संपादकीय
भ्रष्टाचार का मकडज़ाल.. मंगलसूत्र गिरवी रख कर दे रहे रिश्वत…!

संजय सक्सेना
मध्यप्रदेश में पिछले दस से अधिक वर्षों से लगातार भ्रष्टाचार में जीरो टालरेंस की बात कही जा रही है, लेकिन भ्रष्टाचार का मकडज़ाल ऐसा है कि कम होने के बजाय बढ़ता ही दिख रहा है। हाल ही में तो एक ऐसा मामला भी आया कि जिसमें भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने वाली एजेंसी में ही रिश्वतखोरी उजागर हुई। भले ही उस मामले में कार्रवाई भी हुई, लेकिन यह तो साफ हो गया कि भ्रष्टाचार हर जगह है।
आज भ्रष्टाचार को लेकर खबर है मध्यप्रदेश के अशोकनगर जिले की। वहां महिला एवं बाल विकास विभाग में नीचे से लेकर ऊपर तक भ्रष्टाचार की चौंकाने वाली तस्वीर सामने आई है। चौंकाने वाली इसलिए, क्योंकि जिन आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को इतना पैसा नहीं मिलता कि वो पूरे परिवार का तो छोड़ो अकेले अपना खर्चा भी नहीं उठा सकतीं, उनसे भी रिश्वत ली जा रही थी।
मुंगावली और ईसागढ़ परियोजना के तहत आने वाले सेक्टरों में गरीब आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं, मिनी कार्यकर्ताओं और स्व-सहायता समूह की महिलाओं से पदोन्नति, मानदेय और बिल पास कराने के एवज में हजारों रुपए की अवैध वसूली की जा रही है। पीडि़त महिलाओं ने उसकी बाकायदा नोटरी करे हुए शपथ पत्र और ऑनलाइन बैंक ट्रांजेक्शन की रसीदों के माध्यम से कलेक्टर, डीपीओ व एसडीएम से शिकायत कर सुपरवाइजरों पर कार्रवाई की मांग की है।
पिपरई सेक्टर के ग्राम चिरवांस की आंगनबाड़ी कार्यकर्ता के शपथ-पत्र के अनुसार सुपरवाइजर रचना राठौर द्वारा हर महीने होने वाली बैठक में एमपीआर के नाम पर प्रत्येक कार्यकर्ता से जबरन 200 रुपए वसूले जाते हैं। कहा गया कि तुम कम पढ़ी-लिखी हो, बिना पैसे काम नहीं होगा। पीडि़ता के पति ने 10 हजार नगद और 3 हजार रुपए फोन पे से सुपरवाइजर को ट्रांसफर किए। खाते में आने वाली 4 हजार रुपए की सरकारी राशि में से भी 500 रुपए का कमीशन वसूलने का आरोप है।
ईसागढ़ के ग्राम सरजापुर की राजकुमारी आदिवासी ने शपथ पत्र में लिखा कि मिनी से फुल आंगनबाड़ी कार्यकर्ता के पद पर प्रमोशन हुआ था। सुपरवाइजर चंचल अहिरवार ने पदभार ग्रहण कराने और मानदेय जारी करने के बदले 15 हजार रुपए की रिश्वत मांगी। मैंने अपनी चांदी की पायल और मंगलसूत्र गिरवी रखकर 15 हजार रुपए सुपरवाइजर को दिए। मां बंजारी स्व सहायता समूह गहोरा की अध्यक्ष रजनी विश्वकर्मा ने एसडीएम को दी शिकायत में बताया कि वे 4 आंगनबाडिय़ों में भोजन-नाश्ता बांट रही थीं। समूह के भोजन वितरण का बिल पास कराने के एवज में सुपरवाइजर रजनी बालू द्वारा रुपयों की मांग की गई। तो रजनी के पति के खाते में 5 हजार रुपए ट्रांसफर किए।
भले ही इन शिकायतों को आरोपी पक्ष द्वारा गलत बताया जा रहा है, लेकिन असलियत यही है कि इस तरह की रिश्वत सामान्य बात हो गई है। मनरेगा तक में मजदूरों से रिश्वत लिए जाने के मामले सामने आते रहते हैं। महिला बाल विकास सहित कुछ विभाग तो भ्रष्टाचार के लिए बदनाम ही हैं। हर कदम पर रिश्वत की बात कही जाती है। टेंडर भी मैनेज किए जाते हैं, ऐसा दावा किया जाता है।
सवाल यहां ये भी उठता है कि जब हमारे प्रदेश में भ्रष्टाचार रोकने वाली एजेंसी में ही भ्रष्टाचार उजागर हो चुका है, और ये पहली बार नहीं है। जब ऐसा हुआ है। चर्चा तो यहां तक है कि लोकायुक्त पुलिस में ही बड़े पदों पर नियुक्ति की बोली लगती है। प्रदेश के एक बड़े संभाग में पदस्थ अधिकारी ने तो ये राशि सवा करोड़ तक पहुंचने की बात कही थी। हालांकि इसके कोई प्रमाण नहीं हैं, लेकिन कहा जाता है न कि तिल का ताड़ बनाया जाता है, लेकिन इसके लिए तिल होना जरूरी है। यानि रिश्वत कितनी ली जाती है, इसकी जानकारी भले ही पूरी सही न हो, लेकिन ली तो जाती होगी।
अभी तबादलों का सीजन चल रहा है। इसमें भले ही तमाम विभागों में आनलाइन आवेदन का प्रावधान है, लेकिन राजधानी के तमाम होटलों से लेकर चाय-पान की दुकानों तक पर एजेंट तैनात हैं। उनकी जगह फिक्स हैं, और वो सीधे ही तबादला कराने का दावा करते हैं। हर विभाग की हर पोस्ट के लिए दरें फिक्स हैं। और जिले के आधार पर भी रेट तय होते हैं। कई पोस्ट तो ऐसी हैं, जिनकी पदस्थापना दर अधिक है, उसके लिए बाकायदा किश्तें तय कर दी जाती हैं। कुछ एडवांस, बाकी आदेश जारी होते ही। यह भी कहा जाता है कि आदेश बनने और जारी होने के बीच में आपको तय राशि देनी है, नहीं तो आदेश रुकवा भी सकते हैं।
ये तो नहीं कहा जा सकता कि रिश्वत या भ्रष्टाचार की ये सीढ़ी कहां तक पहुंचती है, लेकिन कहीं न कहीं उच्च स्तर पर कुछ तो सूत्र हैं, जहां से इसकी शुरुआत होती है। एजेंटों का कमीशन भी तय होता है। जैसे पूर्व में रिवाल्वर के लायसेंस की रिश्वत की दर पांच से छह लाख रुपए तक पहुंच गई थी। और बात बाकायदा मंत्री के स्टाफ में कार्यरत कर्मचारी या अधिकारी ही तय किया करते थे।
खैर, इन बातों का सबूत नहीं है, इसलिए इन्हें प्रमाणित नहीं कहा जा सकता। लेकिन सबको पता है कि भ्रष्टाचार का दैत्य और विशालकाय होता जा रहा है। मकडज़ाल ने पूरे सिस्टम को जकड़ कर रखा है। कोई दावा नहीं कर सकता कि बिना पैसे के कोई काम हो ही जाएगा। शिकायतों के साथ ही लोकायुक्त या आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो की कार्रवाई का दायरा भी बढ़ रहा है। आरोपी पकड़े भी जा रहे हैं, उन्हें जेल भी हो रही है। अब तो सम्पत्तियां भी राजसात हो रही हैं। लेकिन भ्रष्टाचार फिर भी रुकने का नाम नहीं ले रहा है।





