संपादकीय
राम मंदिर दान : बात तो दूर तलक जा चुकी है….!

संजय सक्सेना
अयोध्या के राम मंदिर चढ़ावा चोरी कांड में नित नए खुलासे हो रहे हैं। श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के पूर्व महासचिव चंपत राय द्वारा पत्र जारी किए जाने से ट्रस्ट में खलबली मच गई है। नए और पुराने पदाधिकारियों के बीच मेल-मुलाकात और बैठकों का दौर तेज हो गया है। पदाधिकारी पत्र से हुए नुकसान की भरपाई में जुट गए हैं। चंपत राय से प्रमुख साधु-संत की बातचीत लगभग एक घंटे से अधिक तक चली। बाहर निकलने के बाद महंतों ने एक लाइन में बताया कि जल्द कुछ बड़ा होने वाला है।
क्या वास्तव में कुछ बड़ा होने वाला है? इस सवाल का पहला जवाब तो यही है कि बड़ा तो हो चुका है। बहुत बड़ा हो चुका है। बात दूर तलक जाएगी नहीं, दूर तलक चली गई है। तरकश से तीर निकल चुका है, अब यह बात और है कि यह तीर किसकी, या किस-किसकी बलि लेता है। वैसे वर्तमान सरकारों से कोई बहुत ईमानदारी से कार्रवाई की उम्मीद नहीं बची है।
यह सामान्य मंदिर में चढ़ावा चोरी का मामला नहीं है, उस अयोध्या के राम मंदिर से धन की कथित चोरी का मामला है, जिसके सहारे संघ ने देश में आध्यात्मिक पुनर्जागरण का कथित बीड़ा उठाया था और भाजपा ने सत्ता का सिंहासन प्राप्त किया।  इसने भाजपा और संघ के कार्यकर्ताओं तथा समर्थकों तक को स्तब्ध कर दिया है। पूजा स्थलों पर चोरी की घटनाएं आमतौर पर होती रही हैं और लोग अकसर उन्हें सहन भी कर लेते हैं। लेकिन राम मंदिर एकदम अलग है।
इसने देश के धार्मिक वातावरण को नई दिशा दी। और, यहां चढ़ावे की राशि बहुत बड़ी थी। एक पूर्व आईएएस ने सोने की रामायण दान दी थी, तो किसी ने चांदी की ईंटें दीं और एक किसान ने तो सोने का कड़ा चढ़ा दिया था, जबकि उसकी इतनी हैसियत नहीं थी। इस क्षति की भावना केवल धन ठगे जाने तक सीमित नहीं है। यह तब और अधिक विचलित करती है, जब इसे आस्था के साथ विश्वासघात के रूप में देखा जाता है। और यह भावना तब और गहरा जाती है, जब वह अर्पण भगवान राम के नाम पर किया गया हो, जिनके प्रति भारत के बड़े हिस्से में करोड़ों लोगों के मन में अगाध श्रद्धा है।
लाखों हिंदुओं के लिए राम मंदिर का निर्माण उनकी पहचान के पुनर्पुष्टि के लिए चले ‘500 वर्षों के संघर्ष’ की परिणति था। ऐसे में जब यह बात खुलती है कि इसके पीछे नोट और वोट का संघर्ष था, तो जीवन में मोहभंग की इस जैसी पीड़ादायक अनुभूतियां कम ही हो सकती हैं। संघ के कुछ पदाधिकारी तो इस मामले को 1951 में भारतीय जनसंघ की स्थापना के बाद से सामने आई सबसे बड़ी घटना बता रहे हैं।
और फिर, यह तथ्य कि विवाद के केंद्र में रहे श्रीरामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के अधिकांश सदस्य या तो संघ के प्रचारक थे या उससे जुड़े हुए थे, स्वाभाविक रूप से इस संगठन की असहजता को और बढ़ाता है। ऐसा खुलासा उस समय होना भी संघ के लिए अनुकूल नहीं रहा है, जब वह अपने अस्तित्व के 100 वर्ष पूरे होने का उत्सव मना रहा है और उसने ‘नए मनुष्य के निर्माण’ को अपना लक्ष्य निर्धारित किया है। हाल के महीनों में संघ का नेतृत्व उन सामाजिक वर्गों तक भी पहुंच बनाने का प्रयास कर रहा था, जिनसे पहले उसका संपर्क नहीं था।
आश्चर्य की बात नहीं है कि जनाक्रोश को देखते हुए संघ और भाजपा अब डैमेज-कंट्रोल की स्थिति में आ गए हैं। शुरुआती हिचकिचाहट के बाद संघ नेतृत्व ने इस घटना के विरोध में अपनी बात रखी है। धन के कथित दुरुपयोग पर चिंता व्यक्त करते हुए संघ के सरकार्यवाह ने इस घटना की निंदा की है और दोषी पाए जाने वालों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई की मांग की है।
ट्रस्ट के महासचिव चम्पत राय संघ के प्रचारक हैं और वर्षों से विहिप से जुड़े रहे हैं। ट्रस्टी अनिल मिश्रा तथा आमंत्रित सदस्य गोपाल राव भी संघ से जुड़े बताए जाते हैं। साफ है कि इस पूरे घटनाक्रम से संघ की छवि को झटका लगा है। उसे आशंका है कि इससे ‘हिंदुत्व परियोजना’ के प्रति भी मोहभंग की भावना पैदा हो सकती है।
यह भी नहीं भूला जा सकता कि 1990 में जब लालकृष्ण आडवाणी ने सोमनाथ से दिल्ली तक अपनी रथयात्रा शुरू की थी और बिहार में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया था, तब राम मंदिर निर्माण के विचार ने पूरे उत्तर और पश्चिम भारत में किस तरह की भावनाएं जगाई थीं। संघ और भाजपा के अनेक लोगों ने इसे देश में आध्यात्मिक पुनर्जागरण की शुरुआत बताया था। इसके बाद सीधे तौर पर देश में धार्मिक और सांप्रदायिक भावनाएं प्रबल हो गईं थीं।
हालांकि अब तक विपक्ष यह नहीं समझ पाया है कि राम मंदिर के इर्द-गिर्द निर्मित भाजपा के हिंदू राष्ट्रवाद के विमर्श का मुकाबला कैसे किया जाए? राम मंदिर भाजपा की वह महत्वाकांक्षी परियोजना बन गया था, जिसने उसे सत्ता तक पहुंचाया। इसके परिणामस्वरूप हुए हिंदू एकीकरण ने पार्टी को भारत के बड़े हिस्से में अपना विस्तार करने में मदद की है। संघ और भाजपा इसे एक हजार वर्षीय सभ्यतागत परियोजना के रूप में प्रस्तुत करते रहे हैं।
लेकिन आज तमाम सवाल उठ रहे हैं। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जिस तरीके से एसआईटी गठित की और उसकी जांच शुरू हुई, उसके बाद यह कहा जाने लगा कि योगी के निशाने पर केंद्र सरकार है। इसलिए सबकी निगाहें इस पर हैं कि अब योगी आदित्यनाथ क्या निर्णय लेते हैं? और केंद्र सरकार का क्या रुख रहता है? संघ ने हालांकि फिलहाल तो इससे पल्ला झाडऩे की कोशिश की है, लेकिन सोशल मीडिया पर संघ और विश्व हिंदू परिषद के साथ ही भाजपा पर भी लगातार हमले हो रहे हैं।
यह तय है कि अब जिस तरह से मीडिया पर सोशल मीडिया हावी होता जा रहा है और यह भी कि अब सत्ताधारी पार्टी के पास सोशल मीडिया की उतनी ताकत नहीं बची, जितनी शुरुआती दौर में थी, कहीं न कहीं संघ और भाजपा को इस घटना से नुकसान हो सकता है। डैमेज कंट्रोल एक सीमा तक हो सकता है, यह मामला कई सीमाएं पार करता दिख रहा है। देखना होगा कि इस घटना के परिणाम हमें कहां-कहां और किस-किस रूप में देखने को मिलते हैं।

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