CJI की पर्यावरण मामले पर टिप्पणी को लेकर पूर्व नौकरशाहों ने जताया ऐतराज, लिखा खुला पत्र

नई दिल्ली। भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत को 70 से अधिक सेवानिवृत्त सिविल सेवकों द्वारा लिखे गए खुले पत्र ने न्यायपालिका, पर्यावरणीय न्याय और लोकतांत्रिक असहमति को लेकर नई बहस छेड़ दी है। यह पत्र उस मौखिक टिप्पणी पर आपत्ति जताते हुए लिखा गया है, जो उन्होंने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) के एक आदेश के खिलाफ दायर अपील की सुनवाई के दौरान की थी।
मामला गुजरात के पिपावाव पोर्ट विस्तार परियोजना से जुड़ा है। NGT ने 26 नवंबर 2025 को परियोजना को दी गई पर्यावरणीय और तटीय विनियमन क्षेत्र (CRZ) मंजूरी को बरकरार रखा था। इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की गई थी।
सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत ने मौखिक रूप से कहा था कि “हमें भारत में भी ऐसी परियोजना दिखाइए जहां पर्यावरण कार्यकर्ता कहें कि हम इस परियोजना का स्वागत करते हैं, देश अच्छी प्रगति कर रहा है।” हालांकि यह टिप्पणी अदालत के लिखित आदेश का हिस्सा नहीं थी, लेकिन इसी को लेकर आपत्ति दर्ज कराई गई है।
यह खुला पत्र “कॉन्स्टिट्यूशनल कंडक्ट ग्रुप” से जुड़े 71 पूर्व सिविल सेवकों ने जारी किया। पत्र में कहा गया कि इस तरह की टिप्पणियां पर्यावरणीय मुद्दों पर आवाज उठाने वाले नागरिकों और कार्यकर्ताओं में भय का माहौल पैदा कर सकती हैं। हस्ताक्षरकर्ताओं के अनुसार, इससे लोग पारिस्थितिक क्षति, सार्वजनिक स्वास्थ्य और प्रभावित समुदायों से जुड़े सवाल उठाने से हतोत्साहित हो सकते हैं।
पत्र में यह भी कहा गया कि न्यायपालिका की ओर से आने वाले ऐसे संकेत लोकतांत्रिक असहमति को कमजोर कर सकते हैं और “विकास बनाम पर्यावरण” की बहस में निष्पक्षता पर सवाल खड़े कर सकते हैं।
इस पत्र पर हस्ताक्षर करने वालों में नजीब जंग, हर्ष मंदर, के. रघुनाथ और मीना गुप्ता जैसे पूर्व वरिष्ठ अधिकारी शामिल हैं।
हस्ताक्षरकर्ताओं ने कहा कि CJI की टिप्पणी से पूर्वाग्रह और पक्षपात का आभास मिलता है, जो देश के सर्वोच्च न्यायिक पद से आने के कारण अधिक गंभीर माना जाना चाहिए।





