Editorial
आंकड़े बनाम महंगाई

एक तरफ पूरा देश आने वाले आम बजट की ओर देख रहा है, तो दूसरी ओर महंगाई फिर से आसमान की ओर जाने लगी है। उम्मीदों के इतर जमीनी सच्चाई कड़वी ज्यादा होती है और अभी है भी। सरकारी आंकड़े कहते हैं कि महंगाई कम हो रही है, तो बाजार इसे एकदम नकार देता है। असल में आंकड़ों से जमीनी सच्चाई अगर बयां हो  रही होती, तो इस देश का नक्शा ही कुछ और होता। हम आंकड़ों के आधार पर ही सरकार चलाते हैं और आंकड़ों के आधार पर ही राजनीति की बिसात बिछाते हैं, लेकिन चुनाव में इस सच्चाई को दूसरे मुद्दों से इस तरह ढक दिया जाता है कि मतदाता भ्रमित होकर उनके जाल में फंस जाता है।
आज एक खबर पर नजर गई। ये खबर है- एक अप्रैल 2024 भारतीय वित्त वर्ष का पहला दिन। अरहर की दाल का औसत रेट 149.23 रुपए था। चीनी 44.44 रुपए की एक किलो थी। सरसों का एक लीटर तेल 135.67 रुपए का था, आलू 24.76 रुपए किलो थे, प्याज 32.38 रुपए और टमाटर 32.97 रुपए किलो थे. ये जो दाम आपने सुने हैं ये औसत दाम थे। ये आंकड़े उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय की वेबसाइट पर दिए गए हैं। अब इसी वेबसाइट पर 15 जुलाई के औसत दामों पर नजर डालते हैं. अरहर की दाल 168.75 पर पहुंच गई है, चीनी 45.03 पर, सरसों का तेल 140.82 पर, आलू 37.14 रुपए किलो, प्याज 44.67 रुपए किलो और टमाटर 68.52 रुपए किलो पर पहुंच गए हैं। इसी वेबसाइट पर और भी कई चीजों के दाम दिए गए हैं सरकारी आकंड़े तस्दीक करते हैं कि आलू से लेकर प्याज तक और टमाटर से लेकर तमाम सब्जियां महंगी हो गई हैं। तमाम दालें महंगी हो गई हैं। और ये आंकड़े महंगाई दिखाने के लिए भी काफी हैं।
ये तो थे थोक महंगाई के आंकड़े। अब बात करते हैं रिटेल महंगाई की। 12 जुलाई को रिटेल महंगाई के आंकड़े आए थे। जून के महीने में रिटेल महंगाई भी बढ़ गई। 5.08 प्रतिशत पर पहुंच गई। अप्रैल में ये आंकड़ा  4.85 प्रतिशत का था। और मई में रिटेल महंगाई 4.75 प्रतिशत पर थी। रिपोर्ट बताती है कि खाने-पीने की चीजें महंगी होने की वजह से रिटेल महंगाई बढ़ गई है। खाद्य महंगाई दर 8.69 से बढक़र 9.36 प्रतिशत पर पहुंच गई है। यही नहीं शहरी महंगाई के साथ-साथ ग्रामीण महंगाई भी बढ़ती जा रही है। रिटेल महंगाई हो या फिर थोक महंगाई। दोनों में एक चीज कॉमन है। दोनों रिपोर्ट एक बात पर मुहर लगाती हैं। वो ये कि खाने-पीने की चीजों के दाम बढ़ रहे हैं। खाने-पीने की चीजें महंगी हो रही हैं।
दरअसल महंगाई का पूरा गणित काम करता है मांग और सप्लाई के फॉर्मूले पर। अगर किसी चीज की मांग बहुत अधिक है और सप्लाई कम है तो उस चीज के दाम बढ़ जाएंगे। वहीं अगर किसी चीज की सप्लाई अधिक है और मांग बहुत ज्यादा नहीं है तो ऐसे में उस चीज के दाम कम हो जाएंगे। यानी सब्जियों और दालों की मांग तो ज्यादा है लेकिन सप्लाई उतनी नहीं है। और यही कारण है कि इन चीजों के दामों में उछाल आ गया है। लेकिन आखिर ऐसा क्या हो गया कि सब्जियों और दालों की सप्लाई प्रभावित हो गई?
सरकारी दावों से हटकर देखें तो एक बड़ा कारण है उत्पादन में कमी आना। लेकिन उत्पादन में कमी क्यों आई? दरअसल पिछले काफी वक्त से मौसम ने किसानों का साथ कम दिया है। दालों और अनाजों पर मौसम का असर हुआ है। पिछले करीब एक साल से देश में अलनीनो की स्थिति रही थी। और अब लगातार हो रही बारिश ने भी उत्पादन पर असर डाला है। यही हाल कमोबेश सब्जियों का भी है। सब्जियों का उत्पादन भी काफी प्रभावित हुआ है। इसके बाद बारी आती है सप्लाई की। सप्लाई भी प्रभावित हुई है और इसकी सबसे बड़ी वजह है मानसून। देश के कई हिस्सों में भारी बारिश है।
पहाड़ी इलाकों में भूस्खलन की खबरें रोजाना सामने आ रही हैं। देश का एक बड़ा इलाका बारिश और बाढ़ की चपेट में है। सडक़ें और पुल टूटने की खबरें लगातार सामने आ रही हैं। जलभराव और जलजमाव की खबरें लगातार सामने आ रही हैं। ऐसे में खाने-पीने की चीजों का परिवहन यानि उन्हें एक जगह से दूसरी जगह ले जाना परेशानी वाला काम हो गया है। सडक़ों पर, हाइवे पर, खाने-पीने से लदे ट्रकों को लाना-ले-जाना खासा परेशानी भरा हो गया है। बारिश की वजह से जाम की स्थिति भी पैदा होती हैं। इस वजह से पेट्रोल-डीजल की खपत ज्यादा होती है। यानी परिवहन की लागत बढ़ जाती है। सीधे तौर पर कहें तो सप्लाई बिगड़ गई है, परिवहन लागत बढ़ गई है। इसका सीधा असर हो रहा है हमारी और आपकी जेब पर।
अब जो व्यक्ति बाजार जाता है और सामान खरीदता है, उसी को तो इस सच्चाई का अहसास होगा कि महंगाई वाकई बढ़ी है और उसके बजट पर इसका असर पड़ रहा है। कुछ प्रतिशत ही लोग ऐसे होते हंै, जो ऐसी महंगाई से खुश होते हैं,  क्योंकि वो दाम बढ़ाने वालों की फेहरिस्त में शामिल रहते हैं। वो कालाबाजारी करने वाली सूची में शामिल होते हैं…। खैर। अब बजट का इंतजार भी कर लेते हैं। किसी उम्मीद पर खरा उतरता है, किसकी पर नहीं। लेकिन ये बाजार की महंगाई शायद कोई बजट कम नहीं कर सकता।
ं- संजय सक्सेना

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