संजय सक्सेना
एसएंडपी ग्लोबल रेटिंग्स ने बुधवार, 24 जून 2026 को एक रिपोर्ट जारी की है। इसमें भारत की सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि दर वित्त वर्ष 2027 में धीमी रहने का अनुमान लगाया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, यह वृद्धि दर 6.6 प्रतिशत तक गिर सकती है। ऊर्जा तनाव, कमजोर मॉनसून और वैश्विक आर्थिक वृद्धि में कमी इसके प्रमुख कारण होंगे।
एसएंडपी ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि वित्त वर्ष 2026 में भारत की अर्थव्यवस्था ने 7.7 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की थी। वित्त वर्ष 2025 में यह 7.1 फीसदी रही थी। लेकिन अब मार्च 2027 को समाप्त होने वाले वित्तीय वर्ष में वृद्धि दर 6.6 प्रतिशत रहने का अनुमान है।
भारतीय रिजर्व बैंक ने भी वृद्धि दर के लिए अनुमान 6.6 प्रतिशत ही लगाया है। असल में अल नीनो के प्रभाव से मॉनसूनी बारिश की शुरुआत बेहद कमजोर हुई है। 22 जून तक बारिश की कमी 43 प्रतिशत तक बढ़ गई है। हालांकि सरकार ने कमजोर मॉनसून से निपटने के लिए राज्यवार आकस्मिक योजनाएं तैयार की हैं। इन योजनाओं में कम बारिश की स्थिति के अनुकूल वैकल्पिक फसलों की सिफारिश की गई है। लेकिन लगता नहीं कि इससे बहुत फर्क पडऩे वाला है।
मानसून की करें तो दक्षिण-पश्चिम मानसून का पहला महीना खत्म होने में केवल एक सप्ताह बचा है, लेकिन अब तक बीता यह सीजन देश के अन्नदाताओं और अर्थव्यवस्था के लिए सूखे जैसी बड़ी चुनौती लेकर आया है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग का कहना है कि एक से 22 जून तक देशभर में सामान्य से 43 प्रतिशत कम बारिश हुई है। मानसून की स्थिति में अगर तुरंत सुधार नहीं हुआ, तो देश के प्रमुख कृषि राज्यों में खरीफ की खेती पर तगड़ी मार पड़ सकती है। इससे न सिर्फ ग्रामीण इलाकों में मांग प्रभावित होगी, बल्कि खाद्य महंगाई का खतरा भी तेजी से बढ़ेगा।
दरअसल, देश में सबसे ज्यादा खरीफ उत्पादन करने वाले महाराष्ट्र में सामान्य से 82 प्रतिशत और गुजरात में 75 प्रतिशत कम बारिश हुई है। छत्तीसगढ़ में 69 प्रतिशत और मध्य प्रदेश में 52 प्रतिशत कम बरसात दर्ज की गई है। वहीं, झारखंड में सामान्य से 66 फीसदी, ओडिशा में 48 फीसदी और बिहार, उत्तर प्रदेश एवं तेलंगाना में 43-43 फीसदी कम पानी बरसा है। दक्षिण भारत के कर्नाटक में 40 फीसदी और केरल में 28 फीसदी कम बारिश हुई है।
भारतीय मौसम विभाग के अनुसार 2 जुलाई को समाप्त होने वाले सप्ताह तक मानसून ऐसे ही कमजोर रह सकता है। इसका असर खरीफ फसलों और संवेदनशील इलाकों पर पड़ेगा। कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा, देश के 315 जिलों में सामान्य से कम बारिश हो सकती है। इससे खरीफ फसलों की बुवाई पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। देश में अब तक कुल खरीफ क्षेत्र का करीब 10 फीसदी हिस्सा ही बोया गया है। 22 जून तक खरीफ फसलों का कुल रकबा 1.17 करोड़ हेक्टेयर रहा। हालांकि, यह पिछले वर्ष की समान अवधि (1.13 करोड़ हेक्टेयर) से थोड़ा अधिक है, लेकिन पानी की कमी से आगे की बुवाई और बोई जा चुकी फसलों के अस्तित्व पर संकट मंडराने लगा है।
केंद्रीय बैंक ने इस साल के लिए खुदरा महंगाई दर 5.1 प्रतिशत रहने का अनुमान जताया है। लेकिन, खाद्य पदार्थों की कीमतों में व्यापक स्तर पर होने वाली बढ़ोतरी जून में भी जारी है। अगर खरीफ फसलों के उत्पादन में गिरावट आई, तो दाल, चावल और सब्जियों की कीमतें आसमान छूने लगेंगी। उर्वरक की ऊंची कीमतें भी खाद्य उत्पादन पर नकारात्मक प्रभाव डाल रही हैं। इससे खाद्य पदार्थों की कीमतें भी बढ़ रही हैं। बढ़ती महंगाई लोगों की क्रय शक्ति को कम कर रही है। यह आर्थिक वृद्धि को भी धीमा कर रही है। एसएंडपी ने कहा कि तीसरी तिमाही में उपभोक्ता महंगाई 0.5-0.6 प्रतिशत अंक अधिक रहेगी। चालू वित्त वर्ष में यह बढक़र 5.1 फीसदी हो सकती है। वैसे बाजार लगातार महंगा होता जा रहा है और सामान्य वर्ग की कमाई में उस हिसाब से वृद्धि नहीं हो रही है।
एक और बड़ा मुद्दा है ऊर्जा का। भारत अपनी कच्चे तेल की 88 प्रतिशत जरूरतें आयात करता है। वैश्विक कीमतों में वृद्धि से भारत का आयात बिल बढ़ता है। इससे देश में महंगाई भी बढ़ती है। पश्चिम एशिया संघर्ष से उत्पन्न ऊर्जा तनाव का असर दिख रहा है। उद्योग को कच्चे माल की लागत में भारी वृद्धि का सामना करना पड़ रहा है। आपूर्तिकर्ताओं के वितरण समय में भी देरी हो रही है।
विनिर्माता बढ़ी हुई ऊर्जा लागत का बोझ उपभोक्ताओं पर डाल रहे हैं। हाल ही में पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस की कीमतों में भी वृद्धि हुई है। इन सभी कारकों से महंगाई पर दबाव बढ़ रहा है। एसएंडपी को उम्मीद है कि चालू वित्त वर्ष की दूसरी छमाही में नीतिगत दर में बढ़ोतरी हो सकती है। यह महंगाई को नियंत्रित करने का एक उपाय हो
सकता है। रिजर्व बैंक की वर्तमान नीतियों को देखते हुए ब्याज दरों में संशोधन की गुंजाइश कम ही लगती है। यही नहीं, कर्ज को लेकर भी सख्ती कम होने की उम्मीद बहुत कम है।
केंद्र से लेकर राज्य सरकारें जिस तरह से कर्ज ले रही हैं। ये कह सकते हैं कि कर्ज में डूबती जा रही हैं, उसे देखते हुए अर्थव्यस्था को लेकर चिंता और बढ़ जाती है। कर्ज लेना और कर्ज बढ़ते जाना, दोनों अलग-अलग बातें हैं। यदि कर्ज चुकता होता जाए, तो दिक्कत नहीं है। मध्यप्रदेश सहित कई राज्यों की हालत तो यह हो रही है कि ब्याज चुकाने के लिए भी कर्ज लेना पड़ रहा है। ऐसे में अर्थव्यवस्था की स्थिरता को लेकर संशय होना स्वाभाविक है। फिलहाल, साल के शेष महीनों में महंगाई की बढ़ोत्तरी और जीडीपी की गिरावट को लेकर चिंता का दौर तेज हो रहा है।