संपादकीय:
मजदूर.. मौत का तांडव और लापरवाह सिस्टम…!

संजय सक्सेना
किसी परिवार का सहारा चला गया तो कोई परिवार पूरा ही खत्म हो गया। किसी घर में बुजुर्ग और बच्ची, तो किसी में एक बालक बचा। एक चिता पर चार अर्थियां कहीं सामान्य रूप से जलती तो नहीं देखी होंगी! ये कहानी का हिस्सा नहीं है। ये उस घटना की सच्चाई है, जो हमारे कठोर और हद दर्जे के लापरवाह सिस्टम को आइना दिखाती है। जो दिल को झकझोर कर रख देती है। परंतु क्या सिस्टम को इस पर थोड़ी भी शर्म आती है? क्या सिस्टम अपनी खामी मानने के लिए तैयार है? जब मानने के लिए तैयार हो, तभी तो उसमें सुधार की गुंजाइश होगी।
इंदौर-अहमदाबाद नेशनल हाईवे 47 पर धार जिले में हुए भीषण हादसे ने सोलह लोगों की जान ही नहीं ली, यह बता दिया कि वर्तमान में केवल पैसे वालों की जान की ही कीमत होती है। मजदूर, बेरोजगारों की कोई कीमत नहीं होती। उन्हें जानवरों की तरह ढोया जाता है। उन्हें बिना बीमा की गाडिय़ों में मरने के लिए छोड़ दिया जाता है। जिंदा रहने पर उन्हें काम नहीं मिलता, दुर्घटनाओं के बाद सरकार की मरहम उनके परिवारों पर लगा दी जाती है। पर, जिस परिवार में कोई बचा ही नहीं हो, उसका क्या?
एक दुर्घटना ने 16 परिवारों को गहरे शोक में डुबो दिया है। इंदौर और धार के अस्पतालों में 25 से अधिक लोग अब भी जिंदगी की जंग लड़ रहे हैं। बड़ा सवाल ये है-हादसा कैसे हुआ और इसके जिम्मेदार कौन हैं? एक अखबार में प्रकाशित खबर के अनुसार मौके पर रोड सेफ्टी के नियमों की खुली अनदेखी हो रही थी। नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया यानि एनएचएआई, जो टोल बसूलने या वसूल करवाने में कोई कसर नहीं छोड़ता, उसकी सडक़ व्यवस्था पर सवाल उठे हैं, वहीं इंदौर डीआईजी ने भी सुरक्षा खामियों की ओर इशारा किया है।
घटना कुछ इस प्रकार बताई जा रही है। इस पर गौर करना इसलिए जरूरी है, क्योंकि इसी में अनदेखी और लापरवाही की कहानी छिपी है। इंदौर से अहमदाबाद की ओर जा रहा ठेके पर जा रहे गरीब मजदूरों से भरा तेज रफ्तार लोडिंग वाहन अचानक असंतुलित होकर डिवाइडर पार कर दूसरी लेन में पहुंच गया। सामने से आ रही स्कॉर्पियो से उसकी भीषण टक्कर हुई और लोडिंग वाहन खाई में उतर गया। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार वाहन की रफ्तार करीब 100 किमी प्रतिघंटा थी और उसने 4 से 5 पलटियां खाईं।
दुर्घटना वाली जगह पर रोड और डिवाइडर बेहद करीब हैं। वाहन असंतुलित होते ही डिवाइडर उसे रोक नहीं सका और वह दूसरी तरफ चला गया। यदि डिवाइडर ऊंचा होता या बीच में झाडिय़ां/छोटे पेड़ होते, तो वाहन की गति कम हो सकती थी और नुकसान इतना बड़ा नहीं होता। फिर, तेज रफ्तार के बावजूद ड्राइवर को सतर्क करने के लिए मौके पर न रिफलेक्टर थे और न ही येलो लाइट। ऐसे संकेतक होते तो वाहन की गति कम हो सकती थी और हादसा टल सकता था।
जहां कट बना है, वहां दोनों डिवाइडर एक लाइन में नहीं हैं। तेज रफ्तार के चलते ड्राइवर को अचानक सामने डिवाइडर समझ नहीं आया और वाहन अनियंत्रित हो गया।
इंदौर ग्रामीण डीआईजी मनोज कुमार सिंह ने भी रोड इंजीनियरिंग में खामी की पुष्टि की है। उन्होंने एनएचएआई को पत्र लिखकर सुधार के निर्देश दिए हैं। लेकिन यह जरूरी नहीं कि सडक़ मंत्रालय के अफसर इसे गंभीरता से लें। उनकी सडक़ों पर तो रोजाना दर्जनों दुर्घटनाएं होती हैं, कई लोग काल के गाल में समा जाते हैं। कहां-कहां देखेंगे। उन्हें तो अपने वेतन और उससे ज्यादा, सडक़ों के निर्माण से लेकर मरम्मत के लिए मिलने वाली भेंटों से मतलब होता है।
हादसे का दूसरा बड़ा जिम्मेदार लोडिंग वाहन चालक रहा है। चालक सुरक्षित है, पुलिस ने प्राथमिक उपचार के बाद उसे गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। जिस वाहन का उपयोग पशु या सामान ढोने के लिए होता है, उसी में लोगों को बैठाकर ले जाया जा रहा था। और, हैरानी की कोई बात नहीं, कि उसने छोटे से वाहन में 50 से अधिक मजदूर भरे थे। कोई सुरक्षा इंतजाम नहीं थे, जो उनकी आदत में आ गया है, क्योंकि हफ्ता इन पर भारी पड़ता है। रफ्तार 100 किमी प्रति घंटा के आसपास। थोड़ी सी चूक भी जानलेवा साबित होना तय था।
अब आते हैं, उन लाचार मजदूरों पर, जिन्हें जानवरों की तरह वाहन में भरा गया था। यह तस्वीर का वो पहलू है,जो हमारी तमाम योजनाओं के क्रियान्वयन और उनके परिणामों की हकीकत बयां करती है। ये जहां रहते हैं, उन इलाकों में रोजगार का बड़ा संकट है। मजबूरी में लोग दूसरे गांवों में मजदूरी करने जाते हैं।
इसके लिए गांव के कुछ लोग लोडिंग वाहन लेकर ठेका लेते हैं और महिलाओं को इक_ा कर इन्हीं वाहनों में ठूंसकर ले जाते हैं।
मजदूरों को ले जाने वाले ठेकेदार ज्यादा कमाई के लिए क्षमता से अधिक लोगों को भरते हैं। प्रति मजदूर करीब 300 रुपए मजदूरी तय है, जिसमें से ठेकेदार 50 रुपए कमीशन काटते हैं। सुबह गांव के बाहर वाहन खड़ा कर मजदूरों को भर लिया जाता है और शाम को वापस छोड़ा जाता है।क्षेत्र में लोडिंग वाहनों में लोगों का सफर कोई नई बात नहीं है। हादसे के बाद भी इंदौर-अहमदाबाद नेशनल हाईवे पर धार के आसपास और शहर के कई हिस्सों में ऐसे वाहन बेखौफ दौड़ते दिखे। इन्हें रोकना पुलिस की जिम्मेदारी है, लेकिन कार्रवाई अक्सर खानापूर्ति तक सीमित रह जाती है।
दूसरी ओर, आरटीओ का कामकाज भी सवालों के घेरे में है। फिटनेस जांच कैसे होती है, यह इस हादसे ने उजागर कर दिया। लोडिंग वाहन में करीब 50 मजदूर भरे थे, जबकि यह सवारी के लिए बना ही नहीं। ऊपर से लोहे का शेड लगाकर अतिरिक्त जगह बनाई गई थी। आरटीओ का काम केवल हफ्ता वसूली तक ही सीमित होता है? वेतन देना तो सरकार की मजबूरी होती है, ये विभाग ऊपरी कमाई के लिए ही तो जाना जाता है। उन्हें कमाई से मतलब, दुर्घटनाओं की जिम्मेदारी तो किसी पर आनी नहीं है, न किसी पर कार्रवाई होना है, होना भी है, तो कुछ दिन बाद फिर कमाई वाली पोस्टिंग मिल जाना है।
सो जिनके दिल दहले हैं, दुर्घटना से जिनकी आंखें नम हो गई हैं, वो अपना दुख अपने पास रखें। और जिन्होंने परिवार या परिजन खोए हैं, वो अपनी दर्द जिससे बांटना चाहें, बांटें, सिस्टम अपनी तरह से काम करेगा। सरकार ने जांच के आदेश दे दिये हैं। मृतकों और घायलों को आर्थिक मदद भी दे दी गई है। जय हिंद, जय भारत।



