संपादकीय….
नए डेटा सेंटर के गंभीर जोखिम..

संजय सक्सेना
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्लाउड कंप्यूटिंग और डिजिटल अर्थव्यवस्था के विस्तार के साथ दुनिया भर में बड़े-बड़े डेटा सेंटर बनाए जा रहे हैं। भारत भी इस दौड़ में पीछे नहीं है। सरकार और निजी कंपनियां अरबों डॉलर का निवेश आकर्षित कर रही हैं ताकि देश को एआई और डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर का वैश्विक केंद्र बनाया जा सके। इसी बीच एक रिपोर्ट ने चेतावनी दी है कि नए डेटा सेंटर भविष्य में जलवायु परिवर्तन से जुड़े गंभीर जोखिम का कारण बन सकते हैं
डेटा सेंटर ऐसे विशाल भवन होते हैं जहां लाखों सर्वर, कंप्यूटर और नेटवर्क उपकरण लगातार चलते रहते हैं। एआई मॉडल, क्लाउड सेवाएं, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, बैंकिंग सिस्टम और सरकारी डिजिटल सेवाएं इन्हीं पर निर्भर होती हैं। चैटजीपीटी, जैमिनी जैसे एआई मॉडल, गूगल सर्च, नेटफ्लिक्स, अमेजन वेब सर्विसेज और माइक्रोसॉफ्ट एज्योर जैसी सेवाओं को चलाने के लिए अत्यधिक कंप्यूटिंग क्षमता की जरूरत होती है, जिसके कारण दुनिया भर में नए डेटा सेंटर तेजी से बनाए जा रहे हैं।
जहां तक भारत की बात है तो यहां डेटा सेंटर उद्योग लगातार विस्तार कर रहा है। इलेक्ट्रॉनिक्स और आईटी मंत्रालय के अनुसार, देश की कुल डेटा सेंटर क्षमता 2020 में लगभग 375 मेगावाट थी, जो 2025 तक बढक़र करीब 1,500 मेगावाट हो गई है।
एआई विकास को समर्थन देने के लिए एआई कंप्यूट क्षमता ढांचे के तहत 14 सूचीबद्ध सेवा प्रदाताओं और डेटा सेंटरों के माध्यम से 38,231 जीपीयू उपलब्ध कराए गए हैं। इन्हें स्टार्टअप, शोधकर्ताओं, शैक्षणिक संस्थानों और अन्य पात्र उपयोगकर्ताओं को औसतन 65 रुपये प्रति घंटे की सब्सिडी दर पर उपलब्ध कराया जा रहा है। यह दर वैश्विक औसत लागत की लगभग एक-तिहाई है। ये डेटा सेंटर मुंबई, नवी मुंबई, हैदराबाद, बंगलूरू, नोएडा और जामनगर सहित देश के विभिन्न हिस्सों में स्थित हैं।
सरकार का कहना है कि वह डेटा सेंटर इकोसिस्टम की जरूरतों, विशेष रूप से बिजली और पानी की मांग, को लेकर सजग है। एआई और बड़े डेटा सेंटरों के विस्तार से बढऩे वाली बिजली मांग को सरकारी योजना प्रक्रिया में शामिल किया गया है। ऊर्जा मंत्रालय के अनुसार, 2031-32 तक डेटा सेंटरों से बिजली की मांग 13.56 गीगावाट तक पहुंचने का अनुमान है।
इस बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए राष्ट्रीय बिजली ट्रांसमिशन अवसंरचना का लगातार विस्तार किया जा रहा है, ताकि विभिन्न क्षेत्रों में विश्वसनीय बिजली आपूर्ति सुनिश्चित की जा सके।
हाल ही में संसद ने सस्टेनेबल हार्नेसिंग एंड एडवांसमेंट ऑफ न्यूक्लियर एनर्जी फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया  अधिनियम पारित किया है। सरकार के अनुसार यह कानून छोटे मॉड्यूलर और माइक्रो न्यूक्लियर रिएक्टरों के भविष्य के विकास को समर्थन देगा, जिससे एआई और डेटा सेंटर जैसे उभरते क्षेत्रों के लिए विश्वसनीय ऊर्जा समाधान उपलब्ध कराए जा सकेंगे।
आईएमएआरसी की रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय डेटा सेंटर बाजार का आकार  2025 में लगभग 5.55 अरब डॉलर आंका गया था, जो 2034 तक बढक़र 13.11 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है। 2026 से 2034 के बीच इस क्षेत्र में औसतन 10.01 प्रतिशत की वार्षिक चक्रवृद्धि वृद्धि दर (ष्ट्रत्रक्र) रहने का अनुमान है।
क्रॉस डिपेंडेंसी इनिशिएटिव की रिपोर्ट के अनुसार, भारत दुनिया के उन देशों में शामिल है जहां भविष्य के डेटा सेंटर जलवायु जोखिमों के प्रति सबसे ज्यादा संवेदनशील हैं। अध्ययन में भारत के 41 प्रस्तावित डेटा सेंटरों का विश्लेषण किया गया, जिनमें से पांच को पहले से ही उच्च जोखिम श्रेणी में रखा गया है। रिपोर्ट के अनुसार 2026 से 2100 के बीच भारत में डेटा सेंटरों को होने वाले औसत जलवायु नुकसान का जोखिम 269 प्रतिशत तक बढ़ सकता है। रिपोर्ट के अनुसार, 2026 में जलवायु परिवर्तन से जुड़ी चरम मौसमीय घटनाओं के कारण डेटा सेंटरों को होने वाले संभावित नुकसान के जोखिम के मामले में भारत दुनिया के 11वें स्थान पर है।
सबसे बड़ी चिंता यह है कि तमिलनाडु, तेलंगाना और कर्नाटक जैसे राज्य, जो भारत के प्रमुख टेक्नोलॉजी और डेटा सेंटर हब बन रहे हैं, दुनिया के उन क्षेत्रों में शामिल हैं जहां अत्यधिक गर्मी के कारण परिचालन बाधित होने का खतरा सबसे ज्यादा है।
असल में डेटा सेंटरों के लिए सबसे बड़ा खतरा अक्सर अत्यधिक गर्मी होती है। डेटा सेंटरों के भीतर हजारों सर्वर लगातार काम करते हैं और भारी मात्रा में गर्मी पैदा करते हैं। इन्हें ठंडा रखने के लिए बड़े कूलिंग सिस्टम लगाए जाते हैं। यदि बाहरी तापमान बहुत अधिक हो जाए तो सर्वर की कार्यक्षमता घट सकती है। कूलिंग सिस्टम पर दबाव बढ़ सकता है। बिजली की खपत तो बढ़ ही जाती है और सर्विस बाधित होने या सिस्टम फेल होने का खतरा बढ़ जाता है।
रिपोर्ट के अनुसार भारत, ब्राजील, मैक्सिको, इंडोनेशिया और स्पेन जैसे देशों में 75 प्रतिशत से अधिक प्रस्तावित डेटा सेंटर अत्यधिक गर्मी से जुड़े उच्च परिचालन जोखिम का सामना कर सकते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर किसी हीटवेव, बाढ़ या चक्रवात के दौरान इनमें से कोई व्यवस्था प्रभावित होती है, तो डेटा सेंटर भी काम करना बंद कर सकते हैं। विश्लेषण में पाया गया कि जब इन अप्रत्यक्ष जोखिमों को भी शामिल किया गया तो परिचालन व्यवधान का खतरा लगभग 10 गुना तक बढ़ गया।
जलवायु जोखिम के साथ-साथ एआई डेटा सेंटरों की बढ़ती ऊर्जा और पानी की मांग भी चिंता का विषय बन रही है। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार 2030 तक एआई डेटा सेंटरों की बिजली खपत 945 टेरावाट-घंटे तक पहुंच सकती है। यह पाकिस्तान, बांग्लादेश और नाइजीरिया की कुल वार्षिक बिजली खपत से लगभग तीन गुना अधिक है। डेटा सेंटरों में लगे कूलिंग सिस्टम को बड़ी मात्रा में पानी की आवश्यकता होती है। रिपोर्ट के अनुसार 2030 तक डेटा सेंटरों की बिजली खपत से जुड़ा जल पदचिह्न 9.3 ट्रिलियन लीटर तक पहुंच सकता है। यह मात्रा इतनी है कि इससे उप-सहारा अफ्रीका के 1.3 अरब लोगों की एक वर्ष की न्यूनतम घरेलू जल आवश्यकता पूरी की जा सकती है।
ये रिपोर्ट वास्तव में चिंताजनक है और केवल चिंता करने से कुछ नहीं होगा, यह भी तय है। पूरी दुनिया के साथ ही भारत भी जलवायु परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है और इसके दुष्परिणाम भी सामने आने लगे हैं। ऐसे में डाटा सेंटर से होने वाले दुष्परिणाम और पर्यावरण परिवर्तन से लडऩे के लिए भी ठोस कार्ययोजना बनानी होगी। वैकल्पिक व्यवस्था यदि हो सकती है, तो बेहतर होगा। पर्यावरण संतुलन बनाने के लिए सरकार अकेले कुछ नहीं कर सकती और न ही कर पा रही है। ऐसे में सभी को मिलकर अभियान के रूप में जंग लडऩी होगी। यही एकमात्र उपाय बचा है।

Sanjay Saxena

BSc. बायोलॉजी और समाजशास्त्र से एमए, 1985 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय , मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के दैनिक अखबारों में रिपोर्टर और संपादक के रूप में कार्य कर रहे हैं। आरटीआई, पर्यावरण, आर्थिक सामाजिक, स्वास्थ्य, योग, जैसे विषयों पर लेखन। राजनीतिक समाचार और राजनीतिक विश्लेषण , समीक्षा, चुनाव विश्लेषण, पॉलिटिकल कंसल्टेंसी में विशेषज्ञता। समाज सेवा में रुचि। लोकहित की महत्वपूर्ण जानकारी जुटाना और उस जानकारी को समाचार के रूप प्रस्तुत करना। वर्तमान में डिजिटल और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े। राजनीतिक सूचनाओं में रुचि और संदर्भ रखने के सतत प्रयास।

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