अंततः कर्नाटक में डी के शिवकुमार के लिए सत्ता की राह खुली… लेकिन अभी कई चुनौतियों का मुकाबला करना होगा…

संजय सक्सेना

अंततः कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। राज्यपाल की अनुपस्थिति में ही उन्होंने लोकभवन को अपना इस्तीफा सौप दिया। इसके बाद उन्होंने खुद कहा कि दो दिन पहले कांग्रेस हाईकमान द्वारा दिये गये निर्देश के बाद उन्होंने कर्नाटक के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया है। इस मौके पर उन्होंने उन्हें दो बार कर्नाटक के मुख्यमंत्री के रूप में लोगों की सेवा करने का अवसर देने के लिए कांग्रेस नेतृत्व यानी सोनिया गांधी, मल्लिकार्जुन खरगे और राहुल गांधी को धन्यवाद दिया। हालांकि, पूरे भाषण के दौरान उन्होंने उपमुख्यमंत्री डी. के. शिवकुमार या किसी भी अन्य नेता का नाम अपने उत्तराधिकारी के रूप में लेने से साफ परहेज किया।

कर्नाटक विधानसभा चुनाव में जब कांग्रेस को जीत हासिल हुईं थी, उस समय भी डीके शिव कुमार की दावेदारी मजबूत थी, लेकिन पिछड़े वर्ग और वरिष्ठता के अलावा पार्टी के बिखरने के भय से शिवकुमार के बजाय सिद्धारमईया को सीएम बनाया गया। बताया जाता है कि उस समय राहुल गाँधी ने शिवकुमार को वायदा किया था कि ढाई साल बाद उन्हें सीएम बना दिया जायेगा और दावा किया जाता है कि सिद्धा इसके लिए तैयार हो गये थे। पिछले कुछ समय से कर्नाटक कांग्रेस में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा था। कई बार पार्टी टूटने की आशंका भी जताई गई। सिद्धा और डी के के बीच दिल्ली में चर्चाएं भी कराई गई। जब मामला ज्यादा गंभीर होता दिखाई दिया, शायद इसी को देखते हुए सिद्धा को इस्तीफ़ा देने के लिए कहा गया। हालांकि दिल्ली में वेणु गोपाल ने परिवर्तन की बात से इंकार किया, लेकिन आज इस्तीफ़ा हो ही गया।

माना जा रहा है कि राहुल कर्नाटक में मध्य प्रदेश जैसी स्थिति नहीं बनने देना चाहते। मध्य प्रदेश में कमलनाथ की जिद के चलते ही ज्योतिरादित्य सिंधिया की बगावत हुई और कांग्रेस सरकार चली गई थी।

हालांकि, अभी तक आधिकारिक तौर पर डीके शिवकुमार के अगले मुख्यमंत्री के तौर पर नाम का ऐलान नहीं किया गया है लेकिन इस बात की पूरी संभावना है कि सिद्धारमैया के उत्तराधिकारी वही होंगे। सिद्धारमैया के इस्तीफे के बाद डीके शिवकुमार ने दिल्ली की उड़ान पकड़ ली है।

D. K. Shivakumar की राजनीतिक यात्रा का यह विवरण बताता है कि वह सिर्फ़ एक चुनावी नेता नहीं, बल्कि संगठन, संसाधन और सत्ता-संतुलन की राजनीति को गहराई से समझने वाले रणनीतिक खिलाड़ी हैं।
इस पूरे घटनाक्रम से उनकी राजनीति के कुछ बड़े पहलू साफ़ दिखाई देते हैं:
सत्ता हासिल करने का आक्रामक संकल्प
1999 में आधी रात को S. M. Krishna को जगाकर मंत्री पद की मांग करना केवल एक राजनीतिक किस्सा नहीं, बल्कि यह संकेत है कि शिवकुमार अवसर का इंतज़ार करने के बजाय उसे हासिल करने में विश्वास रखते हैं। उनकी शैली “पद दिया जाए” से अधिक “पद लिया जाए” वाली रही है।
संगठनात्मक ताकत उनकी सबसे बड़ी पूंजी
कांग्रेस के संकट के समय विधायकों को एकजुट रखने में उनकी भूमिका ने उन्हें पार्टी का भरोसेमंद संकटमोचक बनाया।
2003 में महाराष्ट्र के विधायकों की मेज़बानी
2017 में गुजरात में Ahmed Patel के राज्यसभा चुनाव को बचाने की रणनीति

इन घटनाओं ने केंद्रीय नेतृत्व, खासकर Sonia Gandhi और Rahul Gandhi के बीच उनकी विश्वसनीयता मज़बूत की।
राजनीति और कारोबार का समानांतर विस्तार
शिवकुमार ने शुरुआती दौर में ज़मीन और रियल एस्टेट में निवेश का महत्व समझ लिया था। यही कारण है कि आज वे कर्नाटक के सबसे संपन्न नेताओं में गिने जाते हैं। उनकी आर्थिक ताकत ने भी उनकी राजनीतिक पकड़ को मज़बूती दी।
सिद्धारमैया बनाम शिवकुमार शक्ति संतुलन
Siddaramaiah और शिवकुमार के बीच पिछले कुछ वर्षों से सत्ता संतुलन का संघर्ष चलता रहा। कांग्रेस नेतृत्व लंबे समय तक दोनों के बीच संतुलन बनाए रखना चाहता था, लेकिन लगातार दो शक्ति केंद्र बने रहने से प्रशासनिक और राजनीतिक दबाव बढ़ रहा था।
अब नेतृत्व ने यह संकेत दिया है कि संगठनात्मक नियंत्रण और भविष्य की चुनावी रणनीति के लिए शिवकुमार पर दांव लगाया जा रहा है।

मुख्यमंत्री बनने के बाद असली चुनौती
मुख्यमंत्री पद हासिल करना उनके लिए बड़ी उपलब्धि होगी, लेकिन शासन चलाना अलग परीक्षा होगी। उन्हें:
लिंगायत समुदाय को साथ रखना,
सिद्धारमैया समर्थक कुरुबा वोट बैंक को नाराज़ न होने देना,
और कांग्रेस के भीतर गुटबाज़ी को नियंत्रित करना होगा।
कांग्रेस के लिए प्रतीकात्मक संदेश
शिवकुमार का उभार कांग्रेस में “वफादारी + संसाधन जुटाने की क्षमता + संगठन” के मॉडल की जीत माना जा रहा है। यह संदेश भी गया है कि पार्टी हाईकमान अब लंबे समय तक नेतृत्व विवाद टालने के मूड में नहीं है।
राजनीतिक रूप से देखें तो D. K. Shivakumar का मुख्यमंत्री बनना केवल नेतृत्व परिवर्तन नहीं, बल्कि कांग्रेस के भीतर शक्ति संरचना के पुनर्गठन का संकेत है।

Sanjay Saxena

BSc. बायोलॉजी और समाजशास्त्र से एमए, 1985 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय , मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के दैनिक अखबारों में रिपोर्टर और संपादक के रूप में कार्य कर रहे हैं। आरटीआई, पर्यावरण, आर्थिक सामाजिक, स्वास्थ्य, योग, जैसे विषयों पर लेखन। राजनीतिक समाचार और राजनीतिक विश्लेषण , समीक्षा, चुनाव विश्लेषण, पॉलिटिकल कंसल्टेंसी में विशेषज्ञता। समाज सेवा में रुचि। लोकहित की महत्वपूर्ण जानकारी जुटाना और उस जानकारी को समाचार के रूप प्रस्तुत करना। वर्तमान में डिजिटल और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े। राजनीतिक सूचनाओं में रुचि और संदर्भ रखने के सतत प्रयास।

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