Aravali में 11 दरारों से थार की धूल पहुंच रही दिल्ली-NCR, पर्वतमाला को लेकर एक्सपर्ट्स ने दी चेतावनी

नई दिल्ली। दुनिया की सबसे प्राचीन पर्वतमाला अरावली की नई परिभाषा को सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी मिलने के बाद लोग इसका विरोध कर रहे हैं। इस बीच, एक्सपर्ट दावा कर रहे हैं कि अरावली में अब तक 11 दरारें हो चुकी हैं। इन्हीं दरारों की वजह से थार की धूल दिल्ली-एनसीआर तक पहुंच रही है। नई परिभाषा से थार का फैलाव दिल्ली-एनसीआर तक होने लगेगा। अरावली को बचाने के लिए पर्यावरण पर काम करने वाली विभिन्न संस्थाओं और एक्टिविस्टों ने भी विरोध दर्ज कर दिया है।

अरावली विरासत जन अभियान के तहत विभिन्न संगठन अपनी बात राज्यसभा और लोकसभा सांसदों तक पहुंचा रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने अरावली पहाड़ियों की नई परिभाषा को मंजूरी दे दी है जिसमें कहा गया है कि वही पहाड़ियां अरावली का हिस्सा होंगी जो कम से कम 100 मीटर की हों। ऐसे में आकलन बता रहे हैं कि 90 प्रतिशत अरावली संरक्षण से बाहर हो जाएंगी। हरियाणा और गुजरात में पहाड़ियां और भी कम ऊंची है।

पर्यावरण कार्यकर्ता कैलाश मीणा के अनुसार पिछले कुछ दशकों में 692 किलोमीटर लंबी अरावली पर्वतमाला का विनाश तेजी से हुई है। खनन से यहां लगभग 12 दरारें खुल गई है। यह दरारें राजस्थान में अजमेर से झुंझुनूं और दक्षिण हरियाणा के महेंद्रगढ़ तक फैली हुई हैं। दरारों से रेगिस्तान की धूल दिल्ली- एनसीआर तक पहुंच रही है।

screenshot 20251222 1533176512583633387882334

फैसले के पीछे सरकार का तर्क
इन फैसले के खिलाफ सरकार और अन्य लोगों के तर्क भी समाने आ रहे है। केंद्र ने कोर्ट में दावा किया है कि अरावली की नई परिभाषा पूरी तरह वैज्ञानिक आधार पर तय की गई है। इस नई परिभाषा से अरावली के संरक्षण और विकास के बीच संतुलन बताया जा सकेगा। तर्क है कि अरावली के लिए एक स्पष्ट परिभाषा की सख्त जरूरत थी। अलग-अलग राज्यों में अरावली की अलग-अलग परिभाषा होने से नीतिगत भ्रम की स्थिति बनी हुई थी।

अरावली संरक्षण पर विरोध प्रदर्शन
गुड़गांव और उदयपुर में पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने अरावली पहाड़ियों की नई ऊचाई-आधारित परिभाषा के खिलाफ विरोध जताया। सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर 2025 में यह परिभाषा स्वीकार की। कार्यकर्ताओं ने चेताया कि इससे खनन, निर्माण और वाणिज्यिक गतिविधियो को बढ़ावा मिल सकता है, जो पारिस्थितिक संतुलन के लिए हानिकारक होगा। उन्होंने अरावली को पूरी तरह संरक्षित क्षेत्र घोषित करने और कड़ी संरक्षण नीति बनाने की मांग की।

Sanjay Saxena

BSc. बायोलॉजी और समाजशास्त्र से एमए, 1985 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय , मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के दैनिक अखबारों में रिपोर्टर और संपादक के रूप में कार्य कर रहे हैं। आरटीआई, पर्यावरण, आर्थिक सामाजिक, स्वास्थ्य, योग, जैसे विषयों पर लेखन। राजनीतिक समाचार और राजनीतिक विश्लेषण , समीक्षा, चुनाव विश्लेषण, पॉलिटिकल कंसल्टेंसी में विशेषज्ञता। समाज सेवा में रुचि। लोकहित की महत्वपूर्ण जानकारी जुटाना और उस जानकारी को समाचार के रूप प्रस्तुत करना। वर्तमान में डिजिटल और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े। राजनीतिक सूचनाओं में रुचि और संदर्भ रखने के सतत प्रयास।

Related Articles