संपादकीय…
आत्महत्या या सिस्टम द्वारा हत्या…?

संजय सक्सेना
नीट पेपर लीक के कारण परीक्षा निरस्त करके दुबारा परीक्षा कराने का निर्णय तो ले लिया गया, लेकिन एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है, जिन बच्चों के पहले पेपर बहुत अच्छे हुए, वो फिर से वैसा प्रदर्शन कर पाएंगे? और, दुबारा उतनी मेहनत हो पाएगी, क्योंकि वो मानसिक दबाव झेल रहे हैं? सबसे बड़ा सवाल तो उस मां का है, जो कह रही है- पेपर तो दोबारा करा लोगे, लेकिन मेरी बेटी को लौटा पाओगे क्या?
क्योंकि उसकी बेटी दुबारा परीक्षा देने के पहले ही हार गई। अपनी मेहनत से नहीं, इस सिस्टम से। उस सिस्टम से, जिसने उसकी जान ली। उसने आत्महत्या नहीं की, सिस्टम ने उसकी हत्या की है। सिस्टम में बैठे लोगों को यह बात कड़वी लग सकती है, लेकिन सही यही है। यह आत्महत्या उस बच्ची ने की है,जो व्यापमं घोटाले वाले प्रदेश में रहती है। व्यापमं घोटाले ने भी दो दर्जन से अधिक बच्चों की जान ले ली थी। न जाने कितने निर्दोष मां-बाप को उस घोटाले ने मार दिया था। जान से भी और आर्थिक रूप से भी।
पहले तो उस मां की पीड़ा पर जाते हैं, जिसकी बेटी ने परीक्षा निरस्त होने के कारण आत्महत्या कर ली। मां कहती है- वो आज भी मेरी आंखों के सामने खड़ी हो जाती है। कहती है- मां मुझे माफ कर देना। मैं डॉक्टर नहीं बन पाई। आपके और पापा के सपने पूरे नहीं कर पाई। मां पूछती है-मेरी बच्ची का क्या कसूर था? क्या गरीब परिवार में जन्म लेकर डॉक्टर बनने का सपना देखना ही उसका गुनाह था? यह कहते-कहते मां नीलम चतुर्वेदी फफक पड़ती है। शब्द गले में अटक जाते हैं। आंसू रुकने का नाम नहीं लेते।
नीट पेपर लीक मामले के बाद नागपुर में सुसाइड करने वाली मऊगंज की छात्रा आकांक्षा चतुर्वेदी के घर में 11 दिन बाद भी मातम पसरा हुआ है। परिजनों के मुताबिक, आकांक्षा मेधावी छात्रा थी। उसे 650 से अधिक अंक मिलने की उम्मीद थी, लेकिन नीट परीक्षा में धांधली और पेपर लीक की खबरों ने उसे मानसिक तनाव में धकेल दिया। परीक्षा दोबारा होने की आशंकाओं के बीच वह पूरी तरह टूट गई थी।
गंभीर बात यह है कि बेटी को डॉक्टर बनाने के लिए पिता कृष्णकुमार चतुर्वेदी ने करीब 15-20 लाख रुपए से ज्यादा का कर्ज ले रखा है। पिता अपनी बेटी का अंतिम संस्कार तक नहीं देख पाए। बेटी की मौत की खबर सुनते ही उनकी तबीयत इतनी बिगड़ गई कि उन्हें नागपुर के अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। डॉक्टरों के मुताबिक, वे डिप्रेशन में हैं। परिवार का कहना है कि जिस बेटी की पढ़ाई के लिए पिता ने जिंदगी भर की कमाई और भविष्य दांव पर लगा दिया, उसी बेटी को आखिरी विदाई देना भी उनके नसीब में नहीं था। इधर निजी अस्पताल में इलाज के चलते परिवार पर आर्थिक बोझ और बढ़ता जा रहा है।
नीलम बताती हैं- पति हार्ट पेशंट हैं। उन्हें दो बार अटैक आ चुका है। हर बार ईश्वर ने उन्हें बचा लिया। 2 साल पहले उन्हें लकवा मार गया। एक समय ऐसा आया कि हाथ-पैर चलाना तक मुश्किल हो गया। काफी समय तक बेड पर पड़े रहे। एक दिन बहुत उदास हो गए। एक दिन कहने लगे, अगर मैं इसी तरह बिस्तर पर पड़ा रहा तो आगे क्या होगा? बिटिया की पढ़ाई के सिलसिले में पहले ही बहुत कर्ज हो गया है। मुझे कुछ भी करके फिर से काम शुरू करना पड़ेगा। मैंने उन्हें समझाने की कोशिश की। उनसे कहा- आप दो-दो बार हार्ट अटैक से उबरे हैं। अभी लकवा का शिकार हैं। आपको कुछ हो गया तो हम क्या करेंगे। उन्होंने कहा- मुझे कुछ नहीं होगा। तुम चिंता क्यों करती हो। बेटी पढ़ लिखकर डॉक्टर बन जाएगी तो सारी परेशानी दूर हो जाएगी। कुछ दिनों बाद वे काम पर जाने लगे।
आज अगर पेपर लीक नहीं होता तो वह बेटी जिंदा होती और डाक्टर भी बन जाती। परीक्षा तो दुबारा हो जाएगी, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि जहां यह बेटी वापस नहीं आ पाएगी, वहीं हजारों बच्चे इसी बात से परेशान हैं कि जरूरी नहीं कि उनका पर्चा इस बार बहुत अच्छा हो जाए। वो मानसिक दबाव में तैयारी कर रहे हैं। यही मानसिक दबाव वह बेटी सहन नहीं कर पाई, और आत्महत्या कर ली। अभी तक सरकार की तरफ से उस परिवार को कोई मदद नहीं मिली है, विपक्ष के कुछ लोगों ने ढाई लाख रुपए की आर्थिक मदद की है।
सही बात है, यह एक बेटी की मौत नहीं है, सिस्टम द्वारा की गई हत्या है। पर्चा लीक किसी एक अपराधी ने नहीं किया। पूरे सिस्टम में ही लीकेज है। ऐसा लीकेज, जिसमें ऊपर से लेकर नीचे तक के तमाम लोग शामिल हैं। सबसे गंभीर बात तो यह है कि जो संस्था नीट यूजी की परीक्षा आयोजित कराती है, उसका मुखिया ही घोटाले का आरोपी रह चुका है। लेकिन ऊपर बैठे लोगों की आंखों पर चश्मा चढ़ा हुआ है। उन्हें अपने आसपास सब कुछ अच्छा ही दिखता है, अपने गिरेबान में झांकना वैसे भी उनकी आदत में नहीं है।
नीट पेपर लीक हो या सीबीएसई में हुई गड़बड़, सभी हमारे सड़े और बिके हुए सिस्टम की देन है। एक नहीं, तमाम ऐसी घटनाएं हो चुकी हैं। पहले भी पेपर लीक हो चुके हैं। हम सिस्टम की असल खोट नहीं देखते, ऊपर से लीपापोती करके उसके बेहतर होने का दिखावा करने लगते हैं। असल अपराधियों पर न तो व्यापमं कांड में कार्रवाई हुई और न ही इस नीट यूजी पेपर लीक में उनकी छांव तक आ सकी है।
जांच एजेंसी सीबीआई की बात करें तो उस पर भी अब बहुत भरोसा नहीं रहा। आरोप हैं कि ऊपर से जो निर्देश मिलते हैं, एजेंसियां उसी आधार पर जांच करती हैं। ऐसे में असल अपराधी सामने कैसे आ सकते हैं। बचने वाले अपराधी हों या सिस्टम में बैठे निर्दयी लोगा, किसी की बेटी की मौत से उन पर असर क्यों पडऩे लगा? उनके परिवार में कोई आत्महत्या थोड़े ही कर रहा है।

Exit mobile version