संजय सक्सेना
भोपाल में एक पुल नब्बे प्रतिशत एंगल पर बना दिया गया। और यहां का एक भी फ्लाई ओवर तकनीकी रूप से और व्यावहारिक रूप से सौ प्रतिशत सही नहीं है। उज्जैन में महाकाल कारीडोर में घपले-घोटालों की कहानी भी सामने आ चुकी है। अब ओंकारेश्वर में बने एकात्मधाम में भी एक बड़ी खामी सामने आई है। यह बात और है कि फिलहाल प्रशासन में बैठे लोग इस पर मिट्टी डालने में जुटे हुए हैं।
आज ही सुबह इंटरनेशनल स्ट्रक्चरल एनालिसिस सॉफ्टवेयर (ईटीएबीएस) की रिपोर्ट को लेकर खबर प्रकाशित हुई है। इसमें बताया गया है कि ओंकारेश्वर में नर्मदा किनारे बनी आदि गुरु शंकराचार्य की 108 फीट ऊंची प्रतिमा ‘स्टैच्यू ऑफ वननेस’ यानि एकात्मधाम के खंबे में बड़ी खामी सामने आई है। और इसके चलते यह प्रतिमा एक तरफ झुक सकती है। इसकी शिकायत अब सीबीआई तक पहुंच गई है। महत्वपूर्ण बात यह कि जिस अधिकारी विश्वजीत बनर्जी ने इस खामी का पता लगाया उन्हें व के साथ ही प्रोजेक्ट डायरेक्टर कर्नल अनुपम गुप्ता को पद से हटा दिया गया।
पिछली 12 मई को सीबीआई, मप्र के मुख्य सचिव और लोकायुक्त को एक शिकायत की गई। इस शिकायत में कहा गया कि 2300 करोड़ की इस परियोजना में सुरक्षा और तकनीकी मानकों की अनदेखी की गई है। यह शिकायत प्रोजेक्ट से जुड़े तत्कालीन फील्ड डायरेक्टर बिश्वजीत बनर्जी ने की है। आरोप है कि जिस मुख्य पिलर पर पूरी प्रतिमा टिकी है, वह तय मानकों के अनुसार मजबूत नहीं है और उसमें झुकाव भी देखा गया है। इस प्रतिमा को 140 से 170 किमी प्रति घंटे तक तेज हवाओं को झेलने के हिसाब से डिजाइन किया गया था। लेकिन तकनीकी जांच में पता चला की यह 120 किमी रफ्तार की हवा भी नहीं झेल सकती है। इसके मुख्य आंतरिक स्टील पिलर एलिमेंट नंबर सी12 का स्ट्रेस रेशियो 1.244 तक पहुंच गया है। जबकि सुरक्षा तय सीमा 0.85 मानी गई थी। यानी जिस हिस्से पर जितना दबाव होना चाहिए, उससे करीब 24 प्रतिशत ज्यादा दबाव पड़ रहा है। 200 करोड़ लागत वाली यह प्रतिमा चीन निर्मित है।
्रमामले में एक और गंभीर आरोप यह है कि साइट पर मेजर एडमंड कीन नाम का व्यक्ति बिना किसी वैध सरकारी नियुक्ति के इंजीनियर-इन-चार्ज बनकर फैसले ले रहा था। उसने अधिकृत मुख्य इंजीनियरों के फैसलों को बार-बार बदला, जिससे निर्माण की गुणवत्ता और सुरक्षा प्रभावित हुई। फील्ड डायरेक्टर ने कथित अनियमितताओं की जानकारी एमपीएसटीडीसी के तत्कालीन एमडी डॉ. इलैयाराजा टी और मध्य प्रदेश शासन के अपर मुख्य सचिव संस्कृति विभाग शिव शेखर शुक्ला को भी दी थी।
शिकायत में यह भी कहा गया है कि संविदा नियमों के तहत ठेकेदार कंपनी से करीब 8 करोड़ रुपए की वसूली होनी थी, जो एक साल से लंबित है। इसके अलावा पीएमसी से ऑफिस, गाड़ी और बिजली खर्च के 28 लाख रुपए भी वसूले जाने थे, लेकिन इसे भी दबा दिया गया। वहीं, कंसलटेंट कंपनी को पूरा भुगतान कर दिया गया, लेकिन वहां काम करने वाले विशेषज्ञों का वेतन रोक लिया गया है।
जिस इंटरनेशनल स्ट्रक्चरल एनालिसिस सॉफ्टवेयर यानि ईटीएबीएस की जांच की बात कही जा रही है, वह किसी भी इमारत या संरचना का पहले सटीक थ्री-डायमेंशनल डिजिटल मॉडल तैयार करता है। मॉडल को बिल्कुल उसी आकार और डिजाइन में बनाया जाता है, जैसा वास्तविक निर्माण होना है। इसके बाद सॉफ्टवेयर यह जांचता है कि संरचना पर कितना भार (लोड) पड़ेगा। साथ ही तेज हवा, दबाव और अन्य परिस्थितियों का भी परीक्षण किया जाता है। इसके लिए डिजाइन के 100 से 120 अलग-अलग संभावित कॉम्बिनेशन का विश्लेषण किया जाता है।
प्रोजेक्ट मैनेजमेंट कंसल्टेंट के फील्ड डायरेक्टर बिश्वजीत बनर्जी ने लगभग 6 महीने तक लगातार मप्र राज्य पर्यटन विकास निगम और ठेकेदार कंपनी एलएंडटी को इस खतरे को लेकर लिखित चेतावनियां दीं। इसके बावजूद समय रहते तकनीकी सुधार नहीं किए जाने का आरोप है। ेलोकायुक्त संगठन ने शिकायतकर्ता को दस्तावेजों और विस्तृत जानकारी के साथ उपस्थित होने के लिए नोटिस जारी किया है। नोटिस में कहा गया है कि शिकायत की जांच लोकायुक्त कार्यालय इंदौर में की जा रही है और निर्धारित तिथि पर उपस्थित होकर आवश्यक रिकॉर्ड प्रस्तुत करने होंगे। मामला प्रतिमा की संरचनात्मक सुरक्षा, गुणवत्ता और प्रशासनिक निर्णयों से जुड़े आरोपों से जुड़ा बताया गया है। सुनवाई 7 जुलाई को होनी थी, लेकिन नहीं हो सकी।
सवाल यहां एक नहीं, कई उठाए जा रहे हैं। एक तो यह कि जब करोड़ों रुपए की परियोजना पर काम होता है, तो उसमें बेहतर तकनीकी विशेषज्ञों को शामिल क्यों नहीं किया जाता? जो निर्माण होता है, उसकी जांच गंभीरता से क्यों नहीं की जाती? महाकाल कारीडोर मामले में भी एक तरह से लीपापोती ही की गई, जबकि मामला गंभीर था। तो सवाल यह उठता है कि सरकार की राशि का सही उपयोग करने की जिम्मेदारी क्या अधिकारियों की नहीं है? शंकराचार्य की इतनी विशाल प्रतिमा चीन से क्यों तैयार कराई गई? जबकि हम चीन के बने सामान का विरोध करते आ रहे हैं।
जैसे महाकाल कारीडोर और अन्य जगह सरकार स्तर पर हलकी फुुलकी कार्रवाई करके मामलों को दबाया जाता रहा है, क्या एकात्मधाम में भी वही होगा? यदि वास्तव में तेज आंधी आती है, तो यह प्रतिमा टिक पाएगी? फिलहाल तो संशय बढ़ गया है। यदि प्रतिमा गिरती है, उसे क्षति पहुंचती है, तो इसमें किसकी जिम्मेदारी होगी? शिकायतकर्ता को हटाकर पहले ही फाइल बंद करने वाले कौन लोग हैं? क्या इस पर भी गौर किया जाएगा? बहुत सारे सवाल हैं। और लगता है कि ये भी प्रशासनिक गलियारों में भटकते हुए दम तोड़ देंगे? फिर एक घोटाला और फिर लीपापोती। क्या घाटे में चल रही सरकार के लिए ये सिस्टम जिम्मेदार नहीं…?
