MP : नर्मदा की धार मोड़कर रेत का परिवहन, 24 घंटे चल रही मशीनें, रोज 100-150 डंपर ढो रहे रेत

भोपाल। मध्य प्रदेश में अवैध रेत खनन को लेकर चिंताजनक तस्वीर सामने आ रही है। जब एक ओर सुप्रीम कोर्ट ने चंबल क्षेत्र में अवैध खनन पर सख्त टिप्पणी की है, वहीं दूसरी ओर नर्मदा और अन्य नदियों में बड़े पैमाने पर मशीनों के जरिए खनन जारी होने के आरोप लग रहे हैं।

प्रदेश में नर्मदा और उसकी सहायक नदियों में बड़े पैमाने पर अवैध रेत खनन जारी है। जबलपुर, नरसिंहपुर और कटनी जैसे जिलों में रेत माफिया खुलेआम नदियों से रेत निकाल रहे हैं। लेकिन कार्रवाई के नाम पर एकाध डम्पर पकड़ लिया जाता है, बाकी रेत ढोते रहते हैँ।

प्रमुख आरोप और तथ्य
जबलपुर जिले के बेलखेड़ा क्षेत्र के हीरापुर-अमोदा स्थित नर्मदा घाट पर कथित रूप से हाईटेक पनडुब्बी जैसी मशीनों, पोकलेन और जेसीबी के जरिए रेत निकाली जा रही है।
निकाली गई रेत को नदी किनारे जमा कर हाइवा वाहनों में भरकर जबलपुर और आसपास के जिलों में भेजा जा रहा है।
स्थानीय लोगों के अनुसार यह नेटवर्क नादिया घाट से मालकछार, बेलखेड़ी, पावला घाट होते हुए नरसिंहपुर सीमा तक फैला हुआ है।
आरोप है कि नदी की प्राकृतिक धारा को मोड़कर अस्थायी रैंप बनाए गए हैं, जिससे भारी वाहन सीधे नदी के भीतर तक पहुंच रहे हैं।
घाटों पर निगरानी के लिए युवकों की तैनाती की बात भी सामने आई है, जो बाहरी लोगों या प्रशासनिक गतिविधियों की सूचना तत्काल खनन नेटवर्क तक पहुंचाते हैं।

कटनी में भी बड़े पैमाने पर खनन के आरोप
विजयराघवगढ़ क्षेत्र में महानदी से प्रतिदिन 100 से 150 डंपर रेत के अवैध परिवहन का दावा स्थानीय लोगों द्वारा किया जा रहा है।
प्रशासन द्वारा पहले खदानों को सरेंडर करने के निर्देश और ट्रैक्टर-ट्रॉलियों पर कार्रवाई के बावजूद बड़े वाहनों से परिवहन जारी रहने के आरोप हैं।
विपक्ष का आरोप
कांग्रेस के पूर्व विधायक Sanjay Yadav ने आरोप लगाया है कि नर्मदा के अलावा हिरण नदी में भी बड़े पैमाने पर अवैध खनन हो रहा है। उनका कहना है कि प्रशासनिक कार्रवाई मुख्य रूप से मजदूरों और छोटे वाहन चालकों तक सीमित रहती है, जबकि कथित खनन माफिया और नेटवर्क संचालकों तक कार्रवाई नहीं पहुंचती।

पर्यावरणीय प्रभाव
विशेषज्ञों के अनुसार अनियंत्रित रेत खनन से:
नदी की धारा और प्रवाह प्रभावित होता है।
जलस्तर में गिरावट आ सकती है।
नदी तटों का कटाव बढ़ता है।
जलीय जीवों और पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुंचता है।
पुलों और अन्य संरचनाओं की स्थिरता पर भी असर पड़ सकता है।

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Sanjay Saxena

BSc. बायोलॉजी और समाजशास्त्र से एमए, 1985 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय , मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के दैनिक अखबारों में रिपोर्टर और संपादक के रूप में कार्य कर रहे हैं। आरटीआई, पर्यावरण, आर्थिक सामाजिक, स्वास्थ्य, योग, जैसे विषयों पर लेखन। राजनीतिक समाचार और राजनीतिक विश्लेषण , समीक्षा, चुनाव विश्लेषण, पॉलिटिकल कंसल्टेंसी में विशेषज्ञता। समाज सेवा में रुचि। लोकहित की महत्वपूर्ण जानकारी जुटाना और उस जानकारी को समाचार के रूप प्रस्तुत करना। वर्तमान में डिजिटल और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े। राजनीतिक सूचनाओं में रुचि और संदर्भ रखने के सतत प्रयास।

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