संपादकीय…
उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो…

संजय सक्सेना
उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो… न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए। और अंतत: उनकी जिंदगी की शाम ढल ही गई। उर्दू शायरी को आम लोगों की जुबान तक पहुंचाने वाले मशहूर शायर बशीर बद्र का गुरुवार दोपहर 12 बजकर 35 मिनट पर भोपाल स्थित घर पर निधन हो गया। 91 वर्षीय बशीर लंबे समय से बीमार थे और वे अपनी याददाश्त भी खो चुके थे।
बशीर बद्र का जन्म 15 फरवरी 1935 को यूपी के अयोध्या में हुआ था. उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से अपनी उच्च शिक्षा और पीएचडी पूरी की और वहां उर्दू के प्रोफेसर के रूप में भी सेवाएं दीं. बद्र साहब को आम बोलचाल की सरल, रूमानी और बेहद प्रभावशाली भाषा में गजलें लिखने के लिए जाना जाता है. उन्होंने गजल विधा में कई नए और ठेठ शब्दों को शामिल किया।
बशीर बद्र की शायरी की सबसे बड़ी खासियत इसकी सरलता और सहजता है. उन्होंने गज़़ल में ऐसे रोजमर्रा के शब्दों का बखूबी इस्तेमाल किया, जिन्हें पारंपरिक उर्दू शायरी में जगह नहीं मिलती थी. उन्होंने कई प्रसिद्ध किताबें लिखीं, जिनमें इमकान, आहटें, कुल्लियात-ए-बशीर बद्र और उजाले अपनी यादों के शामिल हैं।
पद्मश्री और साहित्य अकादमी सम्मान से नवाजे गए बशीर ने करीब 700 गजलें और नज्में लिखीं, वहीं 4 हजार से ज्यादा शेर लिखे थे। 1987 के मेरठ दंगों में बशीर साहब का घर जला दिया गया था। इसमें सालों की जमा-पूंजी, डिग्रियां, किताबें और यादें राख हो गईं। इस गहरे सदमे में उन्होंने लिखा- लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में, तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में। इसके बाद वे भोपाल में आकर बस गए।
बशीर बद्र साहब उन गिने-चुने लोगों में थे, जिन्होंने गजल सिर्फ लिखी नहीं, उन्होंने गजल को ड्रॉइंगरूम से निकालकर आम आदमी की जुबान बना दिया। एक वरिष्ठ कवि ने टिप्पणी की है-मैंने उन्हें हमेशा एक बड़े आदमी और बड़े शायर की तरह देखा। वे जहां खड़े हो जाते थे, मुशायरा वहीं से बड़ा हो जाता था। बशीर बद्र भारतीय गजल के गौतम बुद्ध थे। जैसे भगवान बुद्ध ने कठिन आध्यात्म को पाली और प्राकृत जैसी लोकभाषाओं में उतारकर आम आदमी तक पहुंचाया, वैसे ही बशीर साहब ने बड़ी से बड़ी बात को इतनी सादगी से कहा कि वह सीधे लोगों के दिल में उतर गई।
सही मायने में उनकी शायरी हकीकत के बेहद करीब थी, उसमें कोई दिखावा नहीं था। चमत्कार पैदा करने की कोशिश नहीं थी, लेकिन हर शेर खुद एक चमत्कार बन जाता था। संसद-विधानसभाओं में चले जाइए, अखबारों में देख लीजिए, सडक़ों के नारों में सुन लीजिए- बशीर बद्र मौजूद मिलेंगे।
बशीर बद्र ने भारत के बंटवारे के वक्त भी कई शायरी लिखीं, जो आज तक लोगों के जेहन में हैं। शिमला समझौते के समय तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने पाकिस्तान के जुल्फिकार अली भुट्टो को बशीर बद्र की बंटवारे के वक्त लिखा एक शेर सुनाया था। ये शेर था –
दुश्मनी जमके करो लेकिन ये गुंजाइश रहे
जब कभी हम दोस्त बन जाएं तो शर्मिन्दा ना हों।
बशीर बद्र का एक शेर था- दिल मिले या न मिले, हाथ मिलाते रहिए, भारत-पाक के रिश्तों की भाषा बन गया। जब भी दोनों देशों के राष्ट्र्राध्यक्ष हाथ मिलाते थे, अगले दिन यही शेर अखबारों में छपा होता। और यह शेर तो न जाने कितने मौकों पर कहा गया- उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो… न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए। बताते हैं कि मीना कुमारी जैसी मशहूर अदाकारा ने इसे अपनी डायरी में लिखा था। एक शेर किताबों से निकलकर जिंदगी का हिस्सा बन जाए, इससे बड़ी बात किसी शायर के लिए क्या होगी? बशीर साहब अच्छे शायर होने के साथ बहुत पढ़े-लिखे भी थे। उन्होंने पीएचडी की थी। उनमें एक प्रोफेसराना ठहराव था। बात करते थे तो लगता था जैसे कोई बहुत तहजीब वाला आदमी अपने इल्म को बहुत सलीके से आपके सामने रख रहा है।
बशीर बद्र के आखिरी साल आसान नहीं थे। बीमारी तकलीफदेह थी। जिस समर्पण और प्रेम से परिजनों ने बशीर साहब की सेवा की, वह प्रेम की पराकाष्ठा है। आज के समय में ऐसे उदाहरण बहुत कम मिलते हैं। उनकी याददाश्त चली गई थी और कोई उन्हें देखने जाता तो वे इरशाद, इरशाद कहने लगते।
मुझे लगता है कि किसी शायर की असली मौत तब होती है जब उसके शेर लोगों की जिंदगी से चले जाएं। बशीर बद्र साहब के साथ ऐसा कभी नहीं होगा। अपनी शेर-शायरी में बशीर बद्र हमेशा जिंदा रहेंगे।

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