संपादकीय….
भटकता साहित्य, बिखरता समाज

संजय सक्सेना
लंबे समय बाद एक साहित्यिक कार्यक्रम में जाने का अवसर मिला। कार्यक्रम सुप्रसिद्ध कहानीकार मालती जोशी की स्मृति में आयोजित था और इसमें कई साहित्यकार, पटकथा लेखक उपस्थित रहे। देखा जाए तो इस तरह के अनेक कार्यक्रम होते रहते हैं। लेकिन जब प्रदेश की एक सुपरिचित साहित्यक हस्ती को लेकर कार्यक्रम हो और उसमें उनके साहित्य की विवेचना, विमर्श और विश्लेषण हो, तो वह स्वयं ही विशेष हो जाता है।
यह कार्यक्रम संपादकीय का विषय क्यूं हो सकता है, यह सवाल यहां उठ सकता है। इसके उत्तर में हम कार्यक्रम के कुछ अंश और फिर अपना उपसंहार देना चाहेंगे। कार्यक्रम में साहित्यकार मालती जोशी के जीवन को लेकर चुनिंदा साहित्यकारों और कार्यक्रम के मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित पटकथा लेखक अतुल तिवारी ने अपने संस्मरण सुनाए। साथ ही उनके साहित्य, उनकी कहानियों की विवेचना की।
्रसबसे महत्वपूर्ण बात इसमें यह है कि स्वर्गीय मालती जोशी का सीधा संबंध मध्यप्रदेश से रहा। वह इंदौर में पैदा हुईं, जीवन का बड़ा हिस्सा भोपाल में भी गुजारा। सो, प्रदेश की माटी की महक उनके साहित्य में खूब अच्छी तरह अनुभव की जा सकती है। विषय इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि जिस देश में कहानियां और कथाएं अधिकांश धार्मिक चरित्रों को लेकर सुनाई जाती रहीं हैं। जातक कथाओं का दौर भी रहा। और भी कई बातें रहीं।
परंतु एक महत्वपूर्ण मुद्दा यह था कि पूर्ववर्ती कहानियों में हमारे परिवारों का, हमारे समाज का जस का तस चित्रण बहुत कम हुआ करता था। प्रेमचंद जैसे साहित्यकारों ने इन मुद्दों को उठाया, परंतु महिला साहित्यकारों की कलम इन पर बहुत कम चली है। मालती जोशी की कहानियों की विशेषता यही थी कि उनमें हमारे सामान्य और मध्यम वर्गीय परिवारों के जीवन का सजीव चित्रण हुआ करता था। कहानी सुनते-सुनते पूरा परिदृश्य सामने आ ही जाता है। और ऐसा आता है कि हम उसमें डूब जाते हैं। हम उनमें अपने परिवार, आस-पड़ौस को देखने लगते हैं।
इस तरह के आयोजनों की एक खास बात ये भी रहती है कि इसमें सामान्य तौर पर आमंत्रित लोग ही आते हैं। दो-चार लोग ही ऐसे होते हैं, जो विषय से स्वयं को जुड़ा पाते हैं तो चले आते हैं। देखा जाए तो ऐसे कार्यक्रमों का खास प्रचार भी नहीं होता है। हो भी कैसे, कहीं न कहीं आयोजकों की व्यवस्थाएं सीमित रहती हैं। खैर, मालती जोशी की शख्शियत का जब विस्तार हुआ तो वह राष्ट्रीय स्तर की कहानीकार बन गईं। उनकी कहानियों पर दूरदर्शन में एक सीरीज की कुछ कडिय़ां भी बनीं, जो लोगों द्वारा पसंद भी की गईं। पाठ्य पुस्तकों में भी उनकी कहानियां शामिल हुईं।
एक कहानी का पाठ भी इस कार्यक्रम में हुआ। उस कहानी ने जैसे हमारे परिवारों की पूरी की पूरी तस्वीर उतार कर रख दी। परिवार को चलाने के साथ ही अनुशासन और कई बार इस अनुशासन के चलते कुछ सदस्यों की भावनाएं कैसे दब कर रह जाती हैं, उनका विस्फोट कैसे होता है, यह बात महत्वपूर्ण है।
आज के समाज में भी इस तरह के कुछ नहीं, अनेक परिवार हैं और जब तक हमारे समाज में परिवार व्यवस्था है, तब तक शायद इस तरह भावनाओं और संवेदनाओं की बलि चढऩा स्वाभाविक ही रहेगा। फिर, इन कहानियों की क्या प्रासंगिकता है? यह सवाल सबसे महत्वपूर्ण है। कहानी के कुछ पात्र परिवार के लिए किसी की भावनाओं को यदि दबाते हैं, तो वह किसी का भविष्य बनाने के लिए ही होता है।
उनकी कहानियों में आज के परिवार हैं, यह तय है। लेकिन आज जिस तरह से परिवारों का विखंडन हो रहा है, बिखराव हो रहा है, वो अधिक पीड़ा दायक है। आज हम जिस समाज में रह रहे हैं, वह लगभग अराजक स्थिति में पहुंचता जा रहा है। सीमित परिवारों में हो सकता है कि हम एक-दूसरे की भावनाओं को आसानी से समझ जाएं, परंतु यह तय नहीं है कि स्वयं के समर्पण की भावना हममें पैदा हो। और परिवार की परिभाषा में भले ही कुछ हो, लेकिन जब तक समर्पण और एक-दूसरे के प्रति सहयोग की भावना नहीं होगी, वह परिवार नहीं कहा हा सकता।
कुछ लोग जब ये कहते हैं कि आज मकान तो बहुत बन रहे हैं, लेकिन घर कम होते जा रहे हैं, तो ये घर ही परिवार का सही शब्द होता है। आज दर्जनों नहीं, सैकड़ों तथाकथित साहित्यकार, कहानीकार और कवि भी, दूसरों के विषय लेकर अपने कुछ भाव भरकर मंचीय आनंद उठाते हैं। कई तो ऐसे हैं कि हिंदी शब्दकोष से उनका खास वास्ता नहीं है, और वे प्रसिद्धि के आयाम चढ़ते जाते हैं। और हां, आज विचारधारा भी बहुत महत्वपूर्ण हो गई है। हम किसी एक विचारधारा से प्रभावित, उससे ओतप्रोत साहित्य लिखते हैं, या किसी की कापी भी कर लेते हैं, तो साहित्यकार, कवि बन जाते हैं। अपना एक गुट बना लेते हैं और आयोजनों की श्रृंखलाओं के माध्यम से समाज और मीडिया को प्रभावित करने में सफल से हो जाते हैं। अब तो आर्टीफिशियल इंटेलीजेंस यानि एआई ने सब कुछ और भी सरल कर दिया है। किसी कहानी-कविता का शीर्षक लिखकर वैसी ही कहानी या कविता निकाली और अपने नाम से चेंप दी। वाहवाही बटोर ली।
विषय इसीलिए महत्वपूर्ण है कि आज हमारे समाज को यथार्थवाद की आवश्यकता अधिक है। साहित्य को समाज का दर्पण यदि कहा जा रहा है तो यह दर्पण धुंधला हो रहा है। समाज के गिरते मूल्यों की ओर ध्यान कौन दिलाएगा? कौन सही चित्र प्रस्तुत करेगा समाज और परिवारों का? जहां एक-दूसरे की टांग खिंचाई का वातावरण हो, जहां विचारधारा ही आपके आगे बढऩे का माध्यम बन जाए, वहां परिवार और समाज कैसे मूल्यों पर टिक सकेगा? यही हमारी मूल भावना है। जब साहित्य ही रास्ता भटक जाए, तो समाज का मार्गदर्शन कौन करेगा, कैसे होगा?


