संपादकीय
जेनरिक दवाओं पर भी महंगाई का प्रहार

संजय सक्सेना
ईरान और अमेरिका के बीच चल रहे युद्ध और खाड़ी क्षेत्र में बढ़ती अस्थिरता का बुरा असर जंग में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर शामिल देशों पर तो पड़ ही रहा है, आम इंसान की सेहत और जेब पर पडऩे लगा है। दुनिया भर में सबसे ज्यादा सस्ती यानि जेनेरिक दवाएं बनाने और सप्लाई करने वाले भारत के दवा उद्योग पर एक बहुत बड़ा संकट मंडरा रहा है। ब्रांडेड दवाएं तो बाजार में वैसे भी महंगी होती जा रही हैं, अब इन सस्ती दवाओं पर भी महंगाई का प्रहार होने वाला है।
इस युद्ध के कारण दवा बनाने के लिए जरूरी कच्चे माल की कमी हो सकती है, साथ ही माल ढुलाई का खर्च भी बढऩा शुरू हो गया है। यही नहीं, इसकी सप्लाई चेन भी टूट सकती है। इसका सीधा मतलब यह है कि आने वाले दिनों में पैरासिटामोल, एंटीबायोटिक्स और डायबिटीज जैसी आम बीमारियों की दवाओं की कीमतें बढ़ सकती हैं और इनकी कमी भी हो सकती है। अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रम्प स्वयं व्यापारी हैं, लेकिन उनके नेतृत्व में अमेरिका का यह युद्ध वैश्विक व्यापार को भारी नुकसान पहुंचा रहा है।
फार्मेक्सिल यानि भारतीय औषधि निर्यात संवर्धन परिषद और अन्य उद्योग संगठनों ने स्पष्ट रूप से चेतावनी दी है कि अगर पश्चिम एशिया में तनाव इसी तरह लंबे समय तक बना रहा, तो इसका बहुत भयंकर असर होगा। भारत लगभग 200 देशों को जेनेरिक दवाएं बेचता है। इस संकट का असर न केवल भारत पर पड़ेगा, बल्कि अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका के उन तमाम गरीब देशों पर भी पड़ेगा, जो सस्ती दवाओं के लिए पूरी तरह से भारत पर निर्भर हैं। वाणिज्य मंत्रालय के अनुसार, भारतीय दवा उद्योग का आकार लगभग 50 अरब डॉलर का है। दुनिया की कुल जेनेरिक दवा आपूर्ति में भारत की हिस्सेदारी करीब 20 प्रतिशत है।
भारत भले ही दुनिया को सस्ती दवाएं बेचता है, लेकिन इसकी सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि दवा बनाने के लिए जरूरी कच्चा माल यानि एपीआई इसे दूसरे देशों से मंगाना पड़ता है। साल 2025 में भारत ने लगभग 39,215 करोड़ रुपये के कच्चे माल का आयात किया था, जिसमें 70 से 75 प्रतिशत हिस्सा अकेले चीन का था। चीन अब आंखें दिखाने लगा है। विशेषज्ञों का कहना है कि युद्ध के कारण समुद्री मार्गों, खासकर होर्मुज जलडमरूमध्य और खाड़ी क्षेत्र में जहाजों की आवाजाही रुकने से कच्चे माल की सप्लाई बुरी तरह प्रभावित हो सकती है।
कच्चा माल न पहुंचने का सबसे पहला और बड़ा असर उन दवाओं पर पड़ेगा जिनका इस्तेमाल हम रोजमर्रा की जिंदगी में करते हैं। सूत्रों के अनुसार, पैरासिटामोल, एंटीबायोटिक्स, ब्लड प्रेशर और डायबिटीज यानि मधुमेह की दवाओं की सप्लाई पर सीधा संकट आ सकता है क्योंकि ये दवाएं मुख्य रूप से आयात किए गए कच्चे माल से ही बनती हैं। इसके अलावा, कैंसर की दवाओं और इंजेक्शन जैसी चीजों को तय तापमान में रखना होता है। लॉजिस्टिक्स उद्योग के अधिकारियों का कहना है कि रास्ते बदलने और अतिरिक्त सुरक्षा के कारण माल ढुलाई का खर्च और समय दोनों बढ़ेंगे, जिससे दवाओं की लागत में भारी इजाफा होने की पूरी संभावना है।
वैसे भी देश में सभी प्रकार के ईंधन की कीमतों में वृद्धि की जा रही है। घरेलू उपभोक्ताओं पर सीधे ज्यादा भार नहीं डाला गया है, लेकिन व्यावसायिक सिलेंडर की कीमतों में एकदम से प्रति सिलेंडर एक हजार रुपए से अधिक बढ़ गया है। इसके चलते होटल-रेस्टोरेंट से लेकर सभी जगह कीमतें बढ़ गई हैं। केवल खाना उद्योग ही इससे प्रभावित नहीं हुआ, कल-कारखानों पर भी असर पड़ा है। दवा कंपनियों में उत्पादन पर आने वाली लागत बढ़ गई है।
गैस के साथ ही अब डीजल और पेट्रोल की कीमतें भी बढ़ा दी गई हैं। इसके चलते माल ढुलाई का भाड़ा भी बढ़ाया जा रहा है। कच्चे माल को लाने और तैयार उत्पाद सप्लाई करने का भाड़ा बढ़ाया जा रहा है। सरकार भी इसे रोक नहीं सकती, क्योंकि सरकार खुद ही पेट्रोल-डीजल में मूल्य वृद्धि करा रही है और अब राशनिंग की भी तैयारी है। कई जगह पेट्रोल-डीजल की कमी हो गई है और इसे सीमित मात्रा में ही दिया जा रहा है। ऐसे में सभी तरह के उद्योगों पर बोझ पडऩे लगा है।
दवा उद्योग की तरफ से तो पहले भी चेतावनी दी गई थी कि सामान्य बीमारियों की दवाएं भी महंगी होने के आसार हैं, लेकिन सरकार चाह कर भी कुछ नहीं कर पा रही है। उलटे सभी क्षेत्रों में मूल्यवृद्धि उसकी मजबूरी बन गई है। यही कारण है कि अब दवाएं महंगी होना तय है। यह भी हो सकता है कि अब उतने सस्ते दामों में दवाएं नहीं भेज पाने के चलते भारतीय कंपनियों से कई देश दवाएं मंगाना बंद कर दें। उन्हें आर्डर मिलना ही बंद हो जाते हैं या सप्लाई कम हो जाती है, तो भी बहुत बड़ा नुकसान हमारे उद्योग को भी होगा और इसका सीधा असर हमारी अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा।

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