Editorial
निर्यात में पिछड़ता मध्यप्रदेश
मध्यप्रदेश में पिछले बीस वर्षों के दौरान दर्जनों बिजनेस कान्क्लेव आयोजित किए गए। राज्य के अंदर से लेकर देश के कई शहरों और विदेशों में भी उद्योगपतियों-कारोबारियों को बुलाकर भव्य निवेशक सम्मेलन आयोजित किए गए। लेकिन आज हालात ये हैं कि हम निर्यात के मामले में और पिछड़ते जा रहे हैं, देश के राज्यों में तेरहवें स्थान से खिसककर पंद्रहवें स्थान पर पहुंच गए हैं।
हाल ही में जारी हुई डायरेक्टर जनरल ऑफ फॉरेन ट्रेड (डीजीएफटी)और डायरेक्टर जनरल ऑफ कमर्शियल इनफार्मेशन एंड स्टेटिस्टिक्स की रिपोर्ट में ये जानकारी सामने आई है कि वित्तीय वर्ष 2023-24 में मप्र का निर्यात 65,255 करोड़ रुपए का रहा। यह पिछले साल के मुकाबले 623 करोड़ रुपए कम है। रिपोर्ट में बताया गया है कि हरियाणा और ओडिशा जैसे छोटे राज्य भी एक्सपोर्ट के मामले में मप्र के आगे हैं। साल 2022 -23 में प्रदेश ने 65,878 करोड़ का एक्सपोर्ट किया था। देश से पिछले वित्तीय वर्ष में कुल 36 लाख करोड़ का एक्सपोर्ट हुआ है। हालांकि इसमें मप्र का योगदान इसमें 1.80 प्रतिशत ही है।
प्रदेश में फार्मा 5 सालों से सबसे बड़ा एक्सपोर्ट सेक्टर बना हुआ है। इसके अलावा कपड़े, अनाज, हैवी मशीनरी, एल्युमीनियम और प्लास्टिक प्रोडक्ट्स का भी एक्सपोर्ट होता है। निर्यात के मामले में गुजरात 11 लाख करोड़ से अधिक के एक्सपोर्ट के साथ लिस्ट में पहले नंबर पर है। महाराष्ट्र 5.5 लाख करोड़ के साथ दूसरे नंबर पर है।
पिछले दो सालों में मप्र से सबसे अधिक एक्सपोर्ट अमेरिका और बांग्लादेश को किया जा रहा है। चीन, नीदरलैंड और यूएई को भी प्रोडक्ट एक्सपोर्ट किए जा रहे हैं। अमेरिका को 12600 करोड़ तो बांग्लादेश को 5524 करोड़ का सामान एक्सपोर्ट किया गया। डीजीएफटी का टारगेट है कि मप्र से साल 2030 तक 4 लाख करोड़ का एक्सपोर्ट हो। इसके लिए एक्सपोर्ट को 6 सालों में 6 गुना तक बढ़ाना होगा। फेडरेशन ऑफ एमपी चैम्बर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री कहती है कि एक्सपोर्ट बढ़ाने के लिए हाई वैल्यू प्रोडक्ट्स को बढ़ाना होगा। वही राज्य आगे बढ़ रहे हैं जो इज ऑफ डूइंग बिजनेस में तेजी से काम कर रहे हैं। मप्र को भी ऐसा ही करना होगा।
पिछले एक साल से जिलों में एमपीआईडीसी और एमएसएमई विभाग मिलकर एक्सपोर्ट प्रमोशन चलाते रहे हैं। इन कार्यक्रमों में इस बात पर फोकस रहता है कि व्यावसायियों को एक्सपोर्ट के लिए प्रेरित करें। एक्सपर्ट की सहायता से जाने कि जिले से क्या एक्सपोर्ट हो सकता है। जीआई टैग और वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट योजना में भी जुड़े उत्पादों के एक्सपोर्ट का प्रयास हो रहा है।
सवाल ये उठता है कि करोड़ों के कर्ज दिए जाते हैं। करोड़ों रुपए का खर्च निवेशक सम्मेलन, उद्योगपतियों की आवभगत में किया जाता है। विदेश यात्राएं कर ली जाती हैं। न कोई बड़े उद्योग लग पाते हैं और न ही प्रदेश का निर्यात बढ़ रहा है। उलटे कम होता जा रहा है। ऐसा क्यों? सरकार तो खर्च करती है, लेकिन सही मायने में इसका रिटर्न नहीं मिल पा रहा है। तभी तो सरकारी प्रयासों और योजनाओं पर हमेशा सवालिया निशान लगते हैं। तभी तो सरकारी शब्द का प्रयोग असफल योजनाओं के लिए किया जाता है।
लेकिन पिछले बीस सालों में देखा जाए तो प्रोफेशनल तरीके भी अपनाए गए। लेकिन कुछ तो कमी रही होगी, जिसके चलते प्रदेश में बड़े उद्योग नहीं आए। जिसके कारण यहां जो उद्योग लगे हैं, उनकी भी हालत खराब होती जा रही है। जिसके चलते यहां के तमाम बड़े कारोबारी दूसरे राज्यों में पलायन करते जा रहे हैं। यहां के प्रतिभाशाली युवा अपना स्किल दूसरे राज्यों और दूसरे देशों में साबित कर रहे हैं।
सही मायने में तो हमें अपने गिरेबान में सही तरीके से झांकना होगा। योजनाओं का क्रियान्वयन कैसे हो रहा है, इस पर निगाह रखनी होगी। एक सच यह भी है कि यहां जरूरतमंद के बजाय जुगाड़ के आधार पर व्यावसायिक कर्ज ज्यादा दिए जाते हैं। तमाम लोग उद्योग के लिए कर्ज लेते हैं, उद्योग या तो कागजों में ही लग जाते हैं, या औपचारिकता की जाती है, और कर्ज डूब जाते हैं। डुबो दिए जाते हैं। बैंकों से लेकर उद्योग और इससे जुड़े उपक्रमों में बैठे अधिकारी मिलकर यह खेल खेलते हैं।
सही बात तो यह है कि हमारी उद्योग नीति में ही कहीं न कहीं खामी है। हम कहते कुछ हैं और होता कुछ है। सरकार का मामला होता है, इसलिए कोई विरोध भी नहीं कर पाता। विपक्ष कुछ कहता है, तो वो विपक्ष ही है। उसकी बात सिरे से नकार दी जाती है। जो सही मायने में उद्योग लगाना चाहते हैं, उन्हें सुविधा नहीं मिलती। कुछ रैकेट भी चलते हैं, जो सरकार का खजाना भी खाली करवा देते हैं और जमीन पर कोई उपलब्धि भी हासिल नहीं होती। सरकार को सही मायने में इस मुद्दे पर तरीके से विचार करना होगा। क्योंकि यही ऐसा मुद्दा है, जो देश और प्रदेश के भविष्य को संवार सकता है। भाषणबाजी से केवल भ्रमित होकर लोगों के वोट की कबाड़े जा सकते हैं।
– संजय सक्सेना