SIR में नाम कटा, फिर भी निकाय चुनाव में डाल सकेंगे वोट? ECI-SEC विवाद से समझिए पूरा मामला

भोपाल। प्रदेश में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के बाद लाखों मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से हटाए जाने के बावजूद अब एक नई संवैधानिक और प्रशासनिक बहस खड़ी हो गई है। सवाल यह है कि जिन लोगों का नाम विधानसभा और लोकसभा की मतदाता सूची से हट चुका है, क्या वे अगले साल नगर निगम और पंचायत चुनावों में फिर भी मतदान कर पाएंगे?
स्थिति इसलिए बनी है क्योंकि भारत निर्वाचन आयोग (ECI) और राज्य निर्वाचन आयोग (SEC) की मतदाता सूचियां तकनीकी और कानूनी रूप से अलग-अलग संचालित होती हैं। इसी अंतर ने चुनावी व्यवस्था और SIR की प्रभावशीलता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
क्या है पूरा विवाद?
राज्य निर्वाचन आयोग ने SIR के बाद संशोधित मतदाता सूची केंद्र के अधीन काम करने वाले भारत निर्वाचन आयोग से मांगी थी। यह सूची आगामी नगरीय निकाय उपचुनावों और 2027 के पंचायत-नगर निगम चुनावों में उपयोग के लिए जरूरी मानी जा रही थी।
सूत्रों के मुताबिक SEC ने कई बार पत्राचार किया, लेकिन नई सूची उपलब्ध नहीं कराई गई। इसके बाद राज्य निर्वाचन आयोग ने स्थानीय निकाय चुनावों के लिए अलग मतदाता सूची तैयार करने की प्रक्रिया शुरू कर दी।
यहीं से विवाद की शुरुआत हुई।
अब संभावना यह बन रही है कि जिन मतदाताओं का नाम SIR में “डुप्लीकेट”, “शिफ्टेड”, “मृतक” या “अप्रमाणित” श्रेणी में हटाया गया, उनमें से कुछ लोग स्थानीय निकायों की सूची में फिर शामिल हो सकते हैं।
आखिर ECI और SEC की वोटर लिस्ट अलग क्यों होती है?
भारत का चुनावी ढांचा दो अलग संवैधानिक संस्थाओं पर आधारित है:
लोकसभा और विधानसभा चुनाव कराता है — Election Commission of India
पंचायत और नगरीय निकाय चुनाव कराता है — Madhya Pradesh State Election Commission
सामान्य तौर पर दोनों संस्थाएं एक ही मूल मतदाता डेटा का उपयोग करती हैं, लेकिन कानूनी रूप से दोनों स्वतंत्र हैं।
यानी राज्य निर्वाचन आयोग केंद्रीय सूची को आधार बना सकता है, पर वह अपनी अलग सूची भी तैयार कर सकता है। यही वजह है कि कई बार स्थानीय चुनावों और विधानसभा चुनावों की मतदाता सूचियों में अंतर देखने को मिलता है।
SIR में कितने नाम हटे और क्यों?
SIR अभियान के दौरान मध्यप्रदेश में करीब 34 लाख नाम हटाए गए। इनमें मुख्य रूप से:
मृत मतदाता
डुप्लीकेट एंट्री
दूसरे स्थान पर शिफ्ट हो चुके लोग
अधूरे या अप्रमाणित दस्तावेज वाले मतदाता
शामिल बताए जा रहे हैं।
चुनाव आयोग का तर्क है कि इसका उद्देश्य “शुद्ध और पारदर्शी” मतदाता सूची तैयार करना था, ताकि फर्जी मतदान और डुप्लीकेट वोटिंग पर रोक लग सके।
फिर निकाय चुनाव में वोट कैसे संभव होगा?
यही सबसे बड़ा सवाल है।
यदि राज्य निर्वाचन आयोग अपनी स्वतंत्र सूची तैयार करता है और उसमें ऐसे लोगों के नाम शामिल हो जाते हैं जिनका नाम ECI की सूची से हट चुका है, तो वे स्थानीय चुनावों में मतदान के पात्र बन सकते हैं।
रिटायर्ड प्रशासनिक अधिकारी आरआर बंसल जैसे चुनावी मामलों के जानकारों का कहना है कि स्थानीय निकायों और विधानसभा चुनावों की मतदाता सूचियां व्यवहारिक रूप से हमेशा पूरी तरह एक जैसी नहीं रही हैं।
इसका मतलब यह हुआ कि:
विधानसभा चुनाव में व्यक्ति वोट न डाल पाए
लेकिन पंचायत या नगर निगम चुनाव में उसका नाम मौजूद हो सकता है
क्या यह पहली बार हुआ है?
मतदाता सूची साझा करने और अधिकार क्षेत्र को लेकर ECI और राज्यों के बीच पहले भी मतभेद सामने आते रहे हैं। हालांकि मध्यप्रदेश में मामला इसलिए ज्यादा संवेदनशील माना जा रहा है क्योंकि यहां बड़े पैमाने पर नाम हटाए गए हैं और जल्द ही स्थानीय चुनाव होने हैं।
SIR की विश्वसनीयता पर उठे सवाल
अगर विधानसभा और निकाय चुनावों की वोटर लिस्ट अलग-अलग रहती है, तो विपक्ष और चुनावी विशेषज्ञ SIR की उपयोगिता पर सवाल उठा रहे हैं।
उनका तर्क है कि:
यदि हटाए गए मतदाता दूसरी सूची में फिर शामिल हो सकते हैं
तो “एक व्यक्ति-एक वैध वोटर रिकॉर्ड” का उद्देश्य कमजोर पड़ सकता है
हालांकि चुनावी विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि स्थानीय निकाय चुनावों की प्रकृति अलग होती है और कई बार अपडेट की समय-सीमा अलग होने से सूची में अंतर आ जाता है।
आगे क्या हो सकता है?
आने वाले महीनों में सबसे अहम मुद्दा यही रहेगा कि:
क्या ECI और SEC किसी साझा डेटाबेस पर सहमत होंगे?
क्या निकाय चुनावों से पहले सूची का दोबारा मिलान होगा?
और क्या SIR में हटे मतदाताओं को दोबारा दावा-आपत्ति प्रक्रिया के जरिए शामिल होने का मौका मिलेगा?
इन सवालों के जवाब तय करेंगे कि मध्यप्रदेश में अगला चुनावी विवाद मतदाता सूची को लेकर कितना बड़ा बन सकता है।





