Bhopal…यादों के झरोखे से: जब एक ग़ज़ल के आगे झुक गई फिल्मी दुनियां

भोपाल के फक्कड़ शायर शैरी भोपाली के अशआर ने ‘जुगनू’ के शोर में भी अपनी पहचान मनवाई और फिल्म निर्माता को करना पड़ा समझौता
अलीम बजमी
भोपाल की अदबी फिज़ा में कुछ किस्से ऐसे हैं, जो सिर्फ सुनाए नहीं जाते, बल्कि पीढ़ियों तक महसूस किए जाते हैं। यह शहर महज़ इमारतों और झीलों का नहीं, बल्कि लफ्ज़ों, अहसासों और अदब की उस तहज़ीब का है, जहां शायरी सिर उठाकर चलती है।
ऐसी ही एक दास्तान उस दौर की है जब मुल्क आज़ादी की दहलीज़ पर खड़ा था और बंबई की फिल्मी दुनिया अपने रंगीन सफर पर। उस वक्त परदे पर आई फिल्म जुगनू। स्क्रीन पर जलवा बिखेर रहे थे दिलीप कुमार और उनके साथ थीं मल्लिका-ए-तरन्नुम नूरजहां। फिल्म के निर्माता-निर्देशक थे उनके शौहर शौकत हुसैन रिजवी।
23 मई 1947 को रिलीज़ हुई यह फिल्म उस साल की सबसे बड़ी कामयाबी बनकर उभरी। इसने न सिर्फ दिलीप कुमार को स्टारडम की ऊंचाइयों पर पहुंचाया, बल्कि एक और आवाज़ यानी मोहम्मद रफी को पार्श्वगायन में अमर कर दिया। बहुत कम लोगों को पता होगा कि मो.रफी ने इस फिल्म में अभिनय भी किया था।
ग़ज़ल का किस्सा: जब पहचान बन गई सबूत
फिल्म जुगनू में एक ग़ज़ल गूंजी
“हमें तो शाम-ए-ग़म में काटनी है ज़िंदगी अपनी,
जहां वो है वहीं ए चांद ले जा चांदनी अपनी…”
अशआर दिल में उतरते थे, लेकिन भोपाल की अदबी महफिलों के लिए ये नए नहीं थे। ये ग़ज़ल थी, शहर के नामवर शायर मोहम्मद अजगर उर्फ शैरी भोपाली की -एक ऐसा नाम, जो अपने फक्कड़ अंदाज़ और दर्द भरी आवाज़ के लिए जाना जाता था।
वे इस ग़ज़ल को बड़े-बड़े उस्तादों जैसे -जिगर मुरादाबादी, जोश मलीहाबादी और फ़ैज़ अहमद फ़ैज़-की मौजूदगी में कई मुशायरों में पढ़ चुके थे। श्रोता इन लफ्ज़ों को शैरी भोपाली के नाम से पहचानते थे।
अदालत की दहलीज़ तक पहुंची बात
जब यह ग़ज़ल बिना इजाज़त फिल्म में इस्तेमाल हुई, तो भोपाल की अदबी दुनिया में हलचल मच गई। महफिलों में आवाज़ उठी-“यह हक़ का मामला है, इसे अदालत तक जाना चाहिए।” उस वक्त भोपाल एक नवाबी रियासत था, अपनी अदालतों और कानून के साथ। अगर मामला कोर्ट तक पहुंचता, तो फिल्म की कामयाबी पर सवाल खड़े हो सकते थे। जुगनू उस समय बॉक्स ऑफिस पर कामयाबी के झंडे गाड़ रही थी और ऐसे में फिल्म निर्माता और निर्देशक को विवाद किसी भी शक्ल में मंज़ूर नहीं था।
जब समझौते ने बचाई इज़्ज़त
मामला बढ़ने पर शहर की एक असरदार शख्सियत सैयद आबिद हुसैन सामने आए। उन्होंने दोनों पक्षों को समझाया और आखिरकार मामला अदालत के बाहर ही सुलझ गया।
समझौता भी अपने आप में दिलचस्प था
तय हुआ कि भोपाल में जब भी फिल्म जुगनू लगेगी, शैरी भोपाली जिसे चाहें, उसे बालकनी में मुफ्त फिल्म दिखा सकेंगे। साथ ही यह भी कहा जाता है कि उन्हें 500 रुपए की रकम दी गई, हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि कभी नहीं हो सकी।
फक्कड़ मिज़ाज और शायरी का जादू
शैरी भोपाली महज़ एक शायर नहीं थे, बल्कि एक मिज़ाज थे-दरवेशी, बेपरवाह और खुद्दार। उनकी शायरी में दर्द की तपिश भी थी और एहसास की नज़ाकत भी। उनके कई अशआर आज भी अदब के चाहने वालों की जुबान पर है –
“अब न उठेगा हश्र तक शैरी
मुद्दतों बाद नींद आई है
——–
” बराबर ख़फ़ा हों बराबर मनाएँ,
न तुम बाज़ आओ न हम बाज़ आएँ
इन लफ्ज़ों की कशिश ही उन्हें आम शायरों से अलग मुकाम देती है।
आज भी ज़िंदा है यह दास्तान
भोपाल के अदबी हलकों में आज भी यह किस्सा बड़े शौक से सुनाया जाता है। आरिफ अली आरिफ जैसे उस्ताद शायर इसे अपनी महफिलों में जिंदा रखते हैं। जब भी फिल्मों में क्रेडिट, हक़ या अदब की बात होती है, यह दास्तान फिर से याद आती है -यह बताने के लिए कि कभी-कभी एक ग़ज़ल, एक शायर और उसका वक़ार पूरी फिल्मी दुनिया पर भारी पड़ जाता है।
यह कहानी सिर्फ एक ग़ज़ल की नहीं, बल्कि भोपाल की उस रूह की है-जो आज भी अपने अंदाज़, अपने अदब और अपने वजूद के साथ जिंदा है।





