और मुफ्त राशन जैसी योजनाओं के बावजूद लोग अपने रोजमर्रा के खर्च तक के लिए कर्ज लेने को मजबूर हैं। इस मुद्दे पर भी गंभीरता से ध्यान देना होगा। इस पर शायद सरकारी अर्थशास्त्रियों का ध्यान नहीं गया है। गया भी है तो वो बोलने की स्थिति में नहीं हैं।
सच यही है कि हम उधारी वाले अमीर बन रहे हैं। आबादी का बड़ा हिस्सा कर्ज में पैदा होता है, कर्ज में पलता है, बड़ा होता है और कर्ज में ही मर जाता है। फिर भी हमें अपनी अर्थव्यवस्था पर गर्व है।



