संपादकीय….महंगा होता कैंसर का इलाज

संजय सक्सेना
हम बातें तो बड़ी-बड़ी करते हैं, लेकिन जहां काम करना चाहिए, वहां नहीं करते। युद्ध के चलते महंगाई को सामान्य बात बताया जा रहा है, जबकि करोड़ों लोगों के घरों में हंगामा मचा हुआ है। संसद में दो तिहाई बहुमत के लिए पार्टियों में तोडफ़ोड़ की जा रही है, लेकिन दवाइयों के उत्पादन पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। कैंसर जैसे रोगों का इलाज इतना महंगा होता जा रहा है कि मरीज के साथ परिजन भी कराहने लगे हैं।
आज ही समाचार मिला है कि हमारे मध्य प्रदेश में कैंसर मरीजों के इलाज का खर्च 50 प्रतिशत तक बढ़ गया है। यानि डेढ़ गुना बढ़ गया है। एक कीमो का खर्च 2 से 3 हजार रुपए ज्यादा लगेगा। राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) ने कैंसर के इलाज में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाली दो प्रमुख कीमोथेरेपी दवाओं कार्बोप्लाटिन और सिस्प्लाटिन के दाम बढ़ा दिए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यह दोनों दवाएं ओवरी, फेफड़े, स्तन, सिर-गर्दन समेत कई प्रकार के कैंसर के इलाज में उपयोग होती हैं। कई मरीजों को 4 से 6 या उससे अधिक कीमो साइकिल लगती हैं, ऐसे में पूरे इलाज पर हजारों रुपए का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा।
युद्ध के चलते सप्लाई चैन बाधित हुई थी। घाटे के चलते दवा कंपनियों ने प्रोडक्शन पूरी तरह बंद कर दिया था। अब युद्ध की आग थमते देख कंपनियों ने दवाओं का प्रोडक्शन शुरू कर दिया है, लेकिन करीब एक महीने मांग अनुरूप सप्लाई करने में लगेगा। दूसरी ओर, शहर के कैंसर अस्पतालों में कीमो की दवाएं पूरी तरह खत्म हो चुकी हैं। हालत ऐसी है कि कैंसर के 7 प्रमुख प्रकारों के इलाज में इस्तेमाल होने वाली जरूरी दवाओं की कमी से हर 100 में से करीब 70 मरीज प्रभावित हो सकते हैं।
रिपोर्टों के अनुसार सिस्प्लैटिन और कार्बोप्लैटिन की कीमतों में 10 प्रतिशत से 50 प्रतिशत तक वृद्धि की गई है। ताकि इनकी उपलब्धता बनी रहे और उत्पादन फिर से सामान्य हो सके। युद्ध और सप्लाई बाधाओं के कारण प्लैटिनम-बेस्ड कीमो दवाओं की सप्लाई में लगभग 50 प्रतिशत तक कमी आने का अनुमान है। इसका असर सिस्प्लैटिन, कार्बोप्लैटिन और ऑक्सालिप्लैटिन जैसी दवाओं की उपलब्धता और कीमतों पर देखने को मिल रहा है।
चिकित्सा विशेषज्ञों का कहना है कि सिस्प्लैटिन, कार्बोप्लैटिन और ऑक्सालिप्लैटिन जैसी जरूरी दवाओं की सप्लाई में रुकावट के कारण डॉक्टरों को इलाज के स्टैंडर्ड तरीकों में बदलाव करना पड़ रहा है। सरकारी मेडिकल कॉलेजों और अस्पतालों पर भी इस कमी का असर पड़ा है। हालांकि, प्लैटिनम वाली दवाओं की कमी तो है, लेकिन दूसरी कीमोथेरेपी दवाएं मिल रही हैं। इसलिए, भले ही सभी इलाज पूरी तरह से बंद नहीं हुए हैं, लेकिन इससे कुछ खास मरीजों के इलाज पर असर पड़ रहा है।
अधिकांश दवा कंपनियों ने तो पहले ही हाथ खड़े कर दिए हैं। उत्पादकों का कहना है कि जहां दो से तीन पारियों में काम होता था, वहां एक पारी में ही काम हो पा रहा था। युद्ध के चलते तमाम गतिरोध आ गए थे। इसके चलते सभी तरह की दवाएं बाजार से गायब होने लगीं। कमी होने पर व्यापारी स्टोर भी करने लगते हैं। ऐसे में बाजार में दवाइयों के दाम और बढऩे लगते हैं।
कैंसर की दवाओं के दाम तो सरकार की तरफ से ही बढ़ा दिए गए हैं, लेकिन बाकी तमाम दवाइयों के दाम भी बाजार में बढ़ते चले जा रहे हैं। साधारण जुकाम, बुखार, खांसी तक की दवाएं महंगी हो गई हैं। इनकी तरफ कौन ध्यान देगा? सरकार बस जंग का नाम लेकर अपना पल्ला झाड़ लेती है, लेकिन जो बीमार होता है, उसे तो दवाएं खरीदना जरूरी हो जाता है। वैसे हमारे यहां सामान्य बीमारी में लोग आम तौर पर दवाएं कम ही लेते हैं और घरेलू नुस्खों से काम चलाने का प्रयास करते हैं। लेकिन कैंसर जैसी दवाओं पर तो सरकार को ध्यान देना चाहिए।
हम विश्व गुरू बनने की बात तो करते हैं, लेकिन स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण  मुद्दों पर उदासीन ही रहते हैं। राजनीतिक और सामुदायिक मुद्दों पर चलने वाला समाज और हमारे राजनीतिक दल, आम जनता का ध्यान ही भटकाते रहते हैं। यही कारण है कि लोग हिंदू-मुस्लिम और ऐसे अन्य मुद्दों में उलझे हैं, लेकिन कहां दवाएं नहीं मिल रही हैं, या महंगी होने के कारण लोग इलाज नहीं करा पा रहे हैं, इस पर कोई ध्यान नहीं देता। आम आदमी तो बस मरने के लिए है, उसकी मौत पर राजनीति करने लोग आ जाएंगे, लेकिन इलाज के लिए कोई नहीं।
सरकार ने भले ही आयुष्मान जैसी योजना चालू करके रखी है, लेकिन कई बीमारियां इसके दायरे से भी बाहर हो जाती हैं। स्वास्थ्य बीमा भी दम तोड़ देता है। बीमा और आयुष्मान की आड़ में वैसे भी इलज से ज्यादा भ्रष्टाचार होता है। वो वर्ग जो तमाम सरकारी सुविधाएं लेता है, असल में वही वोट की कीमत वसूल पाता है। और सरकार से लेकर राजनीतिक पार्टियंां तक उसकी ही खातिरदारी में जुटी रहती हैं। उसके लिए बीमारियों के साथ ही मौत के दरवाजे खुले रहते हैं। मध्यम वर्ग को तो आम तौर पर इनकी मदद भी इलाज में नहीं मिल पाती। आयुष्मान के दायरे में वो आ नहीं पाता और बीमा करा नहीं पाता। वह वोटों की ब्लैकमेलिंग भी नहीं कर पाता और राजनीतिक विचारधाराओं की लहरों में सिमट कर दम तोड़ता रहता है।

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