पहले उज्जैन के महाकाल कारीडोर में भ्रष्टाचार की खबरें आईं, लाखों रुपए की मूर्तियां तेज हवा में टूट कर बिखर गईं। अब उस राम मंदिर के लिए बने रामपथ में भारी भ्रष्टाचार के प्रमाण बड़े-बड़े गड्ढों के रूप में सामने आए हैं, जो करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र है और यह बरसों से देश की राजनीति में महत्वपूर्ण मुद्दा बना हुआ था। इसका भी उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया था और उज्जैन के महाकाल कारीडोर का भी। ये उल्लेख इसलिए जरूरी है, ताकि ये समझ में आ सके कि हमारे देश में भ्रष्टाचार कितना बेखौफ है।
रामपथ अयोध्या की वो सडक़ है, जहां से होकर देश-दुनिया से आए श्रद्धालु रामलला के दर्शन के लिए जाते हैं। पहली ही बारिश में यह सडक़ कई जगह धंस गई। जगह-जगह हुए गड्ढे बता रहे हैं कि इसका निर्माण सही पैरामीटर पर नहीं हुआ। राम मंदिर के अलावा हनुमान गढ़ी, बिरला धर्मशाला मंदिर और राम की पैड़ी को जोडऩे वाली 13 किलोमीटर की यह सडक़ 13 जगह धंसी है। कहने को इस मामले में 6 अधिकारी सस्पेंड हुए हैं, पर सवाल यही है कि इतने महत्वपूर्ण स्थान में ऐसी लापरवाही या गलती कैसे हो गई?
सवाल तो उठेंगे ही, आखिरकार 844 करोड़ की लागत से बनने वाली यह सडक़ पहली बारिश में ही कैसे खराब हो गई? क्या जल्दबाजी में ऐसा हुआ या फिर निर्माण की गुणवत्ता में कमी रह गई? सडक़ निर्माण में क्या बड़ी खामियां रहीं?
12.94 किमी के रामपथ पर कई गड्ढे तो 8 फिट से ज्यादा गहरे हो गए हैं। यानि सडक़ निर्माण में बेहिसाब पैसा लग गया, लेकिन निर्माण करने वाली कंपनी से लेकर जिम्मेदार अधिकारियों तक ने अपना काम ठीक से नहीं किया।
कहा यह जा रहा है कि बारिश के बाद गाडिय़ों के आवागमन से सडक़ पर जो दबाव पड़ा, उससे गड्ढे हुए। लेकिन सडक़ कोई फूल बिछाने के लिए तो बनाई नहीं गई थी। पहले से पता था कि यहां लाखों लोग आएंगे और वाहन भी चलाए जाएंगे। कुल मिलाकर निर्माण ही घटिया हुआ, जिसका प्रमाण सामने है। अखबार ने जो रिपोर्ट छापी है, उसमें कई कमियां गिनाई गई हैं। जैसे- सीवर लाइन के मेनहोल की जगह सडक़ पर ठीक से रोलिंग नहीं की गई। सडक़ के नीचे पाइपलाइनों का जाल बिछा है। एक दर्जन से ज्यादा यूटिलिटी डक्ट बनाए गए। स्टॉर्म वाटर ड्रेनेज की सफाई प्रॉपर तरीके से नहीं की गई। सडक़ पर बारिश का पानी निकलने के लिए एक पाइपलाइन डाली जाती है, इसे ही स्टॉर्म वाटर ड्रैनेज कहते हैं। एक्सपर्ट्स मानते हैं- अगर डामर रोड पर पानी इक_ा हो जाए, तब भी सडक़ में गड्ढे हो सकते हैं। इसके लिए स्टॉर्म वाटर ड्रेनेज की सफाई जरूरी होती है।
अधिकारी कहते हैं कि सडक़ बनाने के लिए कम समय मिला। रामपथ बनाते समय तय टाइम लाइन से 3 महीने पहले ही सडक़ हैंडओवर करने के लिए कहा गया। इसके कारण सडक़ की सभी लेयर प्रॉपर तरीके से सेट नहीं हो पाईं। ऐसे में बारिश का पानी जैसे ही सडक़ के नीचे गया, सडक़ धंसने लगी। इंजीनियरिंग, प्रोक्योरमेंट एंड कंस्ट्रक्शन के मानकों के अनुसार, इस पर 15 महीने का टाइम मिलना चाहिए था, जो कि कार्यदायी संस्था को सडक़ बनाने के लिए पहले दिया भी गया। दो फेज का काम तो निर्धारित टाइम लाइन के हिसाब से पूरा हुआ।
लेकिन 11 नवंबर, 2023 को अयोध्या में भव्य दीपोत्सव कार्यक्रम होना था। इसे देखते हुए सडक़ निर्माण को तय समय सीमा से पहले पूरा करने का आदेश आ गया। एक चरण का काम जल्दबाजी में पूरा करना पड़ा। इसलिए 30 दिसंबर, 2023 यानी निर्धारित टाइमलाइन से 120 दिन पहले सडक़ का काम पूरा कर हैंडओवर करना पड़ा।
रामपथ के निर्माण में करीब 1050 घरों को पूरा या आंशिक रूप से तोड़ा गया। तब जाकर सडक़ का दो लेन चौड़ीकरण संभव हो पाया। इसमें 350 करोड़ रुपए जमीनों के अधिग्रहण के लिए लोगों को मुआवजा बांटने पर खर्च किए गए। करीब 13 किमी के इस रास्ते में 600 से ज्यादा पेड़ भी थे, जिन्हें काटना पड़ा। इसके अलावा रामपथ के दोनों ओर की दीवारों पर साज सज्जा, पेंटिंग, लाइटिंग के लिए भी 30 करोड़ खर्च किए गए। ये काम अयोध्या विकास प्राधिकरण यानी ने करवाया था।
कुल मिलाकर रामपथ के निर्माण में न केवल लापरवाही बरती गई, अपितु भ्रष्टाचार भी बड़ी मात्रा में होने से इंकार नहीं किया जा सकता। यहां खास बात यह है कि इस रामपथ का उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, संघ प्रमुख मोहन भागवत सहित कई बड़ी हस्तियों को करना था, फिर भी गुणवत्ता का ध्यान नहीं रखा गया। और आज जब हम यह गर्व से कहते हैं कि हमारे पास दुनिया का मुकाबला करने के लिए एक्सपर्ट इंजीनियर हैं, तो महाकाल और रामपथ के बारे में क्या कहेंगे? यह भी कहना गलत नहीं होगा कि हमारे यहां सरकारी सिस्टम में भ्रष्टाचार और लापरवाही की इंतहां आज भी है। इस कदर, कि हम भगवान के काम को भी नहीं छोड़ते। जय सियाराम, जय महाकाल।
– संजय सक्सेना