उदन्त मार्त्तण्ड’ से लेकर आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस तक हिंदी पत्रकारिता

संजीव शर्मा
हिंदी पत्रकारिता की दो शताब्दियों की यात्रा केवल समाचारों के प्रसार की कहानी नहीं है, बल्कि यह भारतीय समाज, संस्कृति, राजनीति और तकनीकी विकास का जीवंत दस्तावेज भी है। 1826 में ‘उदन्त मार्तण्ड’ के प्रकाशन से लेकर आज के कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित मीडिया युग तक, हिंदी पत्रकारिता ने अनेक उतार-चढ़ाव, संघर्ष, प्रयोग और नवाचार देखे हैं। यह यात्रा परंपरा और आधुनिकता के संगम की ऐसी गाथा है, जिसने न केवल पत्रकारिता को समृद्ध किया बल्कि जनमानस को भी जागरूक और सशक्त बनाया।
कोलकाता के कोलूटोला इलाके की अमरतल्ला गली से कानपुर निवासी वकील, पंडित युगल किशोर शुक्ल ने 30 मई 1826 को साप्ताहिक पत्र ‘उदन्त मार्तण्ड’ पहला अंक प्रकाशित किया। ‘उदन्त मार्त्तण्ड’ न केवल भारत का पहला हिन्दी समाचार पत्र था, बल्कि यह भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में एक साहसिक भाषाई और सांस्कृतिक प्रयोग भी था। इसका पूरा श्रेय पंडित युगल किशोर शुक्ल को जाता है। उस दौर में जब अंग्रेजी, बांग्ला और फारसी का बोलबाला था, इसने देवनागरी लिपि में छपाई कर हिन्दी भाषियों को अपनी पहचान और आवाज दी। पंडित युगल किशोर शुक्ल ने जब ‘उदन्त मार्त्तण्ड’ का पहला अंक प्रकाशित किया होगा, तब शायद उन्हें भी इस बात का आभास नहीं रहा होगा कि वे एक ऐसी मशाल जला रहे हैं जो आने वाली दो सदियों तक भारत की सामाजिक और राजनीतिक चेतना को आलोकित करेगी।
अल्पायु में ही ‘उदन्त मार्तण्ड’ ने भविष्य के राष्ट्रवादी समाचार पत्रों के लिए एक ढाँचा तैयार किया। इसने भारतीय मानस में सांस्कृतिक और राजनीतिक चेतना जगाने का कार्य किया, जो आगे चलकर स्वतंत्रता आंदोलन का आधार बनी। इसे मध्यदेशीय भाषा का पत्र कहा गया, जिसने उत्तर भारत के विभिन्न क्षेत्रों के बीच संवाद का एक सेतु बनाने का प्रयास किया, भले ही उस समय कलकत्ता में हिन्दी भाषियों की संख्या कम थी।
यह पत्र केवल समाचारों का माध्यम नहीं था, बल्कि इसने सामाजिक बुराइयों पर कड़ा प्रहार किया और समाज में जागरूकता लाने का काम किया। इसने तत्कालीन भारतीय समाज के सरोकारों को केंद्र में रखा। अपनी संक्षिप्त प्रकाशन अवधि में ही इसने ईस्ट इंडिया कंपनी की दमनकारी नीतियों के विरुद्ध आवाज उठाई। सरकारी सहायता और डाक सुविधाओं के अभाव के बावजूद, इसने एक ‘क्रांतिकारी अखबार’ के रूप में अपनी पहचान बनाई। ‘उदन्त मार्तण्ड’ भाषाई बाधाओं और संसाधनों की कमी के कारण केवल 79 अंक तक ही प्रकाशित हो पाया, लेकिन इसने हिंदी में सोचने और लिखने की नींव रख दी। 1827 में अंतिम अंक में श्री शुक्ल ने लिखा था कि ‘आज दिवस लौं उग चुक्यौ मार्तंड उदन्त, अस्ताचल को जात है दिनकर दिन अब अंत।’ अल्पायु में ही ‘उदन्त मार्तण्ड’ ने भविष्य के राष्ट्रवादी समाचार पत्रों के लिए एक ढाँचा तैयार किया। इसने भारतीय मानस में सांस्कृतिक और राजनीतिक चेतना जगाने का कार्य किया, जो आगे चलकर स्वतंत्रता आंदोलन का आधार बनी। इसे मध्यदेशीय भाषा का पत्र कहा गया, जिसने उत्तर भारत के विभिन्न क्षेत्रों के बीच संवाद का एक सेतु बनाने का प्रयास किया, भले ही उस समय कलकत्ता में हिन्दी भाषियों की संख्या कम थी। यही कारण है कि 30 मई को हिन्दी पत्रकारिता दिवस के रूप में मनाकर पूरा देश इस पत्र के ऐतिहासिक साहस और योगदान को याद करता है।
हिंदी पत्रकारिता ने 200 वर्षों में साम्राज्यवाद से लड़ाई लड़ी, स्वतंत्रता दिलाई, लोकतंत्र का चौथा स्तंभ बनी, डिजिटल उछाल लिया और अब एआई की चुनौती का सामना कर रही है। यह यात्रा सिर्फ अखबारों की नहीं, बल्कि भारत की सामाजिक राजनीतिक चेतना की कहानी है। रोचक किस्सों, गुमनाम नायकों, बलिदानों और तकनीकी क्रांतियों से भरी यह विकास यात्रा हमें पत्रकारिता के तमाम पहलुओं और बदलावों से रूबरू कराती है।
इन परिवर्तनों को आसानी से समझाने के लिए हम हिंदी पत्रकारिता की इस मैराथन यात्रा को निम्नलिखित भागों में विभक्त कर आसानी से सकते हैं।
उद्भव और प्रारंभिक संघर्ष (1826-1873):
जैसा कि हम सभी भली-भाँति जानते हैं कि हिंदी पत्रकारिता का जन्म बंगाल में हुआ, जहाँ अंग्रेजी, बंगाली और फारसी पहले से सक्रिय थी। पहले हिंदी समाचार पत्र ‘उदन्त मार्तण्ड’ के लिए पंडित युगल किशोर शुक्ल ने 16 फरवरी 1826 को लाइसेंस लिया और इसी साल 30 मई को पहला अंक प्रकाशित हुआ। फिर 1829 में राजा राममोहन रॉय ने हिंदी, अंग्रेजी, बंगाली और फारसी में ‘बेंगदूत’ निकाला। यह अखबार भी मात्र 12 अंक तक ही प्रकाशित हो पाया। लेकिन यह साप्ताहिक पत्र सती प्रथा का विरोध जैसे सुधारों का माध्यम भी बना। 1854 में कोलकाता से ही श्याम सुन्दर सेन के संपादन में समाचार ‘सुधावर्षन’ प्रकाशित हुआ। बनारस से ‘बनारस अखबार’ ने हिंदी पट्टी में समाचार पत्रों का प्रवेश कराया। राजा शिव प्रसाद के सितारे-हिंद ने उर्दू-हिंदुस्तानी शैली अपनाई। इस युग में दर्जनों प्रयोग हुए जैसे सुधाकर, प्रजा हितैषी, ज्ञानदीप आदि लेकिन अधिकांश छोटे और अल्पकालिक थे। चूँकि उस समय देश में साक्षरता मात्र 3-4 फीसदी थी और सुविधाओं का भी अभाव था फिर भी ये पत्र गाँवों तक पहुँचे। इस दौरान कई सकारात्मक बातें भी हुई जैसे कि भाषा संस्कृत से हिंदी और भारी से सरल की ओर बढ़ी। अखबारों प्रकाशन की छोटी आयु के बाद भी प्रकाशकों में ब्रिटिश सेंसरशिप, आर्थिक दबाव, मुद्रण तकनीक की कमी के बाद भी प्रकाशन का हौंसला बढ़ता गया। मोटेतौर पर इस दौर की पत्रकारिता का मुख्य उद्देश्य सूचना देना कम और स्वतंत्रता आंदोलन के प्रति जागृति के साथ धार्मिक-सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार करना अधिक था।
साहित्य और सुधार का दौर (1873-1900):
भारतेंदु हरिश्चंद्र ने 1873 में हरिश्चंद्र मैगजीन (बाद में हरिश्चंद्र चंद्रिका) शुरू किया। इससे पहले 1867 में उनका ‘कवि वचन सुधा’ आ चुका था। एक तरह से भारतेंदु युग ने हिंदी पत्रकारिता को नई दिशा दी। इसी दौरान भारत मित्र, हिंदी प्रदीप, उचित वक्ता आदि समाचार पत्र निकले। इसी दौर में भाषा शुद्ध हुई और खड़ी बोली का विकास भी हुआ। इस दौर में विधवा विवाह, बाल विवाह विरोध, शिक्षा प्रसार, जाति प्रथा जैसे मुद्दों के जरिये पत्रकारिता सिर्फ खबर नहीं,
सामाजिक क्रांति का हथियार बन गयी। महावीर प्रसाद द्विवेदी ने जहाँ ‘सरस्वती’ के माध्यम से साहित्यिक पत्रकारिता को मजबूत किया। वहाँ, भारतेंदु ने साहित्यकारों को पत्रकारिता से जोड़कर मुंशी प्रेमचंद जैसे स्तंभ लेखक पत्रकारिता को दिए। इस दौर में पत्रकारिता केवल समाचार नहीं थी, बल्कि यह ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ एक सांस्कृतिक विरोध था। ‘निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल’ के मंत्र ने हिंदी को जन-जन की भाषा बनाया। इस दौर भारत में स्वतंत्रता आंदोलन की नींव पड़ रही थी और पत्रकारिता इस आंदोलन का महत्वपूर्ण हथियार बन रही थी।
विद्रोह का दौर (1900-1947):
यह पत्रकारिता का स्वर्णिम दौर था जिससे समाचार पत्रों को समाज और देश की जनता की आवाज बनने का अवसर दिया। हम कह सकते हैं कि 20वीं सदी में हिंदी पत्रकारिता राष्ट्रीय चेतना का स्वर बनी। इस दौर में क्रांति की अलख जगाने वाले प्रमुख समाचार पत्रों की बात करें तो 1913 में कानपुर से गणेश शंकर विद्यार्थी ने ‘प्रताप’ का प्रकाशन आरंभ किया और यही 16 पृष्ठों का यह साप्ताहिक क्रांतिकारियों का हथियार बन गया। प्रताप का संपादन करते हुए विद्यार्थी जी ने सीधेतौर पर लिखा था कि ‘हम जो कुछ लिखते हैं, सत्य के लिए लिखते हैं।’ इस बात से भी हम सभी बखूबी परिचित हैं कि प्रताप के क्रांतिकारी शब्द अंग्रेजों को बुरी तरह चुभते थे और यही कारण था कि ब्रिटिश सरकार ने उन्हें बार-बार जेल भेजा। प्रताप की जगाई स्वराज की अलख को ‘अभ्युदय’, ‘मतवाला’ और ‘आज’ जैसे समाचार पत्रों ने लहर बना दिया। इस लहर को आगे बढ़ाने में वंदे मातरम, स्वदेश, तरुण भारत ने भी सक्रिय भूमिका निभाई। गांधी जी द्वारा चलाये गए असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा एवं भारत छोड़ो आंदोलन को देशव्यापी बनाने में हिंदी प्रेस की प्रभावी भूमिका थी। इसी दौर में गांधी का ‘नवजीवन’ और ‘हरिजन’ जनता की आवाज बने और महात्मा गांधी के संदेश को गाँव-गाँव पहुँचाने का माध्यम भी। इन अखबारों की धमक से घबराकर अंग्रेज सरकार ने दमन चक्र शुरू किया और तमाम हिंदी पत्र बंद कर दिए गए, प्रेस जब्त हुए तथा संपादक जेल भेजे गए। पत्रकारिता उस समय कोई व्यवसाय नहीं, बल्कि राष्ट्र-सेवा का संकल्प थी। इस समय के पत्रकार केवल लेखक नहीं थे, बल्कि स्वतंत्रता सेनानी भी थे। उन्होंने जेल यात्राएं की, आर्थिक कठिनाइयों का सामना किया, लेकिन अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। इस दौर में लेखन शैली में भी बदलाव आया। भाषा सरल और जनसुलभ हुई, ताकि अधिक से अधिक लोग जुड़ सकें। संपादकीय लेखों का प्रभाव इतना गहरा था कि वे जनमत निर्माण का मुख्य स्रोत बन गए।
विस्तार, नियंत्रण और चुनौतियों का दौर (1947-1990):
स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात हिंदी पत्रकारिता ने लोकतंत्र का चौथा स्तंभ बनने और देश के नवनिर्माण में सहभागी बनने का दायित्व संभाला। दैनिक हिंदुस्तान, नवभारत टाइम्स, दैनिक जागरण, अमर उजाला, नवभारत, नई दुनिया देशबंधु, जनसत्ता, दैनिक भास्कर जैसे कई अखबार प्रभावी रूप से उभरे। सरकारी नीतियों, योजनाओं और विकास कार्यों तक जनता तक पहुँचाने में पत्रकारिता की महत्वपूर्ण भूमिका रही। साथ ही, सत्ता की आलोचना और लोकतंत्र की रक्षा का दायित्व भी अखबारों ने निभाया। इसी दौर में आपातकाल के दौरान हिंदी अखबारों की ताकत देखने को मिली। आपातकाल हिंदी पत्रकारिता के लिए एक कठिन परीक्षा थी। सेंसरशिप लागू कर दी गई थी और प्रेस की स्वतंत्रता पर अंकुश लगा दिया गया था। इस समय कुछ समाचार पत्रों ने सरकार के दबाव में झुकने का रास्ता चुना, जबकि कुछ ने विरोध का साहस दिखाया। यह दौर इस बात का प्रमाण है कि पत्रकारिता केवल सूचना का माध्यम नहीं, बल्कि लोकतंत्र का प्रहरी भी है। आपातकाल के बाद पत्रकारिता में आत्ममंथन हुआ और स्वतंत्रता तथा निष्पक्षता के मूल्यों को और अधिक मजबूती मिली।
वहीं, तकनीकी का विस्तार भी हुआ और 1980-90 में ऑफसेट प्रिंटिंग और कंप्यूटर कंपोजिंग आई। समाचार पत्रों ने क्षेत्रीय विस्तार किया। धर्मयुग, दिनमान, साप्ताहिक, इण्डिया टुडे और साप्ताहिक हिंदुस्तान जैसी पत्रिकाओं और अखबारों ने सम-सामयिक एवं साहित्यिक पत्रकारिता को लोकप्रिय बनाया। सच्चिदानंद हीरानंद वात्सायन ‘अज्ञेय’ (दिनमान), धर्मवीर भारती (धर्मयुग) और मनोहर श्याम जोशी (साप्ताहिक हिंदुस्तान) जैसे दिग्गजों ने पत्रकारिता को बौद्धिक रूप से समृद्ध किया।
नई सदी का उफान (1991-2020):
देश में आर्थिक उदारीकरण की हवा बही तो मिशनरी अखबार, उद्योग में परिवर्तित हो गए। अखबार उद्योग को भी नए पंख लग गए। आर्थिक सुधारों ने मीडिया को पूर्ण रूप से एक ‘उद्योग’ बना दिया। उन्हें दुनिया भर से श्रेष्ठ संसाधन जुटाने और पाठकों तक सौंदर्यपरक और व्यवस्थित तरीके से पहुँचने का मौका मिला और यहीं से पत्रकारिता का स्वरूप मीडिया हो गया और वह यह नये किस्म का चोला पहनकर मिशन से बिजनेस हो गया। इसी दौर में ब्रेकिंग न्यूज की संस्कृति शुरू हुई और रिपोर्टिंग का भी तौर-तरीका बदल गया। उल्लेखनीय बात यह है कि इस दौर में न्यूज चैनलों की टीवी क्रांति के बावजूद हिंदी प्रेस मजबूत और मजबूत होती गयी। दैनिक भास्कर, अमर उजाला, दैनिक जागरण, पंजाब केसरी, नई दुनिया, राजस्थान पत्रिका जैसे तमाम अखबार समूहों ने बहु संस्करण का मॉडल अपनाया और साथ ही इंटरनेट पर भी उनके ऑनलाइन एडिशन और एप्स की धमक सुनाई देने लगी। बड़े मीडिया हाउस बने और कॉर्पोरेट प्रभाव बढ़ने लगा। हालाँकि इससे संसाधनों और तकनीक में सुधार हुआ, लेकिन निष्पक्षता और गुणवत्ता पर प्रश्न भी उठने लगे।
सोशल मीडिया का क्रांतिकारी दौर 2010 के बाद सोशल मीडिया ने आँधी-तूफान की तरह इस क्षेत्र में घुसपैठ की और धीरे-धीरे यह पत्रकारिता का 2.0 संस्करण बन गया। मोबाइल के कंधे पर चढ़कर इंटरनेट शहरों से गाँवों तक पहुँच गया और उसी तेजी से सोशल मीडिया की पैठ बढ़ती गयी। इंटरनेट ने छोटे-छोटे इलाकों के वीडियो, न्यूज, लाइव अपडेट को देशव्यापी बना दिया और तब शुरुआत हुई पत्रकारिता की एक नयी विधा ‘डेटा जर्नलिज्म’ की जिसने भाषा को और सरल करते हुए इसे गली मोहल्लों की भाषा बना दिया। सोशल मीडिया ने इमोजी के जरिये भाषा को अलग ही रूप दे दिया। सरल शब्दों में कहें तो स्मार्टफोन और सस्ते डेटा ने पत्रकारिता का लोकतंत्रीकरण कर दिया। लगभग सभी बड़े समाचार पत्रों और चैनलों ने अपने डिजिटल प्लेटफॉर्म विकसित किए। वीडियो कंटेंट, लाइव अपडेट्स और इंटरैक्टिव फीचर्स ने समाचारों को अधिक आकर्षक बना दिया। अब केवल बड़े घराने ही प्रकाशक नहीं थे; हर व्यक्ति एक ‘सिटीजन जर्नलिस्ट’ बन गया। ट्विटर (अब एक्स), फेसबुक और यूट्यूब समाचारों के प्राथमिक स्रोत बन गए।
सोशल मीडिया के विस्तार ने ‘फेक’ न्यूज जैसी बीमारियों को भी जन्म दिया और कई मामलों में सही-गलत की पहचान खत्म हो गयी। स्थिति यहाँ तक आ गयी कि कई मीडिया संस्थानों सहित खुद सरकार को फेक्ट चैक इकाइयाँ बनानी पड़ी। लेकिन इन सभी बाधाओं के बाद भी हिंदी ने दुनिया का सबसे बड़ा भाषाई मीडिया बनने का परचम लहरा दिया और हिंदी अखबार विश्वसनीयता में सबसे आगे बने रहे। हालाँकि, इस दौर में डिजिटल पत्रकारिता ने गति और पहुँच तो बढ़ाई, लेकिन फेकन्यूज और अपुष्ट सूचनाओं की समस्या से विश्वसनीयता एक बड़ा मुद्दा बनकर उभरी।
आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस (एआई) दौर (2020 से आगे):
आज हिंदी पत्रकारिता अपने सबसे चुनौतीपूर्ण और रोमांचक मोड़ पर है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस (एआई) की पदचाप से ही 2025-26 में हिंदी पत्रकारिता में खलबली मच गयी। किसी को आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस पत्रकारिता पर सबसे बड़ा खतरा नजर आया तो किसी को, यह काम को और आसान बनाने का जरिया। Reuters और India AI Summit 2026 की एक रिपोर्ट के अनुसार 70 प्रतिशत से ज्यादा न्यूज संगठन अब एआई का उपयोग कर रहे हैं और इसके जरिये ऑटोमेटेड राइटिंग, डेटा एनालिसिस, पर्सनलाइजेशन, अनुवाद, फेकन्यूज डिटेक्शन जैसे विभिन्न काम करने लगे हैं। कई अखबारों के न्यूजरूम में अब आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस ट्रेंडिंग टॉपिक्स स्कैन करता है, हेडलाइंस सुझाता है, वॉइस ओवर जेनरेट करता है। अब पाठक खबर नहीं ढूंढता बल्कि खबर पाठक को ढूंढती है। गूगल और मेटा के एल्गोरिदम तय करते हैं कि आप क्या पढ़ेंगे। हेडलाइन लिखना, डेटा का विश्लेषण करना और यहाँ तक कि लेखों का सारांश तैयार करना अब सेकंडों में एआई द्वारा किया जा रहा है। दुनिया के विकसित देशों को तो छोड़ो आज भारत में ही ‘सना’ (आज तक) और ‘लीसा’ जैसे एआई न्यूज एंकर्स अब खबरें पढ़ रहे हैं।
सही मायने में प्रिंट मीडिया और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का मिलन पत्रकारिता के इतिहास में एक दुधारी तलवार की तरह है। जहाँ एक ओर एआई ने काम की गति एवं सहजता बढ़ाई है, वहीं दूसरी ओर इसने पत्रकारिता की साख और मौलिकता के सामने गंभीर चुनौतियाँ खड़ी कर दी हैं। एआई द्वारा जनरेट की गई गलत सूचनाएँ या मनगढ़ंत तथ्य (Hallucinations) प्रिंट मीडिया की सबसे बड़ी पूँजी विश्वसनीयता को नुकसान पहुँचा सकते हैं। एक बार छप जाने के बाद अखबारों में गलती सुधारना डिजिटल की तुलना में कठिन होता है। इसके साथ साथ, एआई मॉडल अक्सर मौजूदा पत्रकारिता के आधार पर तैयार होते हैं, जिससे बौद्धिक संपदा के उल्लंघन और मौलिक लेखकों के हक मारे जाने का खतरा बढ़ गया है। इससे नौकरियाँ जाने एवं मानवीय मेधा के ह्रास का खतरा भी बढ़ गया है।
चुनौतियाँ और भविष्य:
दो सदियों की पत्रकारिता की इस यात्रा में हिंदी पत्रकारिता के सामने अब सबसे बड़ा संकट साख का है क्योंकि फेक न्यूज और क्लिकबेट पत्रकारिता की सबसे बड़ी चुनौती बन गए हैं। इसी तरह हिंग्लिश के बढ़ते प्रयोग से मूल हिंदी की शुद्धता प्रभावित हुई है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता के बढ़ते उपयोग से यह सवाल भी उठने लगे हैं कि क्या यह मानवीय संवेदनाओं और ग्राउंड रिपोटिंग की जगह ले पाएगा क्योंकि पत्रकारिता का मूल सहानुभूति और सत्य की खोज है। प्रिंट मीडिया के लिए एआई एक सहायक तो हो सकता है, लेकिन वह संपादक की जगह नहीं ले सकता। फिलहाल यह तो दावे से कहा जा सकता है कि भविष्य उसी संस्थान का उज्ज्वल है जो एआई की तकनीकी सटीकता और मनुष्य के नैतिक विवेक के बीच संतुलन बिठा पाएगा।
‘उदन्त मार्त्तण्ड’ से शुरू हुई हिंदी पत्रकारिता की यात्रा आज एआई और डिजिटल मीडिया के अत्याधुनिक युग तक जरूर पहुँच चुकी है। इन 200 वर्षों में उसने न केवल तकनीकी बदलावों को अपनाया, बल्कि समाज के हर परिवर्तन को अपने भीतर समाहित किया। ‘उदन्त मार्तण्ड’ के हाथ से लिखे जाने वाले दौर से लेकर आज चैट-जीपीटी जैसे एआई टूल द्वारा न्यूज बुलेटिन तैयार करने तक, हिंदी पत्रकारिता ने लंबा सफर तय किया है। स्वरूप बदला है, माध्यम बदले हैं और गति बदली है, लेकिन इसकी आत्मा आज भी वही है-जनता की आवाज बनना। यह यात्रा हमें यह सिखाती है कि पत्रकारिता केवल खबरों का संकलन नहीं, बल्कि समाज का दर्पण और दिशा-निर्देशक है। भविष्य में चाहे तकनीक कितनी भी उन्नत क्यों न हो जाए, पत्रकारिता का मूल उद्देश्य-सत्य, निष्पक्षता और जनहित- सदैव सर्वोपरि रहना चाहिए। हिंदी पत्रकारिता की यह विकास यात्रा एक जीवंत परंपरा है, जो निरंतर आगे बढ़ रही है-नए प्रश्नों, नई चुनौतियों और नई संभावनाओं के साथ।
(यह लेख अंतर राष्ट्रीय शोध पत्रिका *समागम* के विशेषांक में प्रकाशित हुआ है।)
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