Openion : फाइलों से चिपके असली परजीवी

#SanjaySinha
अब क्योंकि देश के मुख्य न्यायाधीश ने ही कह दिया था कि देश के बेरोजगार परजीवी और तेलचट्टा हैं, तो मुझे लगा कि अपने परिजनों को समझाना मेरा भी धर्म है कि आखिर परजीवी होते क्या हैं और तेलचट्टा किसे कहते हैं।

वैसे आप सबने तेलचट्टा यानी काक्रोच देखा ही होगा। कत्थई रंग का, कई टांगों वाला एक जीव, जो गंदी जगहों पर पलता है और अपने शरीर पर गंदगी लेकर साफ सुथरे घरों में घुस जाता है। बीमारी फैलाता है। डर पैदा करता है।

अब अगर उसी परिभाषा को मान लें तो इस देश में करोड़ों (मेरे ख्याल से करीब 80 करोड़) गरीब, झुग्गियों में रहने वाले, नालों के किनारे सोने वाले, बचा खुचा खाने वाले लोग तेलचट्टा कहलाएंगे क्या? क्योंकि वो भी गंदगी में जीते हैं।

चीफ साहब बोल कर बयान बदल चुके हैं और बाद में उन्होंने कहा कि बात असल में फर्जी डिग्री वालों की थी। ठीक है। मान लेते हैं। लेकिन तब भी सवाल तो रहेगा कि परजीवी आखिर होता कौन है?

संजय सिन्हा ने बहुत खोजबीन की। तब जाकर समझ आया कि परजीवी सिर्फ वो नहीं होता जो किसी के शरीर का खून पीता है। परजीवी वो भी होता है जो किसी दूसरे की ताकत, पहचान, पद, रिश्ते और प्रभाव पर पलता है।

जूं परजीवी है। खटमल परजीवी है। जोंक परजीवी है। पिस्सू परजीवी है। टेप वर्म परजीवी है। ये सब दूसरे के शरीर से चिपकते हैं और उसी का खून, उसी का पोषण लेकर जिंदा रहते हैं। बदले में बीमारी देते हैं, कमजोरी देते हैं।

लेकिन असली मजा तब आया जब मैंने अदालतों में परजीवियों की नई प्रजाति देखी।

अपने एक केस में (मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में) मैं खुद अपनी पैरवी कर रहा था। सामने खड़े थे सुप्रीम कोर्ट के एक रिटायर्ड जज साहब के सुपुत्र। जज साहब और वकील साहब में पुरानी आत्मीयता साफ दिख रही थी। मेरे विरोधी के पास कानून कम था, परिचय ज्यादा था। दलील कम थी, वंश ज्यादा था। अदालत में बार-बार नाम लेकर संबोधन हो रहा था। गलतियों पर भी मुस्कान थी। बच निकलने के रास्ते दिए जा रहे थे।

तब समझ आया कि असली परजीवी कौन है।
वो नहीं जो फुटपाथ पर बैठा बेरोजगार है। वो नहीं जो मोबाइल लेकर वीडियो बना रहा है। वो नहीं जो नौकरी की लाइन में खड़ा है।

असल परजीवी वो है जो अपने पिता के पद का खून चूसता है। जो रिश्तों की नसों से ऑक्सीजन खींचता है। जिसकी डिग्री असली होती है लेकिन पहचान उधार की होती है। जो अदालत में अपने ज्ञान से नहीं, अपने सरनेम से लड़ता है।

और सुनिए।

फौजदारी के एक मामले में विरोधी पक्ष ने एक रिटायर्ड हाई कोर्ट जज को वकील बनाकर खड़ा कर दिया। आदेश खत्म हो चुका था। मामला बदल चुका था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट से स्टे लेकर आठ महीने तक केस लटकाया गया (अभी लटक रहा है)। निचली अदालत ने दोषी माना। वारंट जारी किया। लेकिन मामला ऊपर पहुंचते ही समय की ऐसी दलदल में धंस गया कि दोषी आराम से घूम रहे हैं। घूमते रहेंगे। अब वो उस कीचड़ से कमल बन कर ही निकलेंगे।

जोंक सिर्फ तालाबों में नहीं होतीं। कुछ जोंकें फाइलों से चिपकी होती हैं। कुछ तारीखों से। कुछ कुर्सियों से। कुछ पुराने अहसानों से।

पहले मुझे लगता था कि अदालतों में न्याय मिलता है। लेकिन अधेड़ उम्र में लॉ पढ़कर समझ आया कि इस देश में कई लड़ाइयां कानून से नहीं, पहुंच से जीती जाती हैं।

जानता हूं हार जाऊंगा। क्योंकि जोंक का शरीर मुलायम जरूर होता है, पकड़ बहुत मजबूत होती है।

मैं लड़ रहा हूं ताकि कम से कम आने वाली पीढ़ियां पहचान सकें कि असली परजीवी कौन हैं। वो जो गंदगी में पैदा हुए या वो जो व्यवस्था का खून पीकर मोटे हो गए।

मेरा अनुरोध है कि चीफ सर को एक बार फिर अपने बयान को करेक्ट करना चाहिए और कहना चाहिए कि उन्होंने वकीलों के लिए नहीं, जजों के लिए कहा था, जो कहा था।

साभार
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