Bhopal : खामोशी में दर्ज इतिहास: खिरनी वाला मैदान से इकबाल मैदान तक

अलीम बजमी.
पुराने भोपाल की रूह में अगर कहीं इतिहास धड़कता है, तो एक नाम खिरनी वाला मैदान है। यह कई मायनों में ऐतिहासिक है। इस धरोहर ने भोपाल रियासतकाल का जलवा-जलाल देखा है। रियासतकाल के बड़े जलसों का प्रत्यशदर्शी भी रहा है। यहां की हवा ने शायरी और देश के ख्यातिलब्ध राजनेताओं की तकरीरें भी सुनी है। खामोशी ने वक्त को ठहरते देखा है। यही मैदान आज इकबाल मैदान कहलाता है। राजशाही से लोकशाही तक का गवाह है। बीते कल की परछाइयों और आज के सन्नाटे के बीच खड़ा एक जीवित इतिहास भी है।
चार दरवाज़ों वाला मैदान
राजधानी में नवाबी दौर की कई यादें आज भी खड़ी हैं। उन्हीं में एक है खिरनी वाला मैदान। कभी इसके चार विशाल दरवाज़े थे। अब सिर्फ दो बचे हैं। वक्त ने दो को निगल लिया। लेकिन किस्से अब भी जिंदा हैं। यह मैदान शहर के कोने-कोने में सुनी जाने वाली कहानियों का केंद्र रहा है। इस मैदान के चारों ओर इतिहास पसरा है। शौकत महल सामने खड़ा है। सदर मंज़िल कुछ ही फासले पर है। उत्तर और पश्चिम दिशा में जीनत महल और शीश महल हैं। हर इमारत कई फसानों और अफसानों को समेटे है। हर दीवार अपनी कहानी खुद सुनाती है। दरअसल इस मैदान को अधिकांश लोग स्थित महलों का बाहरी आंगन कहते हैं।
दरअसल महलों की हिफाज़त के लिए मैदान के चारों ओर चार दरवाज़े बनाए गए थे। इन्हें नवाबी बेगमों के नाम मिले। सीढ़ी घाट की ओर बाब-ए-सिकंदरी था। मस्जिद की तरफ बाब-ए-क़ुदसी। शीश महल के पास बाब-ए-शाहजहांनी। शौकत महल के निकट बाब-ए-सुलतानी। सदर मंज़िल से आगे बाब-ए-अहमदी भी था, जो अभी है। 1974-75 की मूसलाधार बारिश में दो दरवाज़े जर्जर हो गए। उन्हें गिरा दिया गया। इतिहास थोड़ा और सिमट गया।
पत्थरों में विदेशी रंग
आर्किटेक्चर के शौकीन सैलानी यहां रोज दिख जाते हैं। वजह साफ है। इन महलों में फ्रेंच शैली है। इंडो-इस्लामिक छाप है। पर्शियन आर्किटेक्चर की नज़ाकत है। यह इमारतें मैदान की अहमियत को और बढ़ा देती हैं।
जन दरबार और खिरनी के पेड़
खिरनी वाला मैदान की कहानी नवाब कुदसिया बेगम के कालखंड से जुड़ी है। 1819 से 1837 के बीच वे यहीं जन दरबार लगाती थीं। नागरिक अपनी फरियाद लेकर आते थे। बेगम खुद सुनती थीं। समाधान यहीं होता था। उस वक्त यहां खिरनी के कई पेड़ थे। एक बगीचा था। आज सिर्फ एक पेड़ हैरिटेज ट्री की शक्ल में बचा है। यह मैदान के बीच में स्थित है। इस इतिहास का गवाह भी है।
176 साल पहले इसे संवारा गया
मैदान को आकर्षक स्वरूप नवाब सिकंदर जहां के दौर में मिला था। 1844 से 1868 के बीच इसके बगीचे को संवारा गया। बुजुर्ग बताते हैं कि 1722-23 में दोस्त मोहम्मद खां ने फतेहगढ़ किले के निर्माण के समय यहां बड़े पैमाने पर पौधरोपण कराया था। मैदान के सामने शौकत महल में नवाब सिकंदर जहां बेगम और बाद में नवाब सुल्तान जहां बेगम रहा करती थीं।
खिरनी से इकबाल मैदान
इस मैदान को इकबाल मैदान कहने की शुरुआत 1984 में हुई। यह विचार तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह का था। वजह अल्लामा इकबाल का भोपाल आना रहा। 1931 से 1936 के बीच उन्होंने यहां शायरी की। बीडीए को इकबाल मैदान के निर्माण की जिम्मेदारी मिली। 14 जून 1986 को लोकार्पण हुआ। तत्कालीन मुख्यमंत्री मोतीलाल वोरा ने उद्घाटन किया। कहा जाता है कि इकबाल ने अपनी 14 मशहूर नज़्में यहीं लिखीं। बीडीए के बाद एमपीटी ने इसे संवारने का काम किया था।
जलसे, जुलूस और शायरी
यह मैदान हमेशा शहर की धड़कन रहा। यहां कई अवसरों पर रंगारंग सांस्कृतिक आयोजन हुए। सामाजिक गतिविधियां रहीं। राजनीतिक जलसे और जुलूस निकले। देश के बड़े शायरों और कवियों ने यहां कलाम पढ़ा। फिल्मों और धारावाहिकों की शूटिंग भी हुई।
दफ्तर से मैदान तक
1907 में यहां मैदान के करीब सदर मंजिल में मजलिस-ए-इंतजामिया का दफ्तर कायम था। बाद में इसे म्युनिस्पिलिटी कहा गया। 2013-14 में नगर निगम का मुख्यालय यहां से शिफ्ट हो गया। मैदान के बेसमेंट में बनी इकबाल लाइब्रेरी आज भी साहित्य से जुड़ी आवाज़ों को संभाले हुए है।
सन्नाटे में जीता मैदान
कोरोना काल के बाद प्रशासन ने मैदान में आयोजनों पर रोक लगा दी। अब यहां सन्नाटा है। दिन में बच्चे खेलते हैं। शाम को बुजुर्ग कुछ पल ठहरते हैं। बाकी वक्त फिजा में खामोशी तैरती है। इकबाल मैदान आज भी वहीं है। अतीत को सीने से लगाए। वर्तमान को चुपचाप देखते हुए।

फेसबुक वाल से साभार

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Sanjay Saxena

BSc. बायोलॉजी और समाजशास्त्र से एमए, 1985 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय , मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के दैनिक अखबारों में रिपोर्टर और संपादक के रूप में कार्य कर रहे हैं। आरटीआई, पर्यावरण, आर्थिक सामाजिक, स्वास्थ्य, योग, जैसे विषयों पर लेखन। राजनीतिक समाचार और राजनीतिक विश्लेषण , समीक्षा, चुनाव विश्लेषण, पॉलिटिकल कंसल्टेंसी में विशेषज्ञता। समाज सेवा में रुचि। लोकहित की महत्वपूर्ण जानकारी जुटाना और उस जानकारी को समाचार के रूप प्रस्तुत करना। वर्तमान में डिजिटल और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े। राजनीतिक सूचनाओं में रुचि और संदर्भ रखने के सतत प्रयास।

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