संपादकीय
थोथा चना बाजे घना

संजय सक्सेना
एक पुरानी कहावत है, झूठ को तेज-तेज बोलो और बार-बार बोलो, लोग उसे सच मानने लगेंगे। यह प्रयोग सामान्य तौर पर राजनीति में ज्यादा किया जाता है और इन दिनों तो ऐसा ही हो रहा है। अब एक ताजा मनोवैज्ञानिक शोध में खुलासा हुआ है कि जो लोग अपनी राजनीतिक विचारधारा को लेकर सबसे ज्यादा मुखर और आक्रामक होते हैं, असल में उन्हें जमीनी तथ्यों की जानकारी सबसे कम होती है। सीधी बात है, उसमें तथ्य कम और फालतू बातें अधिक होती हैं।
हाल ही में सार्वजनिक हुए जर्नल ऑफ एक्सपेरिमेंटल साइकोलॉजी एप्लाइड में प्रकाशित अध्ययन यह बताता है कि राजनीति में कम जानकारी रखने वाले लोग अक्सर खुद को बड़ा जानकार समझते हैं। मनोविज्ञान में इसे डनिंग-क्रूगर इफेक्ट कहते हैं। यह ऐसा मानसिक भ्रम है जिसमें व्यक्ति अपनी अयोग्यता पहचान नहीं पाता और खुद को दूसरों से बेहतर समझने लगता है।
इस अध्ययन में शामिल लोगों को राजनीति के 60 मुश्किल सवालों का सामना करना पड़ा। इसके परिणाम चौंकाने वाले आये हैं। इसमें सामने आया कि  औसतन हर व्यक्ति खुद को राजनीति का बड़ा विशेषज्ञ समझ रहा था, पर दो समहों का प्रदर्शन सबसे खराब रहा। एक वे, जिन्हें राजनीति की वाकई बहुत कम समझ थी, और दूसरे वे जो एक खास विचारधारा की ओर झुकाव रखते थे। यह रिसर्च पुष्टि करती है कि शोर मचाने वाले हर पॉलिटिकल एक्सपर्ट यानि राजनीतिक विशेषज्ञ के पास सटीक जानकारी हो, यह जरूरी नहीं, अपितु कम जानकारी भी इंसान को अति आत्मविश्वासी और अधिक मुखर बना देती है। हमारे यहां इससे जुड़ी कहावत है-थोथा चना, बाजे घना।
इदाहो स्टेट यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर एरिका फुल्टन कहती हैं, अध्ययन में राजनीतिक ज्ञान का मतलब केवल पक्के तथ्यों से था। जैसे संसद का स्पीकर कौन है या कानून पास कराने के लिए कितने वोट जरूरी हैं। इसमें कोई भी भावनात्मक या भडक़ाऊ जानकारी शामिल नहीं थी। यह स्पष्टीकरण इसलिए जरूरी है क्योंकि पूरा नतीजा सिर्फ तथ्य पर आधारित है, न कि किसी की निजी राय या विचारधारा पर। मुमकिन है कि शोर-शराबे या उकसाने वाले माहौल में लोगों के जवाब और उनके आत्मविश्वास के नतीजे अलग हों।
प्रो. एरिका कहती हैं कि रिसर्च टीम का उद्देश्य किसी खास समूह को नीचा दिखाना नहीं है। उनका कहना है कि चाहे आप किसी भी पार्टी को पसंद करें, असली फर्क इस बात से पड़ता है कि आप तथ्यों को कितना जानते हैं। वोट देने से पहले भी यही बात ध्यान रखनी जरूरी है। लेकिन हमारे देश में ऐसा नहीं होता, या होता है तो बहुत कम।
हम आज जिस सोशल मीडिया को ज्यादा एथेंटिक और विश्वसनीय मानते हैं, वो भी झूठ का खजाना बनता जा रहा है। असल में सोशल मीडिया पर या किसी एप पर जो जानकारी अधिक डाली जाती है, उसे ही सच मानकर परोस दिया जाता है। हमारे देश में तो इतिहास से लेकर भूगोल और अन्य तमाम सच्चाइयों को झुठलाते हुए ऐसी जानकारी पेश की जा रही है, जिसका कोई सिर-पैर नहीं। तथ्यहीन जानकारियों के सहारे देश की राजनीति चल रही है, ऐसा विशेषज्ञों का मानना है।
एक बात और, हमारे देश में एक चलन ये भी हो गया है कि दूसरे देश में हुए अध्ययनों और शोधों को या तो गलत बताया जाता है, या फिर कई बार उसे राष्ट्रविरोधी बताते हुए एक तरफ पटक दिया जाता है। कई पढ़े-लिखे लोग भी गलत जानकारियों को सही मानकर चलने लगे हैं और निश्चित तौर पर यही कारण है कि हमारा सामाजिक माहौल एकदम बिगडऩे लगा है। जो अध्ययन सामने आया है, वो हमारे देश की वर्तमान राजनीति पर एकदम फिट बैठता है, यह बात और है कि लोग इसे भी सिरे से नकार देंगे।
अपनी कहावतें कभी गलत नहीं होतीं। यह रिसर्च अभी हाल ही में हुई है, हमारे यहां तो लोगों ने सालोंसाल रिसर्च करके कहावतें बनाई हैं। तभी तो थोथा चना बाजे घना की कहावत हर जगह लागू हो जाती है। इसका शाब्दिक अर्थ यह है कि किसी बरतन मे यदि चने कम भरे हों, तो हिलाने पर बरतन से अधिक आवाजें आएंगी। एक कहावत और, अधजल गगरी छलकत जाय। यानि कम ज्ञान वाला व्यक्ति ज्यादा बोलता है।

Sanjay Saxena

BSc. बायोलॉजी और समाजशास्त्र से एमए, 1985 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय , मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के दैनिक अखबारों में रिपोर्टर और संपादक के रूप में कार्य कर रहे हैं। आरटीआई, पर्यावरण, आर्थिक सामाजिक, स्वास्थ्य, योग, जैसे विषयों पर लेखन। राजनीतिक समाचार और राजनीतिक विश्लेषण , समीक्षा, चुनाव विश्लेषण, पॉलिटिकल कंसल्टेंसी में विशेषज्ञता। समाज सेवा में रुचि। लोकहित की महत्वपूर्ण जानकारी जुटाना और उस जानकारी को समाचार के रूप प्रस्तुत करना। वर्तमान में डिजिटल और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े। राजनीतिक सूचनाओं में रुचि और संदर्भ रखने के सतत प्रयास।

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