नई दिल्ली। भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) ने अपनी 2024-25 की ऑडिट रिपोर्ट में असम सरकार की वित्तीय अनुशासनहीनता से जुड़े गंभीर मामलों को उजागर किया है. रिपोर्ट में बताया गया है कि 13 मामलों में बिना किसी बजट प्रावधान या पुनर्विनियोजन आदेश के 509.59 करोड़ रुपये खर्च किए गए, जो संविधान के अनुच्छेद 204 का सीधा उल्लंघन है.
सरकार को सार्वजनिक धन खर्च करने से पहले कानूनन विधानसभा की मंजूरी लेना अनिवार्य होता है. लेकिन 13 मामलों में ऐसा नहीं किया गया. ये 509.59 करोड़ रुपये ‘सार्वजनिक ऋण और ऋण सेवा’ (Public Debt and Servicing of Debt) मद के तहत खर्च किए गए, जबकि मूल बजट में इसके लिए कोई प्रावधान नहीं था, न ही अनुपूरक स्वीकृति ली गई और न ही कोई पुनर्विनियोजन आदेश जारी किया गया.
कैग ने कहा कि यह केवल कागजी गड़बड़ी नहीं है, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 204 का उल्लंघन है और यह दर्शाता है कि सरकारी विभागों में वित्तीय अनुशासन पर तत्काल ध्यान देने की जरूरत है.
रिपोर्ट में कहा गया, ‘बिना बजट के किया गया खर्च न केवल वित्तीय नियमों का उल्लंघन है, बल्कि यह विधायिका की इच्छा के भी विपरीत है. यह इस बात का भी संकेत है कि सरकारी विभागों में अधिक वित्तीय अनुशासन की आवश्यकता है.’
जवाबदेही से जुड़ी खामियां इससे भी अधिक गंभीर हैं. 31 मार्च 2025 तक कुल 6,929 उपयोगिता प्रमाणपत्र (Utilisation Certificates) जिनकी राशि 23,240.56 करोड़ रुपये थी, लेखा महानियंत्रक के पास जमा नहीं किए गए थे.
कैग ने कहा कि इन प्रमाणपत्रों के बिना यह निर्धारित करना असंभव है कि अनुदान की राशि उसी उद्देश्य के लिए इस्तेमाल हुई या नहीं, जिसके लिए उसे स्वीकृत किया गया था.
रिपोर्ट में जिन पांच प्रमुख विभागों का ज़िक्र किया गया है – उनमें से अकेले वित्त विभाग के ही 4,067.06 करोड़ रुपये के प्रमाण पत्र लंबित थे, जो कि इन सभी विभागों में सबसे अधिक है.
कमजोर वित्तीय नियंत्रण का एक और उदाहरण देते हुए रिपोर्ट में कहा गया कि 31 मार्च 2025 तक 1,222 एब्स्ट्रैक्ट कंटिन्जेंट बिल जिनकी राशि 753.61 करोड़ रुपये थी, उन्हें विस्तृत प्रति-हस्ताक्षरित कंटिन्जेंट बिलों में परिवर्तित नहीं किया गया था. यानी सार्वजनिक खजाने से निकाली गई रकम के लिए कानूनन आवश्यक वाउचर-समर्थित दस्तावेज उपलब्ध नहीं थे.
रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि 2024-25 में एक अनुदान के तहत 604.40 करोड़ रुपये का अतिरिक्त व्यय हुआ, जिसे संविधान के अनुच्छेद 205 के तहत राज्य विधानसभा से नियमित कराना आवश्यक है.
इससे भी अधिक गंभीर बात यह है कि 2006-07 से 2023-24 के बीच किए गए 11,995.69 करोड़ रुपये के अतिरिक्त भुगतान अब तक नियमित नहीं किए गए हैं. यह लंबित मामला लगभग दो दशकों से चला आ रहा है.
अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू पेमा खांडू ने मंगलवार (26 मई) को ड्रग-विरोधी कार्यकर्ता गुमिन मिज़े के कथित हिरासत में उत्पीड़न को लेकर चिंता जताई. यह मामला तब और गरमा गया जब सोशल मीडिया पर पुलिस हिरासत के दौरान उनके शरीर पर चोट के निशान दिखाने वाली कथित तस्वीरें और वीडियो वायरल हो गए, जिससे अरुणाचल प्रदेश और पड़ोसी असम में व्यापक आक्रोश फैल गया.
समाचार एजेंसी के अनुसार, राज्य सरकार ने इस मुद्दे को असम सरकार के समक्ष उठाया है. मुख्यमंत्री खांडू ने कहा कि उन्होंने सोशल मीडिया पर घटना देखने के बाद व्यक्तिगत रूप से हस्तक्षेप किया.
पत्रकारों से बात करते हुए खांडू ने कहा कि अरुणाचल प्रदेश किसी अन्य राज्य की न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप नहीं कर सकता, लेकिन उसने असम सरकार के सामने अपनी गंभीर चिंता स्पष्ट रूप से व्यक्त की है.
उन्होंने कहा, ‘मिज़े पिछले कई वर्षों से यहां नशे के खिलाफ बेहतरीन काम कर रहे हैं. उन्होंने ड्रग तस्करी में शामिल कई लोगों की गिरफ्तारी में भी मदद की है.’
मुख्यमंत्री ने इस घटना को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए कहा कि उन्होंने विशेष रूप से असम सरकार से अनुरोध किया है कि हिरासत के दौरान मिज़े के साथ किसी प्रकार की यातना या दुर्व्यवहार न हो.
गुमिन मिज़े, जो अरुणाचल एंटी-ड्रग वॉरियर्स (एपीएडीडब्ल्यू) के अध्यक्ष हैं, को असम पुलिस ने 20 मई को ईटानगर से गिरफ्तार किया था. यह गिरफ्तारी असम के लखीमपुर जिले के बिहपुरिया पुलिस स्टेशन में दर्ज एक मामले के संबंध में की गई थी.
उन पर भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की कई धाराओं और आर्म्स एक्ट के प्रावधानों के तहत मामला दर्ज किया गया है.
