संजय सक्सेना
आखिर 21 साल से भोपाल का मास्टर प्लान लागू क्यों नहीं हो पा रहा है? इक्कीस सालों में क्या कुछ नहीं बदल जाता, और भोपाल में क्या नहीं बदला? तमाम सीमाओं से बाहर पसरता जा रहा है शहर। तालाबों से लेकर घने जंगलों तक को अपनी बांहों में समेट चुके हैं हम। उनकी बर्बादी भी देखते जा रहे हैं। लेकिन शहर का नियोजन किस आधार पर होना है, उसका ही अता-पता नहीं।
यह हाल मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल का है। एक बार फिर मास्टर प्लान पर बैठक हुई। और, सही बात तो यह है कि दिशा के नाम से हुई इस बैठक का नतीजा भी वही ढाक के तीन पात रहा। तू-तू, मैं-मैं और हंगामे में उलझ कर बैठक दिशाहीन हो गई। वैसे भी पूर्व की जिन बैठकों में ऐसा नहीं भी हुआ, उनका भी तो कोई नतीजा नहीं निकला। हर बार मास्टर प्लान का प्रस्ताव रखा जाता है और हर बार उसमें कुछ संशोधन के प्रस्ताव के बाद वापस कर दिया जाता है।
बैठक की बात करें तो इसमें यह बताया गया है कि भोपाल विकास योजना-2031 का मसौदा रद्द नहीं किया गया था। इसे शासन को भेजा गया था, लेकिन राज्य सरकार ने इसमें कुछ बदलावों के निर्देश देकर वापस भेजा था। सरकार का निर्देश था कि इस प्लान को मौजूदा आबादी और वर्ष 2047 की जरूरतों के हिसाब से अपडेट किया जाए। अब यह संशोधित प्लान पूरी तरह तैयार है, लेकिन इसे लागू किया जाना अभी बाकी है।
यानि देखा जाए तो इक्कीस साल से प्रशासनिक गलियारों में भटक रहे मास्टर प्लान का मसौदा तो पुराना ही है, बस उसमें हर बार संशोधन का प्रस्ताव देकर उलझाया जाता रहा है। यहां यह भी कहा गया कि बड़ा तालाब कभी 39 वर्ग किमी में था, लेकिन अवैध कब्जों के कारण यह सिमटकर 29 वर्ग किमी बचा है। इसके संरक्षण के लिए बैठक में सर्वसम्मति से भोज वेटलैंड प्राधिकरण बनाने का प्रस्ताव पास किया गया है जो अंतिम फैसले के लिए राज्य सरकार को जाएगा। प्रस्ताव के मुताबिक, इस प्राधिकरण के अध्यक्ष संभागायुक्त होंगे। इसमें भोपाल और सीहोर के कलेक्टर, जिला पंचायत के सीईओ, महापौर और स्थानीय विधायक सदस्य के रूप में शामिल रहेंगे। और, इन प्रस्तावों की फाइल फिर चलती रहेगी, कमरा-दर-कमरा, टेबल-दर टेबल। फिर एक बैठक बुला ली जाएगी, फिर यही होगा…।
मास्टर प्लान के बीच में भोपाल में स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट लागू किया गया। यह केंद्र की महत्वाकांक्षी परियोजना है, लेकिन इस पर सत्तापक्ष के विधायक ने ही गंभीर सवाल उठा दिए। यहां तक कह दिया कि स्मार्ट सिटी ने भोपाल का नाश कर दिया है। यहां बड़ी-बड़ी इमारतें तो खड़ी कर दी, लेकिन उनमें मूलभूत सुविधाओं का अभाव है। लोग लिफ्ट में फंस रहे हैं, कम्युनिटी हॉल तक नहीं बनाया और दशहरा मैदान का भी सत्यानाश कर दिया गया है।
विधायक गलत नहीं कह रहे हैं। लेकिन सवाल यह भी उठ रहा है कि भले ही सत्तापक्ष के ही विधायक क्यों न हों, उनकी सुन कौन रहा है? ये बात कड़वी है, लेकिन सच है। और यदि भोपाल की स्मार्ट सिटी की बात करें तो इसमें एक तो करोड़ों का भ्रष्टचार हुआ। पुराना जंगल काट दिया गया, उसकी जगह दस प्रतिशत भी हरियाली प्रशासन नहीं ला सका। और भोपाल के एक महत्वपूर्ण हिस्से की पहचान ही खत्म कर दी गई। यहां स्मार्ट के नाम पर केवल महंगे प्लाट और ऊंची इमारतें दिख रही हैं, सडक़ तक भ्रष्टाचार का सबूत दे रही है चीख-चीख कर।
कहावत है कि तालाब का ठहरा हुआ पानी पीने के कारण भोपाल के लोग भी ठहरी हुई मानसिकता के हो गए हैं। इन्हें सहनशील भी कहा जा सकता है। क्योंकि ये कोई तीन दशक से भोपाल की हरियाली से लेकर इसकी पहचान बड़ी झील से लेकर आधा दर्जन से अधिक तालाबों को बर्बाद होते हुए बड़े आराम से देखते आ रहे हैं। पिछले 21 साल से बिना मास्टर प्लान के शहर का अनियमित और अराजक विस्तार देख रहे हैं, लेकिन उम्मीद अब भी नहीं छोड़ी। हर कुछ महीने बाद प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में कुछ खलबली होती है, औपचारिक बैठक बुलाई जाती है और शहर को बता दिया जाता है कि बस… अब मास्टर प्लान आने ही वाला है।
इस बार भी ऐसी ही उम्मीद जगी थी। जिला विकास समन्वय एवं निगरानी समिति यानी दिशा की बैठक थी। लगा कि शहर के भविष्य पर बात होगी। लेकिन बैठक ने फिर साबित कर दिया कि हमारे यहां दिशा से ज्यादा महत्व मौजूद प्रतिनिधियों के हंगामे का है। मास्टर प्लान पर चर्चा शुरू हुई और कुछ ही मिनटों में शहर गायब हो गया, नेताओं की आवाजें रह गईं। टेबलें थर्राई, आवाजें ऊंची हुई, तमीज, औकात और मर्यादा जैसे शब्द हवा में तैरने लगे। बैठक की दिशा बदली और मास्टर प्लान फिर फाइलों में कैद होकर यथास्थान पहुंच गया।
माना जाता है कि जब शहर बिना नियोजन के आगे बढ़ता है तो उसका विस्तार तो हो जाता है, लेकिन एक तरह से वह अव्यवस्थाओं, असुविधाओं की गहरी खाई की ओर चला जाता है। भोपाल में नियम पीछे छूट गए, अवैध कॉलोनियां आगे निकल गई। अवैध निर्माण में तो प्रशासन और राजनीति के साथ भू माफिया का बेहतरीन गठजोड़ हावी हो चुका है। अतिक्रमण केवल उनका होता है, जिनकी कोई पहुंच नहीं होती। भोपाल का मास्टर प्लान विकास के दस्तावेज के बजाय सरकारी आश्वासन का स्थायी पोस्टर बनता दिख रहा है।
सवाल यह उठता है कि क्या राजधानी को इसी तरह अराजक, अनियमित, अनियोजित शहर बनाने का षड्यंत्र चल रहा है? आज से नहीं तीस साल से यही तो देखने में आ रहा है। आप स्टेशन का नाम बदल दो, विश्वविद्यालय का नाम बदल दो, मोहल्ले-कालोनियों का नाम बदल दो, लेकिन इस शहर का मास्टर प्लान तो लागू कर दो। अब तो ऐसा लगने लगा है कि जमीनों के लालची, स्वार्थी लोगों की महत्वाकांक्षाओं में भोपाल का मास्टर प्लान यंू ही घुटता रहेगा और शहर का जितना हो सकता है, उतना सत्यानाश होता रहेगा।
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संपादकीय
मुद्दा-ए मास्टर प्लान
दिशा हीन बैठक और नेताओं में घमासान
