संपादकीय…
नीति आयोग की रिपोर्ट

संजय सक्सेना
नीति आयोग की ताजातरीन रिपोर्ट के अनुसार, पिछले दो दशकों में भारतीय माता-पिता का झुकाव सरकारी के बजाय प्राइवेट स्कूलों की तरफ तेजी से बढ़ा है। हालांकि, शिक्षा के क्षेत्र में प्राइवेट सेक्टर की इस तेज वृद्धि ने गुणवत्ता, समानता और रेगुलेशन को लेकर भी कई गंभीर चिंताएं पैदा कर दी हैं। लेकिन सरकारी व्यवस्थाओं पर भी सवालिया निशान उठने लगे हैं। कहीं न कहीं ऐसा लगता है कि सरकार ही शिक्षा के निजीकरण को प्रोत्साहित कर रही है। इस चक्कर में निजी शिक्षा माफिया हावी होता जा रहा है।
यह बात सही है कि किसी भी देश की अर्थव्यवस्था और उसका भविष्य शिक्षा क्षेत्र के बुनियादी ढांचे पर निर्भर करता है, लेकिन वर्तमान में भारत का स्कूली शिक्षा सिस्टम एक तरह से ढहता दिखाई देने लगा है। इस संबंध में नीति आयोग की रिपोर्ट के आंकड़े क्या कहत हैं, यह देखते हैं। इन आंकड़ों के अनुसार, पिछले दो दशकों में सरकारी स्कूलों में प्रवेश में भारी गिरावट आई है। साल 2005 में जहां 71 प्रतिशत छात्र सरकारी स्कूलों में पढ़ते थे, वहीं वर्ष 2024-25 में यह आंकड़ा गिरकर मात्र 49.24 प्रतिशत रह गया है। इसके विपरीत, अब माध्यमिक शिक्षा के स्तर पर 44.01 प्रतिशत संस्थान प्राइवेट स्कूलों के रूप में संचालित हो रहे हैं।
सवाल उठता है कि अभिभावक सरकारी स्कूलों के मुकाबले प्राइवेट स्कूलों को क्यों चुन रहे हैं? तो यह समझ लें कि जब सरकारी स्कूलों में तमाम अव्यवस्थाओं के साथ ही उनके परिणाम भी बेहतर नहीं आते हों, तो यहां मजबूरी में ही लोग बच्चों को प्रवेश दिलाते हैं। दूसरी बात यह भी है कि एक धारणा बन चुकी है। अभिभावकों का मानना है कि प्राइवेट स्कूलों में बच्चों को बेहतर अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा, कड़ा अनुशासन और भविष्य में रोजगार के अधिक बेहतर अवसर मिलते हैं। इसी कारण वे प्राइवेट संस्थानों को प्राथमिकता दे रहे हैं।
प्राइवेट स्कूलों में शिक्षा के स्तर को लेकर नीति आयोग की रिपोर्ट आगाह करती है कि अभिभावकों की उम्मीदें हमेशा जमीनी परिणामों से मेल नहीं खातीं। कम फीस वाले प्राइवेट स्कूलों (एलएफपी) में स्थिति चिंताजनक है, जहां कक्षा 5 के 35 प्रतिशत छात्र कक्षा 2 की किताब भी नहीं पढ़ सकते, जबकि 60 प्रतिशत छात्र बुनियादी भाग का सवाल हल नहीं कर पाते। इसके अलावा, ऐसे कई स्कूल शिक्षा के अधिकार (आरटीई) अधिनियम के बुनियादी मानकों को पूरा नहीं करते और वहां टॉयलेट, खेल के मैदान और साफ पीने के पानी जैसी जरूरी सुविधाओं का अभाव है। इन स्कूलों में शिक्षकों की भर्ती अक्सर अनौपचारिक होती है, और उन्हें कम वेतन तथा बिना जॉब सिक्योरिटी के काम करना पड़ता है, जिसका सीधा असर पढ़ाई की गुणवत्ता पर पड़ता है।
सरकारी स्कूलों की बात करें तो देश भर के लगभग 14 लाख स्कूलों में करीब 1.01 करोड़ शिक्षक कार्यरत हैं। छात्र-शिक्षक अनुपात में सुधार के बावजूद, ग्रामीण और पिछड़े इलाकों में शिक्षकों की भारी कमी और उनके नौकरी छोडऩे की दर बहुत अधिक है। रिपोर्ट सबसे बड़ी चिंता सिंगल-टीचर स्कूल को मानती है। वर्तमान में 1 लाख से अधिक स्कूल, जो कुल स्कूलों का 7 प्रतिशत से ज्यादा हैं, केवल एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं, जिससे छात्रों को सीखने के सार्थक अवसर नहीं मिल पाते। साथ ही, शिक्षकों की अनुचित तैनाती, कठिन कार्य परिस्थितियां, प्रशासनिक बोझ और विषय की अपर्याप्त विशेषज्ञता जैसी कई चुनौतियां मौजूद हैं।
तकनीकी कौशल को बढ़ावा देने के लिए शिक्षा मंत्रालय ने अक्तूबर 2025 में घोषणा की है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 और एनसीएफ-एसई-2023 के तहत कक्षा 3 से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) और कंप्यूटेशनल थिंकिंग को एक अनिवार्य कौशल के रूप में पढ़ाया जाएगा। सीबीएसई और एनसीईआरटी इसका पाठ्यक्रम विकसित करेंगे। लेकिन दूसरी तरफ रिपोर्ट यह भी मानती है कि बुनियादी ढांचे की कमी और शिक्षकों के पूरी तरह तैयार न होने के कारण इन नए विषयों को प्रभावी ढंग से लागू करना एक बड़ी चुनौती साबित हो सकता है। यह व्यावहारिक मुद्दा है, लेकिन सरकारों में बैठे लोग शायद जानबूझकर इसे अनदेखा कर रहे हैं।
नीति आयोग यह भी कहता है कि केवल प्राइवेट स्कूलों की संख्या बढऩा सफलता की गारंटी नहीं है। नीति निर्माताओं को रेगुलेशन, शिक्षकों की ट्रेनिंग और इंफ्रास्ट्रक्चर की कमियों पर तुरंत ध्यान देना होगा ताकि देश के हर छात्र को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिल सके। यह भी अपनी जगह सही है। कई जगह सरकारी स्कूलों के बच्चे निजी शिक्षा संस्थानों के मुकाबले बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं। निजी संस्थान एक तरह से शिक्षा माफिया की शक्ल ले चुके हैं, जो अभिभावकों में स्टेटस का भाव पैदा करके कथित प्रतिष्ठित स्कूलों में बच्चों को पढ़ाना प्रतिष्ठा का प्रश्न ही बना लेते हैं।
दिल्ली में कुछ समय पहले सरकारी स्कूलों में एक माडल लागू किया गया था। इस माडल ने देश ही नहीं, पूरी दुनिया में एक नया संदेश दिया था। उन स्कूलों ने निजी संस्थानों को मीलों पीछे छोड़ दिया था। निजी स्कूलों में आज की तारीख में न केवल अभिभावकों को ब्लैकमेल तक किया जाता है, अपितु शिक्षकों का भी शोषण होता है। ये केवल और केवल व्यवसाय करते हैं, पैसे कमाना ही इनका ध्येय है। बात नीति आयोग की है, तो उसकी रिपोर्ट काफी कुछ सही लगती है, लेकिन यहां सवाल यह भी तो उठता है कि चाहे सीएजी हो या नीति आयोग, इनकी रिपोर्ट पर सरकारें कितना अमल करती हैं? कई बार तो इन्हें देखा तक नहीं जाता, एक तरफ पटक दिया जाता है इन्हें। कंप्यूटर में भी इनका महत्व एक फोल्डर से ज्यादा नहीं होता।



