संपादकीय….
हमारे शहरों में सड़कें चलने के लिए नहीं…?

संजय सक्सेना
भारत में शहरीकरण तो बहुत तेजी से हो रहा है और हम इसे अपने विकास का पैमाना भी मानते हैं, लेकिन क्या शहरों को सही तरीके से बसाया जा रहा है? क्या हम शहरीकरण के सभी मापदंड पूरे करने का प्रयास भी कर रहे हैं? शायद क्या, कतई नहीं। जितने बेतरतीब शहर हमारे देश में बस रहे हैं या बसाए जा रहे हैं, उतने तो किसी अविकसित देश में भी नहीं बस रहे होंगे।
शहरीकरण में बसाहट के पहले जो सावधानियां बरतनी चाहिए, हमारा ध्यान उन पर नहीं होता। गांवों से कस्बे और कस्बों से शहर कब विकसित हो जाते हैं, पता ही नहीं चलता। तब पता चलता है, जब बड़े वाहनों को गलियों में ही पार्क किया जाता है, वहां पैदल चलने तक की जगह नहीं बचती। सडक़ें बनाई तो जाती हैं, लेकिन आधी से अधिक सडक़ें पार्किंग बन जाती हैं। शहरों के कई हिस्से हो जाते हैं, कुछ हिस्से तो गांवों से भी बदतर रहते हैं, लेकिन हम उन्हें विकसित शहरों में ही शुमार करते हैं।
शहरी नियोजन के नाम पर करोड़ों रुपए खर्च किए जाते हैं। योजनाएं बनाने में ही अरबों रुपए खर्च होते हैं, लेकिन जब उन पर अमल होता है तो योजनाओं का मूल स्वरूप की खत्म हो जाता है। अभी हम सडक़ों की बात कर रहे हैं, जिसे लेकर एकाध शहर छोड़ कर कहीं भी कोई गंभीर नहीं है। शासन-प्रशासन से लेकर नागरिक तक, सभी एकदम बेपरवाह और उदासीन। और केवल अपने स्वार्थ तक सीमित।
दुनिया के तमाम देशों में सडक़ पर गाड़ी खड़ी रखने के सख्त नियम हैं। ब्रिटेन में जब गाड़ी अपने घर के बाहर सडक़ पर पार्क करते हैं, तो उन्हें 3, 6 या 12 महीनों का पार्किंग परमिट खरीदना पड़ता है। इसकी कीमत गाड़ी के प्रकार के अनुसार होती है। ज्यादा प्रदूषण वाले वाहनों का परमिट महंगा है। वहां पर एक गाड़ी का सालाना पार्किंग परमिट 90-300 पाउंड तक होता है।
कहने को तो दिल्ली में भी इस तरह के परमिट हैं। लेकिन मोटरगाड़ी नहीं, सडक़ पर रेहड़ीवालों के लिए। हौज खास में 4&6 फीट (छोटी गाड़ी भी अंदाजन इतनी ही जगह घेरती है) की रेहड़ी का सालाना परमिट 4254 रुपए है। यदि दिल्ली की 20 लाख गाडिय़ों में से आधी सार्वजनिक सडक़ पर हों और उन पर यही नियम-दर लागू हो, तो लगभग 400 करोड़ रुपए राजस्व प्राप्त होगा।
2024-25 में दिल्ली में महिलाओं के लिए फ्री बस योजना के लिए 340 करोड़ का बजट था। उस पर रेवड़ी के नाम पर खूब चर्चा होती है, लेकिन सालाना गाडिय़ों से हो रहे 400 करोड़ के नुकसान की कोई गिनती नहीं की जाती है। राजधानी की सडक़ों को देखकर कोई सोच सकता है कि पार्किंग नीति में सडक़ पर 11 कैटेगरी में से पहला अधिकार पैदल, साइकल और दिव्यांगजन का है, फिर रेहड़ी वालों का और उसके बाद में निजी गाडिय़ों के लिए पिकअप/ड्रॉप, ईवी और पेड पार्किंग है। लेकिन असल में इसका उलटा हो रहा होता है और यह बात दूसरे शहरों के लिए भी इतनी ही सही है। कॉर्पोरेशन अतिक्रमण के खिलाफ नियमित रूप से एक्शन लेती रहती है, लेकिन सार्वजनिक मार्ग पर निजी गाडिय़ों की बात कोई नहीं करता।
मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल की बात करें तो पहले यह शहर दो हिस्सों में बंटा हुआ देखा जाता था। पहला पुराना शहर और दूसरा नया शहर। पुराना शहर यानि जहां सडक़ें भी गलियों में बदल चुकी हैं। गाडिय़ां और ठेले सडक़ों पर खड़े रहते हैं, चलने के लिए जगह मिले या न मिले, किसी को परवाह नहीं। और नए शहर को कुछ व्यवस्थित माना जाता था। लेकिन जब शहर का आकार बढ़ता चला गया, तो यह कई हिस्सों में बंट गया और सभी एक जैसे हो गए। नया शहर भी पुराने की तरह अव्यवस्थित हो गया है।
हालात ये हैं कि जैसे एक कोलार रोड सिक्स लेन बनाया गया है, वह भी चलने वालों के लिए फोर लेन भी नहीं मिलता। आधी सडक़ों पर गाडिय़ां पार्क होती हैं, बाकी चलने के लिए छोड़ दिया गया है। शहरी नियोजन की बात करें तो सरकारें इतनी गंभीर हैं कि बीस साल से मास्टर प्लान का ही पता नहीं है। पिछले दो-तीन सालों से मास्टर प्लान बनता है और आपत्तियों के चलते रुक जाता है। कहीं राजनीति, तो कहीं प्रशासनिक अधिकारियों का हस्तक्षेप हो जाता है।
केवल भोपाल ही नहीं, ये तो उदाहरण है अव्यवस्थित नियोजन का। हमारी सबसे बड़ी समस्या है हम अपने अधिकार तो खूब समझ लेते हैं, लेकिन नागरिक होने का कर्तव्य निभाने में सबसे पीछे हैं। यदि हमारे पास गाड़ी है तो हम यह मानते हैं कि कहीं भी खड़ी करना हमारा अधिकार है, चाहे सडक़ बंद हो जाए। राजनीति ने भी शहरों की शक्लें बिगाडऩे में बहुत बड़ी भूमिका निभाई है। झुग्गियों के शहर इसी राजनीति की देन है और अब तो बाजारों से लेकर सडक़ों तक पर जो ठेले यानि रेहडिय़ां लगती हैं, वो भी राजनीति के सहारे हैं। बाकायदा चंदा लिया जाता है और उन्हें सडक़ों पर खड़े
होने का अधिकार दे दिया जाता है। अवैध वसूली शहरों की खास पहचान बन जाती है, जो शहरों में अराजकता फैलाने का काम करती है। यह वसूली प्रशासनिक भी होती है और राजनीतिक भी।
हेलमेट का चालान बनाने वाली पुलिस भी सडक़ों पर खड़े ठेलों को नजरअंदाज कर निकल जाती है। या फिर उनसे वो भी वसूली कर लेती है। आटो-टैक्सी वालों के स्टैंड तो सडक़ पर ही होते हैं, जिनके कारण पैदल लोग सडक़ पार करने तक के लिए परेशान होते हैं। इसे हम अतिक्रमण के रूप में नहीं पहचानते। हम यह भूल जाते हैं कि सडक़ें आखिरकार सार्वजनिक संपत्ति है। जो लाखों की गाड़ी खरीद सकते हैं, हजारों का पेट्रोल जला सकते हैं, उनके लिए पार्किंग की व्यवस्था क्यों नहीं हो? क्यों न उनसे सडक़ पर वाहन खड़े करने का अतिरिक्त शुल्क लिया जाए? क्यों बहुमंजिला इमारतों में पार्किंग की अनिवार्यता नहीं की जाती है। क्यों भवन अनुज्ञा के नियम शहरों में ईमानदारी से लागू नहीं होते? इसके बदले क्यों निकायों से लेकर पुलिस तक वसूली करके छोड़ दिया करती है?
सवाल बहुत हैं, जवाब एक है, हर जगह भ्रष्टाचार है, अराजकता है। राजनीति हावी है या फिर प्रशासनिक उदासीनता। और सबसे ज्यादा इसके लिए जिम्मेदार हम नागरिक ही हैं।

Sanjay Saxena

BSc. बायोलॉजी और समाजशास्त्र से एमए, 1985 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय , मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के दैनिक अखबारों में रिपोर्टर और संपादक के रूप में कार्य कर रहे हैं। आरटीआई, पर्यावरण, आर्थिक सामाजिक, स्वास्थ्य, योग, जैसे विषयों पर लेखन। राजनीतिक समाचार और राजनीतिक विश्लेषण , समीक्षा, चुनाव विश्लेषण, पॉलिटिकल कंसल्टेंसी में विशेषज्ञता। समाज सेवा में रुचि। लोकहित की महत्वपूर्ण जानकारी जुटाना और उस जानकारी को समाचार के रूप प्रस्तुत करना। वर्तमान में डिजिटल और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े। राजनीतिक सूचनाओं में रुचि और संदर्भ रखने के सतत प्रयास।

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