संजय सक्सेना
सुप्रीम कोर्ट ने देश के सभी हाईकोर्ट में फैसलों में देरी पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि किसी भी मामले में फैसला सुरक्षित यानि रिजर्व रखने के बाद उसे 3 महीने के भीतर सुनाया जाना चाहिए। अगर 3 महीने तक फैसला नहीं आता है, तो हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल उस मामले को चीफ जस्टिस के सामने रखेंगे। सीजेआई सूर्यकांत की अगुआई वाली बेंच ने यह भी कहा कि जमानत याचिकाओं पर आदेश उसी दिन सुनाया जाए। अगर फैसला सुरक्षित रखा जाता है, तो उसे अगले दिन जरूर जारी किया जाए और तुरंत वेबसाइट पर अपलोड किया जाए।
कोर्ट ने इस संबंध में 12 निर्देश जारी किए। ये निर्देश झारखंड सरकार से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान दिए गए, जिसमें आरोप था कि हाईकोर्ट ने 2022 से फैसला नहीं सुनाया है। यह मामला अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के 4 दोषियों की याचिका से जुड़ा है। उनका कहना था कि झारखंड हाईकोर्ट में उनकी क्रिमिनल अपील 2022 से पेंडिंग है, लेकिन अब तक फैसला नहीं सुनाया गया।
याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि फैसले में इतनी देरी संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत मिले जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन है। इसमें समय पर सुनवाई और न्याय पाने का अधिकार भी शामिल है। इससे पहले नवंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने सभी हाईकोर्ट से रिपोर्ट मांगी थी। इसमें यह बताने को कहा गया था कि किन मामलों में फैसला कब रिजर्व रखा गया, कब सुनाया गया और आदेश वेबसाइट पर कब अपलोड किया गया।
सुप्रीम कोर्ट ने सभी हाईकोर्ट को जो 12 निर्देश दिए हैं, उन पर नजर डालते हैं-
निजी स्वतंत्रता से जुड़े मामले, जिनमें रेगुलर बेल, अग्रिम जमानत के सामने शामिल हैं, उनमें हाईकोर्ट को तेजी दिखानी चाहिए। जमानत याचिकाओं की सुनवाई कर आदेश उसी दिन सुनाया और अपलोड किया जाना चाहिए। यदि ऑर्डर रिजर्व रखा जाता है, तो उसे अगले दिन सुनाया जाए। जमानत, सजा पर रोक के आदेश की सूचना जेल प्रशासन को तुरंत भेजी जाए, ताकि आरोपी/दोषी को उसी दिन या अगले दिन रिहा किया जा सके, बशर्ते वह किसी दूसरे केस में वॉन्टेड न हो। या जमानत की शर्तों का पालन न रह गया हो।
अगर मामला आपराधिक केस, फांसी की सजा से जुड़ा है, और आरोपी जेल में है तो जज फैसला सुरक्षित रखने के 7 दिन के अंदर दोनों पक्षों से स्पष्टीकरण मांग सकते हैं। बाकी मामलों में फैसला रिजर्व रखने के 1 महीने बाद कोर्ट सफाई या दलीलें नहीं मांग सकता है। हर महीने हाईकोर्ट की वेबसाइट से ऑटोमैटिक ई-मेल चीफ जस्टिस को भेजी जाए, जिसमें फैसला रिजर्व रखे गए मामलों की जानकारी हो। यदि फैसले का ऑपरेटिव भाग सुनाया गया हो, और 15 दिन तक विस्तृत फैसला अपलोड न हो, तो रजिस्ट्रार जनरल चीफ जस्टिस को बताएगा। अगले 2 दिन में मामले से जुड़ी बेंच को बताएगा।
रिजर्व रखने के 3 महीने बाद भी फैसला नहीं सुनाया जाता, तो कोई भी पक्षकार फैसला सुनाने के लिए आवेदन दे सकता है। ऐसे आवेदन पर 2 दिन के अंदर सुनवाई की जाए। यदि फैसला कुल चार महीने तक भी नहीं सुनाया जाता, तो कोई भी पक्षकार चीफ जस्टिस से मामले को दूसरी बेंच को सौंपने की अपील कर सकता है। फैसले की प्रमाणित कॉपी में, फैसला सुरक्षित रखने की तारीख, फैसला सुनाने की तारीख और वेबसाइट पर अपलोड करने की तारीख स्पष्ट रूप से लिखी जाए।
हाईकोर्ट की वेबसाइट पर केस स्टेटस में यह जानकारी दिखाई जानी चाहिए कि फैसला कब सुरक्षित रखा गया, ऑपरेटिव भाग कब सुनाया गया और विस्तृत फैसला कब अपलोड हुआ। फैसला अपलोड होने पर पक्षकारों और वकीलों को ई-मेल से जानकारी दी जाए। सभी हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल इन दिशानिर्देशों को चीफ जस्टिस के समक्ष रखेंगे ताकि नियमों में जरूरी बदलाव कर इन्हें औपचारिक रूप से लागू किया जा सके।
जहां तक लंबित मामलों की बात है तो सुप्रीम कोर्ट में इस समय 92,385 पेंडिंग मामले हैं। और देशभर की अदालतों में कुल 5.49 करोड़ से ज्यादा केस पेंडिंग हैं। इसमें 90,897 मामले सुप्रीम कोर्ट और देश के 25 हाईकोर्ट में 63,63,406 मामले पेंडिंग थे।
लंबित मामलों को लेकर सुप्रीम कोर्ट की चिंता जायज है। लेकिन हमारी समस्या यह है कि हर जगह राजनीतिक हस्तक्षेप बढ़ रहा है। साथ ही कहीं न कहीं नियुक्तियों और पदस्थापनाओं में भी सिफारिशें-पक्षपात होता है। हर सेवा के लोगों को सेवानिवृत्ति के बाद भी सरकारों से अपेक्षाएं रहती हैं। इनमें न्यायिक सेवा भी शामिल हैं। यही कारण है कि या कई बार साक्ष्यों की अनदेखी भी कर दी जाती है और फैसले एकपक्षीय हो जाते हैं। न्यायिक सेवा से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि अधिक दबाव होता है या कोई भय होता है तो फैसला सुरक्षित रख लिया जाता है। कई बार जज गलत फैसला देना नहीं चाहता और उसे देना पड़ जाता है तो वह लिख कर सुरक्षित कर लेता है और अपने स्थानांतरण का इंतजार करता है।
कारण कई हो सकते हैं। देश में न्यायपालिका पर आज विश्वास कम जरूर हुआ है, लेकिन इसके बावजूद भरोसे की एक उजली किरण दिखती है। कम से कम न्याय के उस उजाले की उम्मीद तो बाकी रहनी ही चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय ने जो चिंता व्यक्त की है, वह जायज है और इस भरोसे को कायम रखने में सहायक होगी। लोगों को न्याय का अधिकार सही मायने में मिले, ये न्यायालय की सबसे बड़ी जिम्मेदारी होती है।
संपादकीय…..
सुप्रीम न्यायालय की चिंता
