Editorial
सोता शहर और मरता मास्टर प्लान…!

राजधानी का मास्टर प्लान..। तैयार हो गया है, बस एकाध हफ्ते में लागू हो जाएगा…। फिर, आपत्तियां एक बार और बुलवा लो..। वो भी हो गया। फिर मंत्रालय पहुंचने की खबर..। बस आज-कल…। और फिर मामला फुस्स..। ये कहानी है, भोपाल के मास्टर प्लान की। जिसे लागू करने की संभावनाओं की खबरें पिछले दस साल से चल रही हैं। पर, आज तक लागू नहीं हो सका है।  यह खांटी सरकारी काम है और सरकारी काम की रफ्तार क्या होती है, सब जानते हैं। लेकिन इतने कम भी नहीं होना चाहिए कि एक शहर की शक्ल ही बदसूरत हो जाए। अब तो कैग यानि भारत के नियंत्रक एवं लेखा परीक्षक ने भी इस पर टिप्पणी कर दी है। वो भी गंभीर टिप्पणी।
शुक्रवार को सदन में पेश हुई कैग की रिपोर्ट में कहा गया है कि भोपाल के मास्टर प्लान को 20 साल बीत जाने के बाद भी अंतिम रूप नहीं देना जोखिम भरा है। वर्ष 2005 के मास्टर प्लान के वक्त जो जनसंख्या थी, उसमें 100 प्रतिशत से भी अधिक वृद्धि हो गई है। वर्ष 2000 से 2021 के बीच ही अवैध कॉलोनियों की संख्या में 175 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। ऐसे में लगातार भोपाल विकास योजना को टाला जा रहा है। यह सरकार का मनमानीपूर्ण रवैया है।
इसमें सवाल खड़े किए गए कि टीएंडसीपी संचालक जवाब दे रहे हैं कि अगस्त 2009 में मास्टर प्लान 2021 तैयार किया। यह प्रकाशित नहीं हो पाया। शासन ने कहा, इस पर पुनर्विचार करें। 2011 में इसे लौटाया। फिर इसे 2031 के हिसाब से बनाने के लिए कहा गया। फिर, इसे भी फरवरी 2024 में लौटा दिया गया। अब इसे 2047 को ध्यान में रखकर तैयार करना है। इसका प्रकाशन बाकी है। कैग ने कहा कि उज्जैन, जबलपुर, इंदौर और ग्वालियर के मास्टर प्लान के बारे में टीएंडसीपी से आंकड़े व कागज मांगे गए, लेकिन नहीं दिए गए। टीएंडसीपी का नगर निगमों के साथ कोई समन्वय नहीं है। वह ठीक से काम नहीं कर रहा। सिर्फ औपचारिकता निभा रहा है।
कैग ने एक चौंकाने वाला आंकड़ा दिया है। वो ये कि भोपाल में 2001 से 2011 के बीच ही झुग्गियों में ढाई लाख की आबादी बढ़ी है। भोपाल में झुग्गियों की संख्या 182 प्रतिशत, इंदौर में 121 प्रतिशत, ग्वालियर में 62 प्रतिशत और उज्जैन में 27 प्रतिशत बढ़ीं। बार-बार जानकारी होने के बाद भी कार्रवाई नहीं की गई।
कैग रिपोर्ट में बताया गया है कि भोपाल के सेंट फ्रांसिस स्कूल, होटल महेंद्र उत्सव, एसएस क्रिएशन, 200 बेड का अस्पताल, शॉपिंग मॉल ब्लिंग स्क्वायर और मंत्रा इंफ्रास्ट्रक्चर। ग्वालियर के सनराइज इनक्लेव, 7 रिजार्ट हिल्स व आदित्य वल्र्ड स्कूल। इंदौर में ग्राफिक्स बिल्डकॉन और उज्जैन में कला जानकी गोल्ड व आर्थो अस्पताल।
खुली जगह पर कब्जे हैं भोपाल में बीएसएसएस, एनी विला अपार्टमेंट, गोदाम, लीजर वैली अपार्टमेंट, सेंट मोंट फोर्ट स्कूल, तकनीकी प्रशिक्षण केंद्र जाटखेड़ी, समरधा होटल, भोपाल सर्जिकल एंड मैटरनिटी अस्पताल, शॉपिंग मॉल, नोबल मल्टीस्पेशियलिटी अस्पताल। ग्वालियर की 11 संस्थाएं, इंदौर की 17 व उज्जैन की 9 संस्थाएं। तलघर में अतिक्रमण के मामले भोपाल में पलक बारात घर, राजहंस होटल, भोपाल सर्जिकल व मैटरनिटी अस्पताल, ब्लिंग स्क्वायर शॉपिंग मॉल व नोबल मल्टी स्पेशियलिटी हैं। भोपाल, इंदौर, ग्वालियर, जबलपुर व उज्जैन में 259 करोड़ आश्रय शुल्क वसूला, लेकिन कहां खर्च किया कोई रिकॉर्ड नहीं।
कैग की रिपोर्ट में बताया गया कि सीएम के प्रस्तावित दौरे की आड़ में पीडब्ल्यूडी ने नियमों को दरकिनार कर 7 सडक़ें बिना नोटिस इनवाइटिंग टेंडर (एनआईटी) के बनवा दीं। इनकी लागत 46 लाख से 5.10 करोड़ रुपए तक रही। इन कार्यों के लिए न डीपीआर तैयार की गई और न हटेंडर जारी किए गए। काम उसी ठेकेदार को सौंप दिया गया, जो पहले से अन्य सडक़ें बना रहा था। जनवरी 2002 के सरकारी नियमों के अनुसार स्वीकृत कार्यों के अलावा बिना एनआईटी अतिरिक्त सडक़ का निर्माण नहीं किया जा सकता।
कैग की रिपोर्ट कुछ सैम्पल सर्वे के आधार पर तैयार की जाती है। राजधानी के हाल तो ये हैं कि पिछले बीस साल में इस कदर अनियमित विकास हुआ है, झुग्गी बस्तियां तानना तो यहां की जैसे परंपरा ही हो गई है, तमाम सरकारी जमीनों पर अतिक्रमण हुए हैं। रसूखदारों के दर्जनों नहीं, सैकड़ों अवैध निर्माण हैं। जिन जमीनों पर निर्माण नहीं किया जा सकता, वहां भी सैकड़ों निर्माण हैं, बंगले-कोठियां और बहुमंजिला भवन तने हुए हैं। तलघरों में निर्माण की बात करें तो शहर के नब्बे प्रतिशत बहुमंजिला भवन और काम्प्लेक्स अवैध हैं। लेकिन नियम कानून का पालन कराने वाले खुद ही कानून का उल्लंघन करते और कराते हैं, तो ऐसा ही होगा।
फिलहाल बड़ी संख्या में लोग मास्टर प्लान का इंतजार कर रहे हैं, तो उनकी संख्या भी कम नहीं है, जो इसे टलवाने की ताकत रखते हैं। किसकी नजरें कहां हैं, सब जानते हैं। लोग अपना हित देख रहे हैं। स्वार्थ साधने में जुटे हैं। शहर का नक्शा बिगड़ रहा है। क्या फर्क पड़ता है। कैग ने टिप्पणी कर दी है। करता रहे। ये टिप्पणी कुछ लोगों के लिए गंभीर होगी, सरकार ऐसी दर्जनों गंभीर टिप्पणियां कचरे के हवाले करती आई है, इसका भी यही हश्र होगा। कौन क्या कर लेगा? वैसे भी सुस्त शहर से किसी तरह की उम्मीद भी नहीं की जा सकती। गैस त्रासदी के बाद भी नहीं जागे..!

Sanjay Saxena

BSc. बायोलॉजी और समाजशास्त्र से एमए, 1985 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय , मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के दैनिक अखबारों में रिपोर्टर और संपादक के रूप में कार्य कर रहे हैं। आरटीआई, पर्यावरण, आर्थिक सामाजिक, स्वास्थ्य, योग, जैसे विषयों पर लेखन। राजनीतिक समाचार और राजनीतिक विश्लेषण , समीक्षा, चुनाव विश्लेषण, पॉलिटिकल कंसल्टेंसी में विशेषज्ञता। समाज सेवा में रुचि। लोकहित की महत्वपूर्ण जानकारी जुटाना और उस जानकारी को समाचार के रूप प्रस्तुत करना। वर्तमान में डिजिटल और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े। राजनीतिक सूचनाओं में रुचि और संदर्भ रखने के सतत प्रयास।

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