नई दिल्ली। गांधी परिवार से एक और नेता के रूप में प्रियंका गांधी चुनावी राजनीति में क़दम रखने जा रही हैं। इसका इंतज़ार दशकों से था। सोमवार को कांग्रेस पार्टी ने घोषणा कर दी कि प्रियंका गांधी केरल के वायनाड लोकसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ेंगी। इस घोषणा के साथ ही दशकों के इंतज़ार पर विराम लग गया।प्रियंका गांधी वायनाड से यूं ही नहीं उतर रही हैं. इसके पीछे गांधी परिवार की बड़ी रणनीति है।
चार जून को कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी जब यूपी की रायबरेली और केरल की वायनाड सीट से विजेता घोषित किए गए तभी तय हो गया था कि उन्हें एक सीट छोड़नी होगी। सोमवार की शाम कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा कि राहुल रायबरेली सीट से सांसद रहेंगे और वायनाड छोड़ेंगे. उन्होंने यह भी घोषणा कर दी कि वायनाड सीट से प्रियंका गांधी उम्मीदवार होंगी।
प्रियंका गांधी ने पार्टी के फ़ैसले को स्वीकार करते हुए कहा, ”मैं वायनाड के लोगों को अपने भाई की अनुपस्थिति का अहसास नहीं होने दूंगी.” प्रियंका गांधी ने कुछ ऐसी ही बात रायबरेली के लिए कही थी।
राहुल ने वायनाड को ही अपने पास क्यों नहीं रखा और प्रियंका रायबरेली से क्यों नहीं मैदान में उतरीं? ये सवाल राजनीतिक गलियारों में उठाया जा रहा है। राजनीयिक पंडित मानते हैं, ”रायबरेली में प्रियंका के अनुभव को देखते हुए एक बार ऐसा सोचा जा सकता था कि उन्हें यहाँ की सीट देनी चाहिए और राहुल गांधी के पास वायनाड रहने देना चाहिए। लेकिन ऐसा लगता है कि पार्टी ने स्पष्ट संदेश दिया है कि राहुल गांधी ही पार्टी का चेहरा हैं और इसीलिए वह उत्तर प्रदेश से दूर नहीं जायेंगे, ख़ासकर तब जब कांग्रेस पार्टी ने लोकसभा चुनाव में अच्छा प्रदर्शन किया है।
असल में प्रियंका गांधी राजनीति में सोनिया गांधी के प्रचार के जरिए जुड़ीं. उसके बाद राहुल गांधी के चुनावी कार्यक्रम की पूरी कमान उनके पास आ गई. इसके बाद वो अमेठी और रायबरेली की करता धर्ता बन गईं. मां और भाई दोनों के चुनाव की बागडोर उनके ही हाथ में रही. सोनिया की उम्र ढलने और राहुल गांधी के राष्ट्रीय फलक पर उभरने के दौरान प्रियंका गांधी पूरी तरह अमेठी और रायबरेली पर ध्यान केंद्रित कर चुनाव लड़वाती रहीं।
प्रियंका ने खुद को साबित किया
हाल तक उन्होंने राहुल गांधी के रायबरेली जाने के फैसले के बाद अमेठी की कमान संभाली और किशोरी लाल शर्मा के चुनाव की कमान अपने हाथ में ले ली. अमेठी से जीत और रायबरेली से राहुल गांधी के रिकॉर्ड मतों से जीतने के बाद सोनिया गांधी पर प्रियंका को इनाम देने का दबाव बढ़ गया. वायनाड सीट खाली करने के राहुल गांधी के एलान के साथ ही मौका भी आ गया और दस्तूर भी कि प्रियंका को चुनाव लड़वाया जाए. गांधी परिवार को ये फैसला लेने में ज्यादा वक्त भी नहीं लगा।
दक्षिण की राजनीति को साधने की रणनीति
प्रियंका गांधी को वायनाड से उतारे जाने के पीछे राहुल गांधी की उत्तर और दक्षिण की राजनीति को साधने की रणनीति मानी जा रही है. राहुल गांधी ये मानते हैं कि जब अमेठी ने दगा दिया, तब उनको सुदूर दक्षिण के वायनाड ने ही बचाया. वायनाड के लिए राहुल गांधी के मन में इज्जत इतनी बढ़ गई कि वायनाड छोड़ने का फैसला लेना उनके लिए काफी मुश्किल हो गया. उधर, केरल और वायनाड के लोगों ने एक सुर में मांग कि राहुल अगर वायनाड छोड़ रहे हैं तो गांधी परिवार के ही किसी सदस्य को यहां से चुनाव लड़ना चाहिए. स्वाभाविक है की वो नाम प्रियंका का ही होता. वही हुआ. केरल और वायनाड ने 2019 और 2024 दोनों लोकसभा चुनाव में कांग्रेस का जमकर साथ दिया. केरल के लोगों ने लोकसभा में सीटों से कांग्रेस की झोली भर दी. राहुल गांधी उस आधार को खोना नहीं चाहते. इसलिए भी प्रियंका गांधी को टिकट देना सियासी मजबूरी बन गई।
उत्तर में पार्टी को पुनर्जीवित करने का जिम्मा राहुल गांधी के कंधे पर
अब कांग्रेस को उत्तर में पुनर्जीवित करने का जिम्मा पार्टी राहुल गांधी के कंधे पर है. दक्षिण भारत में राहुल गांधी इस मिशन में काफी सफल रहे हैं. अब उत्तर भारत के साथ पूरे देश में राहुल गांधी पार्टी का मजबूत आधार तैयार करने का काम करेंगे. दक्षिण के लोग प्रियंका गांधी के सहारे खुद को गांधी परिवार से पहले की तरह ही जुड़ा हुआ महसूस करेंगे. वैसे भी कांग्रेस ने मजबूती के लिए हमेशा दक्षिण का रुख किया है. इंदिरा गांधी के चिकमगलूर या फिर मेंढक से चुनाव लड़ने की बात रही हो या फिर सोनिया गांधी के बेल्लारी से… इस परंपरा को राहुल गांधी ने भी वायनाड से चुनाव लड़कर निभाया. और अब प्रियंका गांधी भी वही कर रही हैं।
केरल में कांग्रेस की वापसी की रणनीति
केरल में 2026 में विधानसभा चुनाव होने हैं. यहां प्रियंका गांधी जमीन तैयार करेंगी और राहुल गांधी सही समय पर आक्रामक चुनाव प्रचार के जरिए इस राज्य में पार्टी की सरकार की वापसी करवाएंगे. प्रियंका के लोकसभा सांसद बनने से लोकसभा में राहुल गांधी को मजबूती मिलेगी. राहुल गांधी पर लोकसभा में नेता विपक्ष का पद लेने का दबाव है. संभवतः वो इसे स्वीकार भी कर लें. चूंकि राहुल गांधी को पूरे देश में दौरे और पार्टी के पक्ष में प्रचार करना है, इसलिए संसद में राहुल गांधी की अनुपस्थिति में प्रियंका एक ताकत बनकर विपक्षी सांसदों का नेतृत्व कर सकती हैं. सोनिया गांधी अब राज्यसभा जा चुकी हैं.
