संपादकीय….
सूखा-बाढ़ की आशंका

संजय सक्सेना
इस बार भी नौतपा में बारिश ने खेल बिगाड़ दिया? कहते हैं कि नौतपा के बीच में यदि पानी गिर जाए तो बारिश कम होती है। यह कहावत सही साबित हो रही है या संयोग है, लेकिन मौसम विभाग भी इस बार सूखे की आशंका बता रहा है। यह बात और है कि मौसम वैज्ञानिकों को आशंका है कि अल नीनो बनने के कारण मौसम खराब होगा और न केवल सूखा, अपितु बाढ़ और अन्य प्राकृतिक आपदाएं भी आ सकती हैं।
पहले भारतीय मौसम विभाग ने आशंका जताई थी, अब विश्व मौसम विज्ञान संगठन ने भी वैश्विक जलवायु को लेकर चेतावनी जारी की है। संयुक्त राष्ट्र की इस मौसम एजेंसी का कहना है कि प्रशांत महासागर में तेजी से गर्म हो रहे समुद्री जल के कारण जून से अगस्त के बीच अल नीनो बनने की आशंका 80 प्रतिशत है।नवंबर माह तक इसके 90 प्रतिशत या उससे ज्यादा बने रहने की आशंका है। अल नीनो आगे चलकर और मजबूत हो सकता है। इससे भारत समेत दुनियाभर में सूखा, बाढ़, समुद्री-स्थलीय हीटवेव और मौसम के खतरनाक रूप देखने को मिल सकते हैं।
मौसम का पूर्वानुमान लगाने वाली निजी एजेंसी स्काईमेट ने मौसम को लेकर भविष्यवाणी की है कि एक पूर्ण अल-नीनो अनुमानित समयसीमा की तुलना में अधिक तेजी से और उम्मीद से पहले विकसित हो सकता है। इससे मानसून के लिए जोखिम और बढ़ सकता है। एजेंसी ने बताया है कि अल-नीनो और तेजी से मजबूत हो सकता है, क्योंकि उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर के सतही और उप-सतही दोनों स्तरों पर तापमान काफी तेजी से बढ़ रहा है। इससे भारत समेत दुनिया के कई हिस्सों में तापमान में असामान्य उतार-चढ़ाव देखने को मिलेगा। भारत में मानसून पर अल-नीनो का प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि महासागर में तापमान बढऩे का मुख्य केंद्र कहां है। अगर यह वृद्धि प्रशांत महासागर के सुदूर पूर्वी हिस्से में होती है, तो दक्षिण-पश्चिम मानसून पर इसका असर कमजोर हो सकता है।
एजेंसी के मुताबिक, मानसून तब अधिक प्रभावित होता है, जब अल-नीनो के कारण तापमान में बढ़ोतरी मध्य प्रशांत महासागर में होती है। इस वर्ष अल-नीनो भारत के साथ इंडोनेशिया और पश्चिम अफ्रीका में मानसून की स्थितियों को प्रभावित करेगा।
इतिहास बताता है जब भी अल-नीनो की स्थिति बनी है, तब दो-तिहाई मामलों में इसने मानसून को प्रभावित किया है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग ने भी मानसून के केरल पहुंचने के अनुमान को आगे बढ़ा दिया है। आईएमडी ने पहले कहा था कि दक्षिण-पश्चिम मानसून 26 मई को केरलम पहुंच सकता है, लेकिन अब इसके चार जून तक पहुंचने का अनुमान लगाया गया है।
आईएमडी के इस साल दीर्घकालिक औसत की सिर्फ 90 फीसदी बारिश होने की उम्मीद जताने के बाद सरकार ने खरीफ सीजन के लिए उर्वरक मांग अनुमान को घटा दिया है। कृषि एवं किसान कल्याण विभाग ने प्रमुख उर्वरकों की कुल आवश्यकता को पहले के 390.5 लाख टन से घटाकर 383.9 लाख टन कर दिया है। इसमें यूरिया की मांग को लगभग 4,00,000 टन घटाकर 190 लाख टन कर दिया है, जबकि डीएपी की मांग को 59.1 लाख टन से घटाकर 56.2 लाख टन कर दिया है। मांग अनुमान में इस कटौती के बावजूद सरकार ने कहा, खरीफ सीजन को देखते हुए देश में उर्वरकों की पर्याप्त आपूर्ति मौजूद है।
केंद्रीय कृषि मंत्रालय ने अधिकारियों से कहा है कि वे समय पर कृषि परामर्श जारी करें और अल-नीनो के संभावित प्रभाव से खरीफ फसलों को बचाने के लिए राज्यों के साथ बेहतर समन्वय बनाए रखें। चेतावनी हो लेकर सरकार सतर्क है। भारत की सालाना वर्षा में 70-75 फीसदी का योगदान देने वाला दक्षिण-पश्चिम मानसून धान जैसी खरीफ फसलों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। शुद्ध बुआई किए गए क्षेत्र के 51 फीसदी हिस्से पर सिंचाई नहीं होती और वह वर्षा पर निर्भर है।
मौसम की बात करें तो कुछ समय से मौसम को लेकर जो पूर्वानुमान लगाए जा रहे हैं, वो लगभग सही साबित हो रहे हैं। दूसरी ओर हमारी पृथ्वी जलवायु परिवर्तन के दौर से गुजर रही है। कहीं तापमान एकदम बढ़ जाता है तो कभी एकदम कम हो जाता है। अचानक गर्मी और सर्दी बढऩे के साथ ही कभी भी बारिश हो जाती है।
पृथ्वी पर जंगलों और आबादी का संतुलन लगातार बिगड़ रहा है। भूगर्भीय परिवर्तन भी तेज हो रहे हैं। कुछ भूगर्भीय परिवर्तन स्वाभाविक हैं तो कुछ इंसान के कारण भी तेज हो गए हैं। जमीन के बहुत अंदर तक जिस तरह से विस्फोट करके परियोजनाओं को क्रियान्वित किया जा रहा है, वह सबसे खतरनाक है। नदियों की धार तक बदल रही है। कई नदियां बारिश आने के पहले ही सूखने लगी हैं। हिमालय से लेकर महासागरों में भी हलचल तेज हो रही है।
कुल मिलाकर जलवायु परिवर्तन और मौसम का कहर और तेज होने की आशंका बलवती हो रही है। इन सभी के चलते जीवन और कठिन हो रहा है। जो लोग शारीरिक रूप से कमजोर हैं, उन्हें अधिक भुगतना पड़ जाता है। कोविड के बाद अधिकांश लोगों की शारीरिक क्षमताएं कम हो गई हैं। जिस तरह से मौसम में बदलाव आ रहा है, उससे क्षमताएं बढऩे की संभावनाएं कम ही हैं। जीवन दवाओं पर अधिक निर्भर हो रहा है।
कहीं न कहीं पूरी दुनिया को इन चुनौतियों का सामना करना है, लेकिन ऐसा लग रहा है कि इस मुद्दे पर गंभीरता नहीं है। अमेरिका, इजरायल जैसे देश अपनी सनक के चलते दुनिया भर में अस्थिरता बढ़ा रहे हैं। युद्ध में प्रयोग किए जाने वाले हथियार भी हमारे पर्यावरण के लिए काफी खतरनाक हैं। लेकिन कोई सुनने समझने तैयार नहीं। कुल मिलाकर मौसम परिवर्तन की चुनौतियों का हमें खुद ही सामना करना है, अपनी शारीरिक क्षमताओं को बढ़ाएं, अपने पर्यावरण को हर व्यक्ति बेहतर रखने के प्रयास करे। हर दूसरा व्यक्ति सोचेगा, करेगा, तो कुछ बेहतर हो सकता है।

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